धार्मिक एकता

संसार में अनेक धर्म,नाना मत और अगणित सम्प्रदाय हैं |प्रत्यक्षत: उन सब का उद्देश्य एक ही है – मानव हृदय में परस्पर एक आध्यात्मिक सम्बन्ध के बोध को -मानव मात्र के प्रति भाईचारा ,भगवान के प्रति पित्रिभावना अथवा मात्रिभावना को जगा देना | परन्तु वास्तविक स्थिति क्या है ? एकता,प्रेम भ्रातृत्व का पोषण बनाने के स्थान पर वे मनोमालिन्य भडकाने तथा मानव मानव के बीच पारस्परिक सम्बन्धों को तोड़ने में व्यस्त हैऔर आश्चर्य की बात है कि यह सब होता है भगवान के नाम पर |

बड़े बड़े आचार्य ,जिन्होंने भगवान के प्रकाश को मनुष्यों के हृदय तक पहुंचाया ,किसी एक धर्म ,समाज और मन्दिर के होकर नहीं रहते थे | सारा संसार ही उन के लिए मन्दिर था और उन के भगवान सभी प्राणियों तथा जीवों के हृदय में विराजमान रहते थे | इस लिए उन का स्नेह मनुष्य कृत मतों और वेर्गों पर विशेष ध्यान दिए बिना सब के ऊपर समान रूप से वरसता था | वायु की भान्ति उन्मुक्त था उन का प्रेम ,सूर्य प्रकाश के समान विश्वव्यापनी थी उन की दृष्टि और मानव जाति के प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान थी उन की सेवा |

पार्थिव प्रभुता और गौरव प्राप्त करने के लिए संसार में संघर्ष और संग्राम मच रहा है | इन उद्देश्यों के पीछे दौड़ने वाले जन वास्तव में अपनी अध्:प्रकृति अथवा अपने अधम अन्त:करण की प्रेरणाओं के शिकार बन रहे हैं | किन्तु उन के विषय में क्या कहा जाए जो उपद्रव ,हिंसा तथा दुःख की सृष्टि किया करते हैं और वह भी उन भगवान के नाम पर जो पूर्ण प्रेम ,करूणा और शांति के स्वरूप हैं |

पुन: कुल वैभव ,मर्यादा और जाति के अभिमानियों में जिस प्रकार बडप्पन की भावना व्याप्त रहती है ,वैसी ही बात संसार के महान आचार्यों के अनुयायियों में भी देखी जाती है | वे कहते हैं “,केवल मेरे गुरु ही पूर्णावस्था को प्राप्त हैं और आप को मुक्ति केवल उन के ही अनुसरण से प्राप्त हो सकती है | मेरा ही धर्म सच्चा धर्म है और अन्य धर्म मिथ्या हैं,केवल मैं ही सभ्य मानव हूँ ,शेष सब अनीश्वरवादी और धर्म विरोधी हैं |”अभी तक धर्मधुरन्धर कहे जाने वालों में इस प्रकार की भावना अपना अड्डा जमाए हुए है | संसार में एकता एकस्वरता और शांति लाने की अपेक्षा वे केवल वैमनस्य और विद्रोह का ही विस्तार करते हैं |

भगवान की धारणा ही सार्वभौम समन्वय और शांति के सिधान्त पर आधारित है | भगवान और मानवता का सच्चा सेवक वह है ,जिस ने इस सत्य को हृदयगम कर लिया है ,जो भगवत प्रेम की एकसूत्र में बाँधने वाली शक्ति को जानकर अपने साथी सभी मानव समाज को भगवान के एक परिवार का सदस्य मानता है | वह सब में भगवान के दर्शन करता है | इसी स्थिति में उस के हृदय में पावन प्रेम की बाढ़ आ जाती है | इसी स्थिति में दिव्य ज्योति से उस की आँखें चमकने लगती हैं और अन्तर्यामी भगवान के चरणों पर उस का जीवन न्योछावर हो जाता है |सभी में इसी प्रकार के आध्यात्मिक जागरण की आवश्यकता है |मनुष्य को अपने हृदय को शुद्ध करके उसे दिव्य प्रेम से ओतप्रोत कर लेना चाहिए और उस की जीवन सरिता की आनन्दमयी धारा दु:खाक्रांत की सेवा में अनायास प्रवाहित होती रहनी चाहिए |

नामकरण ,नामोल्लेख ,संस्था और समाज की महता गौण स्थानीय है |दैविसत्ता जिसे चाहे भगवान ,सत्य या वास्तविकता कहें,उस के द्वारा हमारी आत्मा इस प्रकार अभिभूत हो जानी चाहिए कि हम उस की सत्ता में विलीन हो जायें और उसी के नाना स्वरूप बन जायें|भगवान श्रीकृष्ण ,बुद्ध एवं अन्य महापुरुषों को महान आदर्श मान कर केवल दूर से उन की पूजा कर लेना ही पर्याप्त नहीं है | हम को अपने जीवन को इस प्रकार रूपांतरीत करना होगा कि हम भी उन के समीप पहुंच जायें,उन की ऊँचाइयों तक उठ जायें और अपने यथार्थ ,दिव्य एवं अमर स्वरूप को पहचान लें |

अन्दर से तो प्रत्येक आत्मा भगवान के प्रकाश और आन्नद में स्नान कर रहा है | इस महिमा को यदि हम जान लें तो हम संसार में शांति और सदभावना को बुला सकते हैं,अन्यथा नहीं | मानव हृदय को स्पर्श करने वाला ,उंचा उठाने वाला और रूपान्तरित कर देने वाला ज्वलंत उदाहरण बनें बिना कोरे उपदेशों से कुछ उपकार नहीं होता | युद्धों के कारण संसार एक भयानक यन्त्रणा के काल को पार कर रहा है | इस समय यही उचित है कि हम अपने शूद्र विरोधों को भुला कर के एक साथ भगवान की और अपना मन लगा कर संसार में शांति और सदभावना केलिए उन से प्रार्थना करें | भगवान और उन की लीला को सम्पूर्ण रूप से जान लेना हमारे अधिकार के बाहर की वस्तु है | उन के विषय में जो सिमित और अपूर्ण धारणाएं हम बनाते हैं ,उन्हें ले कर लड़ना नहीं चाहिए | हम इतना जानते हैं कि भगवान सर्व शक्तिमान ,सर्वसुहृदय और सर्वकरुणाकर है | हमें चाहिए कि हम अपने हृदय का द्वार मुक्त कर दें ,जिस से उन की शक्ति और कृपा हमारे अन्दर जाग उठे | हमे चाहिए कि हम अपनी इच्छा को उन के चरणों में विलीन कर दें,जिस से वे हम को अपना यंत्र बना सकें | हमारी शूद्र सत्ता उन के स्वरूप में समा जाये| उन के नाम पर हम संसार के सब लोगों को प्यार करें | दु:ख और शौक में पड़े हुए सब लोगों के प्रति दया और सहानुभूति से हमारा हृदय द्रवित हो उठे | हम उन के उपर भगवान के वरदान का आह्वान करें |उन के दिव्य गुणों को उतराधिकार में प्राप्त कर हम भगवान की सच्ची सन्तान बनें |

इति

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