ब्रह्मा जी की तपस्या की कथा

१.ब्रह्मा जी के जन्म के बाद घौर अज्ञान और अकेलापन –

जब भगवान गर्भोदकशायी विष्णु की नाभी से कमल निकला तो उस कमल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए | चारों तरफ देखा -अनन्त जल ,उपर नीचे दायें वाएं कुछ नहीं केवल जल ही जल |

“स तत्र पुरुष: कश्चित नापश्यद आत्मन: परम”

ब्रह्मा जी को अपने सिवा कोई दूसरा पुरुष नहीं दिखा | मन में सवाल उठे :

मैं कौन हूँ ? यह कमल कहाँ से निकला ? इस का मूल कहाँ है ? इस जल के नीचे क्या है ? मुझे किस ने बनाया ?

१०० दिव्य वर्ष तक खोज -ब्रह्मा जी कमल की नाल के रास्ते उस के मूल को खोजने जल में उतर गए | १०० साल तक-हमारे १०० साल नहीं देवताओं के सौ साल नीचे ही नीचे जाते रहे |पर कमल का अंत कहीं भी नहीं मिला ,थक कर वापिस कमल पर आ गए | मन में घौर विषाद : मैं व्यर्थ ही पैदा हुआ |मुझे कुछ पता नहीं |

3.आकाश बाणी “तप करो”

जब ब्रह्मा जी बिलकुल निराश हो कर बैठे थे तभी दो बार आकाशबाणी हुई |

तप – तप

ब्रह्मा जी को समझ नहीं आया कि यह आबाज कहाँ से आई ,किस की है ,पर उन्होंने आज्ञा मान ली |

” सहस्त्र-युग पर्यन्त तपसा आराधयद हरिम “

फिर ब्रह्मा जी ने १००० यानी ४३२ करोड़ मानव वर्ष तक एक आसन पर घौर तप किया |

तप से क्या मिला ?भगवान वर्णन – इतने लम्बे तप के बाद भगवान ने ब्रह्मा जी को अपना धाम दिखाया | बैकुंठ लोक का वर्णन भागवत में आता है | यह धाम सभी भौतिक कष्टों और संसारिक भय से मुक्त है | उस धाम में रजोगुण,तमोगुण,यहाँ तक कि सत्व गुण भी नहीं है |माया और समय का प्रभाव नहीं पड़ता ,सुर और असुर भेदभाव रहित हो कर भगवान की पूजा करते हैं | बैकुंठ निवासिओं का श्याम वर्ण ,कमल जैसे नेत्र,पीले वस्त्र,चतुर्भुज रूप रत्न जडित आभूषण होते हैं |

ब्रह्मा जी ने वहां देखा -वहां काल का डर नहीं है रज,तम नहीं ,भगवान शेषनाग पर विराजमान हैं,लक्ष्मी जी चरण दवा रही हैं | सन्नद ,नंद आदि पार्षद सेवा कर रहे हैं |

भगवान ने मुस्कुरा कर कहा :हे ब्रह्मा ,तुम्हारा तप मुझे बहुत प्रिय लगा ,वर मांगो “

५. ब्रह्मा ने क्या वर माँगा ? – ब्रह्मा जी ने धन दौलत नहीं मांगी ,उन्होंने कहा : प्रभु सृष्टि रचने का काम मुझे दे रहे हैं ,पर वर यह दीजिए कि सृष्टि रचते समय मैं आप को भूलूं नहीं | मेरा अहंकार न जागे ,मैं हमेशा याद रखूं कि करता आप हैं ,मैं निमित मात्र हूँ | भगवान ने कहा-तथास्तु और उन्हें सृष्टि का सारा ज्ञान ,वेद और चतुर्श्लोकी भागवत सुनाया | वही चार श्लोक पूरे भागवत का सार है |

इस कथा से तीन बड़ी सीख मिलती है :-

१. अज्ञान सब को होता है |ब्रह्मा जी जैसे सब से पहले जन्में ज्ञानी को भी पहले पता नहीं था कि मैं कौन हूँ | तो हमारा भटकना स्वभाविक है |

2. तप-धैर्य : १०० वर्ष खोजने पर भी जब जबाब नहीं मिला तो ब्रह्मा जी ने निराश हो कर छोड़ नहीं दिया | तप किया यानी मन को एकाग्र कर के बैठ गए | आज के समय में जब मतलब है नाम जप,सत्संग ,ग्रन्थ पढना

3.. कर्तापन छोड दो – वरदान में ब्रह्मा जी ने यही माँगा कि सृष्टि बनाते समय मुझे अहंकार न हो | मदन 81 साल की उम्र में जब शरीर साथ कम देता है तो यह भाव रखना है – हे प्रभु अब तक जो किया वो आप ने कराया ,आगे भी आप ही संभालो यही सब से बड़ा तप है |

एतावान एवं अहम ब्रह्मन तपस: श्रेय स: पर: अर्थात तुम ने मुझे देखे बिना ही उस सूने जल में मेरी बाणी सुन कर इतनी घौर तपस्या की है ,इसी से मेरी इच्छा से तुम्हें मेरे लोक का दर्शन हुआ है | भगवान् ने कहा -तप का सब से बड़ा फल यही है जीव मुझे जान ले |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow.com

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