श्रीमद्भागवत -अष्टमोSध्याय (प्रथम:स्कन्ध:)

गर्भ में परीक्षित की रक्षा ,कुंती द्वारा भगवान की स्तुति और युधिष्ठर का शोक -पांडव श्रीकृष्ण के साथ अपने युद्ध में मरे भाई बन्धुओं के लिए तर्पण करने के लिए गंगा तट पर गए | भगवान श्रीकृष्ण ने उन को सांत्वना दी और समझाया कि संसार के सभी प्राणी काल के अधीन हैं ,मौत से किसी को कोई बचा नहीं सकता | इस प्रकार श्री कृष्ण ने पांडवों को उन का राज्य दिलवाया तथा दुष्ट राजाओं का वध करवाया | साथ ही युधिष्ठर द्वारा तीन अश्वमेध यग्य कराये | इस के बाद श्रीकृष्ण ने वहां से जाने का विचार किया तथा पांडवों से विदा ली | तदनन्तर सात्यकी और उद्धव के साथ द्वारका जाने के लिए वे रथ पर सवार हुए | उसी समय उन्होंने देखा कि उतरा डरी हुई सामने से दौड़ी आ रही है |

उतरा ने कहा हे जगत के स्वामी आप महायोगी हैं ,आप मेरी रक्षा कीजिये | आप के सिवाए इस लोक में मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है ,क्यों की यहाँ सभी परस्पर एक दुसरे की मृत्यु के निमित बन रहे हैं | प्रभो आप सर्वशक्तिमान हैं | यह दहकते हुए लोहे का बाण मेरी और दौड़ा आ रहा है | यह भले ही मुझे जला दे लेकिन मेरे गर्भ को नष्ट न करे -ऐसी कृपा कीजिये | भगवान श्रीकृष्ण सुनते ही जान गए कि अश्वथामा ने पांडवों के वंश को निर्जीव करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है | भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरणागत पर आई विपति जान कर अपने निज अस्त्र सुदर्शन चक्र से उन निज जनों की रक्षा की | योगेश्वर श्रीकृष्ण समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान आत्मा हैं | उन्होंने उतरा के गर्भ को पांडवों की वंश परम्परा चलाने के लिए अपनी माया के कबच से ढक दिया | यह कोई आश्चर्य की बात नहीं समझनी चाहिए ,क्यों कि भगवान तो सर्वाश्चर्य हैं ,वे ही अपनी निज शक्ति माया से स्वयं अजन्मा हो कर भी इस संसार की सृष्टि ,रक्षा और संहार करते हैं |

जब भगवान श्रीकृष्ण जाने लगे ,तब ब्रह्मास्त्र की ज्वाला से मुक्त अपने पुत्रों के और द्रोपदी के साथ् सती कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण की इस प्रकार स्तुति की | आप समस्त जीवों के अंदर और बाहर एकरस स्थित हैं ,फिर भी इन्द्रियों से देखे नहीं जाते ,क्यों कि आप प्रकृति से परे आदि पुरुष परमेश्वर हैं | मैं आप को नमस्कार करती हूँ | आप शुद्ध हृदय वाले विचारशील जीवन्मुक्त परमहंसों के हृदय में अपनी प्रेममयी भक्ति का सृजन करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं ,फिर भी हम अल्पबुद्धि स्त्रियाँ आप को कैसे पहचान सकतीं हैं | जिन की नाभि से ब्रह्मा का जन्म-स्थान कमल प्रकट हुआ है ,जो सुंदर कमलों की माला धारण करते हैं ,जिन के नेत्र कमल के समान विशाल और कोमल हैं ,जिन के चरण कमलो में कमल का चिन्ह है -श्रीकृष्ण ,ऐसे आप को मेरा बार बार नमस्कार है | आप ने मेरे पुत्रों के साथ मेरी भी बार बार विपतियों से रक्षा की है ,आप ही हमारे स्वामी हैं |आप सर्व शक्तिमान हैं ,श्रीकृष्ण कहाँ तक गिनाऊ-विष से लाक्षागृह की भयानक आग से ,हिडिम्ब आदि राक्षसों की दृष्टि से ,दुष्टों की द्यूतसभा से ,वनवास की विपतियों से और अनेक बार के युद्धों में अनेक महारथियों के शस्त्र अस्त्रों से और अभी अभी इस अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र से भी आप ने हमारी रक्षा की है | आप निर्धनों के परम धन हैं | माया का प्रपंच आप को स्पर्श भी नहीं कर सकता |आप अपने में परम शांत स्वरूप हैं |

