सृष्टी और मैं
सृष्टी से पहले यह जगत जिसे हम यूनिवर्स कहते हैं अंधकार में लीन और अज्ञात अर्थात जिसे जाना न जाये और अलक्षण अर्थात जो चिन्ह रहित हो (जिस का कोई चिन्ह न जाना जाये )जिस के बारे में कोई भी तर्क न दिया जा सके और साये अर्थात छाया के समान था एक काला अँधेरा अर्थात रिक्त स्थान श्याम और कृष्ण इसी काले अँधेरे के पर्याय हैं नाम ग्रहण करते हैं |कपिल के सांख्य शास्त्र में इसी को पुरुष कहा गया है लेकिन उन्होंने भगवान के अस्तित्व को नकार दिया है |उन के अनुसार प्रकृति और पुरुष दोनों शाश्वत हैं | प्रकृति पुरुष में साम्यवस्था अर्थात प्रकृति के परमाणु विखंडित रूप में उसी में रहते हैं | जब पुरुष में अहंकार पैदा होता है तो परमाणु बनने की प्रक्रिया शुरू होती है |परमाणु के तीन हिस्से होते हैं सत्व ,रज अवम तम यही तत्व क्रमशः विष्णु ब्रह्मा और शिव के सांकेतिक नाम ग्रहण करते हैं | ब्रम्हा को सृष्टी का जनक कहा जाता है क्यों कि यह सत्व और तम अर्थात पोसिटिव और नेगेटिव जो उर्जा है उन के बीच में रज आने से एक परमाणु की रचना सम्भव होती है | परमाणु क्या है -जब किसी पदार्थ के भाग किये जाये तो अंत में उस का सब से छोटा कण जिस के हिस्से नहीं किये जा सकते उसे ही परमाणु कहते हैं यह गिनती में बहुत अधिक होते हैं और इतने छोटे होते हैं कि ज्ञान इन्द्रियों से नहीं देखा जा सकता ,यह गुणहीन होते हैं इन में केवल संख्या और विस्तार (साइज) का ही अंतर होता है ,कुछ बड़े कुछ छोटे और इन की शक्ल भी भिन्न होती है ,इस में उस पदार्थ का गुण नहीं होता ( वास्तविक गुण पदार्थ में इन की उपस्थिति ,स्थान पर होने के कारण आता है ) परमाणु में संख्या इकठी होती है लेकिन उसे अलग किया जा सकता लेकिन उस के लिए रिक्त स्थान का होना अति आवश्यक है |परमाणु में गुण मिक्सिंग और अनमिक्सिंग पर निर्भर करता है और उस के लिए उन का स्थानांतरित होना अनिवार्य है और इन के स्थानांतरित होने के लिए रिक्त स्थान का होना आवश्यक है ताकि परमाणु एक जगह से दूसरी जगह जा सकें | परमाणु में तीन मूलभूत कण होते हैं ,इस के मध्य में प्रोटोन पॉजिटिव चार्ज अर्थात सत्व ,न्यूट्रॉन अर्थात शून्य अर्थात रज तथा बाहरी भाग में इलेक्ट्रान नेगेटिव चार्ज अर्थात तम होता है ,परमाणु केवल उर्जा है | प्रकृति के कण कण में उर्जा व्याप्त है इसे ही पुराणों में आदि शक्ति कहा गया है ,उर्जा ही सब चीजों को जोडती है और जानकारी लाती है ,अतीत ,वर्तमान और भविष्य सभी एक साथ मौजूद हैं क्यों की यह सब उर्जा से ही बने हैं |प्रकृति और पुरुष का अटूट सम्बन्ध है | प्रकृति के माध्यम से ही पुरुष जो एक चेतना है अपने आप को व्यक्त करता है जो प्रकृति के कण कण में है | हम में और आप में, मैं के रूप में मौजूद है | यह चेतना ही परमात्मा कहलाता है और इस का आरोप जीव में होने के कारण वह आत्मा कहलाती है | प्रकृति नश्वर है विखंडित होकर पुरुष में लीन हो जाती है जीव नश्वर है लेकिन आत्मा तो परमात्मा का हिस्सा है इसलिए वह नश्वर नहीं होती अमर हैं |परमात्मा का वास्तविक स्वरूप एकरस शांत अभय अवं ज्ञान स्वरूप है |न इस में माया का मोह है न तो इस के द्वारा रची हुई बिश्मतायें है ,वह सत और असत दोनों से परे है |किसी भी वैदिक या लौकिक शब्द की वहां तक पहुंच नहीं है | कर्मों का फल भी वहां तक नहीं पहुंच पाता है | परम पुरुष भगवान ही परमपद है | महात्मा लोग उसी का शौक रहित अनंत आनंद स्वरूप ब्रह्म के रूप में साक्षात्कार करते हैं |समस्त कर्मों के फल भी भगवान ही देते हैं | क्यों कि मनुष्य जो भी कर्म करता है वह सब उस की प्रेरणा से ही होता है | इस शरीर में रहने वाले पंचभूतों के अलग अलग होजाने पर अब यह शरीर नष्ट हो जाता है ,तब भी इस में रहनेवाला अजन्मा पौरुष अर्थात मैं आकाश के समान नष्ट नहीं होता |
