श्रीमद्भागवत द्वितीय: स्कन्ध:पंचमोSध्याय
सृष्टि वर्णन
वक्ता ब्रम्हा जी -श्रोता देवऋषि नारद जी -कथा का आरम्भ ,नारद जी की जिज्ञासा –
एक बार देवऋषि नारद जी अपने पिता ब्रम्हा जी के पास गए,उन्होंने विनम्रता से प्रणाम करके पूछा ” |हे पितामह -आप सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता हैं | मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि यह विशाल जगत किस से पैदा हुआ ? किस के आधार पर टिका हुआ है ? और प्रलय में किस में लीन हो जाता है ? आप स्वयं भी किस की शक्ति से सृष्टि रचते हैं ? कृपा करके इस तत्व को मुझे समझाईये ,क्यों किआप के सिवा इस का सही उतर कोई नहीं दे सकता “|
ब्रम्हा जी का उतर -” मैं निमित् मात्र हूँ ” | नारद जी का प्रश्न सुन कर ब्रह्मा जी मुस्कुराये और बोले | “हे नारद,तुम ने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है | तुम्हारा यह प्रश्न लोकों के कल्याण के लिए है | परन्तु तुम बेटा मुझे जो सृष्टि कर्ता समझ रहे हो ,वह भ्रम है “| मैं स्वतंत्र नहीं हूँ ,जैसे कठपुतली सूत्रधार के इशारे पर नाचती है ,वैसे ही मैं भी उन परम पुरुष भगवान नारायण की प्रेरणा से ही सृष्टि रचता हूँ मेरी बुद्धि ,मेरी शक्ति,मेरा ज्ञान सब कुछ उन्हीं का दिया हुआ है |उन के बिना मैं एक तिनका भी नहीं हिला सकता |” जो कुछ भी जो तुम देखते हो -ये लोक ,ये देवता,ये वेद ,ये मैं तुम और सारा ब्रह्मांड सब भगवान की माया से ही बना है |
सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ ? ,विराट पुरुष की कथा ,ब्रम्हा जी ने सृष्टि क्रम बताना शुरू किया –
१. सब से पहले केवल भगवान थे ,सृष्टि से पहले न सत था न असत ,न दिन था न रात ,केवल एक मात्र भगवान् नारायण ही थे | उन्होंने योगमाया से अपने में ही लीन इस जगत को प्रकट करने का संकल्प किया |
2 . जल की उत्पति – भगवान के संकल्प से सब से पहले महतत्व प्रकट हुआ | महतत्व से अहंकार ,अहंकार से पंचतन्मात्रा और पंचतन्मात्रा से पंच महाभूत बने | सब से पहले जल प्रकट हुआ | वह जल सारे ब्रह्मांड में फ़ैल गया |
3. नारायण का जल शयन – उस अनन्त जल में भगवान ने शयन किया ,जल को नार कहते हैं और वह भगवान का अयन यानी घर ,इसलिए भगवान का नाम नारायण पड़ा | वे हजारों वर्षों तक उस जल में योग निंद्रा में लीन रहे |
४. स्वर्णिम अंड का प्रकट होना – भगवान की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ ,वही कमल सम्पूर्ण ब्रम्हांड का बीज था | समय आने पर वह कमल एक विशाल स्वर्णिम अंड में बदल गया और वह जल में तैरता रहा |
५..विराट पुरुष का जन्म – एक हजार दिव्य वर्षों बाद उस अंड को फौड कर ,विराट पुरुष प्रकट हुआ |,उन के हजारों सिर,हजारों आँखें, हजारों पैर थे ,वही भगवान का अवतार था | विराट पुरुष के अंगों से ही लोकों की रचना हुई ,ब्रम्हा जी कहते हैं ,हे नारद उस विराट पुरुष ने ही अपने शरीर से सम्पूर्ण जगत बनाया :-
अंग उस से उत्पन्न
मुख से वाणी,अग्नि,ब्राह्मण,इंद्र,वरुण, आदि देवता
भुजाओं से बल और क्षत्रिय
जंघाओं से वैश्य,कृषि,व्यापार
चरणों से शूद्र,सेवा,पृथ्वी
नाभि से आकाश
नेत्रों से सूर्य
मन से चन्द्रमा
प्राण से वायु
कान से दिशाएँ
सिर से स्वर्ग लोक
रोम से औषधि,वनस्पति आदि
इस प्रकार विराट पुरुष ने ही अपने को १४ लोकों में बिभाजित कर लिया |
फिर ब्रम्हा जी की उत्पति और उन के आदेश के बारे में उन्होंने अपनी बात कही –
उस विराट पुरुष की नाभि से जो कमल निकला था उसी पर मैं प्रकट हुआ |कमल पर बैठे बठे मैंने चारों और देखा पर सृष्टि रचने का ज्ञान मुझे नहीं था | तब मैंने १०० वर्षों तक तप किया | तप से प्रसन्न हो कर भगवान ने मुझे दर्शन दिए और कहा – हे ब्रम्हा तप करो ,तप से ही तुम सृष्टि रच पाओगे | भगवान की कृपा से ही मुझे वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ ,सृष्टि का विधान समझ आया | तब मैंने उन्हीं की शक्ति से इस जगत की रचना की |
ब्रम्हा जी का अंतिम आदेश –
ब्रम्हा जी नारद से कहते हैं कि, हे पुत्र इस जगत में जो भी विभूति है,जो भी शक्ति है जो भी सुन्दरता ,ऐश्वर्य दिखता है वह सब भगवान श्री हरि के तेज का अंश है वह मेरे तेज का अंश नहीं है | इसलिए अहंकार छोड़ कर एक मात्र भगवान श्री हरि की शरण लेनी चाहिए ,क्यों कि वह ही वास्तविक कर्ता हैं मैं तो निमित मात्र हूँ |वही पालक ,वही संहारक उन के सिवा कोई दूसरी वस्तु सत्य नहीं है |उन्हीं का भजन करना चाहिए क्यों कि वही सत्य हैं बाकी सब माया है |
मुख्य शिक्षा – इस अध्याय का मूल संदेश है किअहंकार त्यागो,बड़े से बड़ा व्यक्ति भी भगवान की शक्ति के बिना कुछ नहीं है | इसलिए कर्तापन का अभिमान छोड़ कर सब कुछ भगवान को अर्पित कर देना चाहिए |
लेखक_मदन लाल शर्मा
वेबसाइट : thegodweknow.com