मैं आप को अनादि ,अनंत,सर्वव्यापक ,सब के नियन्ता ,काल रूप परमेश्वर समझती हूँ |संसार के समस्त पदार्थ और प्राणी आपस में टकराकर बिषमता के कारण परस्पर विरूद्ध हो रहे हैं ,परन्तु आप सब में समान रूप से विचर रहे हैं | आप का कभी कोई न प्रिय है औए न अप्रिय | आप के सम्बन्ध में लोगों की बुद्धि ही विषम हुआ करती है | आप विश्व के आत्मा हैं , विश्व रूप हैं ,न आप जन्म लेते हैं और न कर्म ही करते हैं |फिर भी पशु पक्षी ,मनुष्य,ऋषि ,जल-चर आदि में आप जन्म लेतें हैं और उन योनियों के अनुरूप दिव्य कर्म भी करते हैं | यह आप की लीला ही तो है | जब बचपन में आप ने दूध की मटकी फोड़ कर यशोदा मैया को खिझा दिया था और उन्होंने आप को बाँधने के लिए हाथ में रस्सी ली थी ,तब आप की आँखों में आंसू छलक आये थे ,काजल कपोलों पर बह चला था ,नेत्र चंचल हो रहे थे और भय की भावना से आप ने अपने मुख को नीचे की और झुका लिया था | आप की उस दशा का -लीला छवि का ध्यान करके मैं मोहित हो जाती हूँ | आप ने अजन्मा हो कर भी जन्म, क्यों लिया है ,इस का कारण बतलाते हुए कोई कोई महापुरुष यों कहते हैं की जैसे मलयांचल की कीर्ति का विस्तार करने के लिए उस में चन्दन प्रकट होता है ,वैसे ही अपने प्रिय भक्त पुन्य श्लोक राजा उदु की कीर्ति का विस्तार करने के लिए ही आप ने उन के वंश में अवतार ग्रहण किया है | कुछ लोग यों कहते हैं कि वसुदेव और देवकी ने पूर्व जन्म में ( सुतपा और पृश्नी के रूप में ) आप से यही वरदान प्राप्त किया था ,इसलिए आप अजन्मा होते हुए भी जगत के कल्याण ओर दैत्यों के नाश के लिए उन के पुत्र बने हैं | कुछ लोग यों भी कहते हैं कि पृथ्वी दैत्यों के अत्यंत भार से समुद्र में डूवते हुए जहाज की तरह डगमगा रही थी ,तब ब्रह्मा की प्रार्थना से उस का भार उतारने के लिए ही आप प्रकट हुए | कोई महापुरुष यों कहते हैं कि जो लोग इस संसार में अज्ञान ,कामना और कर्मों के बंधन से जकड़े हुए पीड़ित हैं ,उन लोगों केलिए श्रवण और स्मरण करने योग्य लीला करने के विचार से ही आप ने अवतार ग्रहण किया है | भक्तजन बार बार आप के चरित्र का श्रवण ,गान,कीर्तन और स्मरण करके आनन्दित होते रहते हैं ,वे ही अविलम्ब आप के उस चरण कमल का दर्शन कर पाते हैं जो जन्म मृत्यु के प्रवाह को सदा के लिए रोक् देता है |

प्रभो, क्या अब आप अपने आश्रितों को छोड़ कर जाना चाहते हैं | पृथ्वी के राजाओं के तो हम विरोधी हो गए हैं जैसे जीव बिना इन्द्रियां निर्जीव हो जाती हैं वैसे ही आप के दर्शन विना यदुवंशियों और हमारे पुत्र पांडवों के नाम तथा रूप का आस्तित्व ही क्या रह जाएगा | आप विश्व के स्वामी हैं ,विश्व की आत्मा हैं और विश्व रूप हैं | श्रीकृष्ण जैसे गंगा की अखंड धारा समुद्र में गिरती है ,वैसे ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी और न जाकर आप से ही निरंन्तर प्रेम करती रहे | आप की शक्ति अनंत है | गोविन्द ,आप का यह अवतार गौ ,ब्राह्मण और देवताओं का दुःख मिटाने के लिए ही है | योगेश्वर चराचर के गुरु भगवन आप को नमस्कार करती हूँ | कुंती ने मधुर शब्दों में भगवान की लीलाओं का वर्णन किया ,यह सब सुन श्रीकृष्ण ने कुंती से कहा -अच्छा ठीक है और वे लौट आये | वहां कुंती और सुभद्रा आदि देवियों से विदा ले कर जब वे जाने लगे तब राजा युधिष्ठर ने बड़े प्रेम से उन्हें रोक लिया | राजा युधिष्ठर को अपने भाई-बन्धुओं के मारे जाने का बड़ा शोक हो रहा था |,भगवान श्रीकृष्ण ने अनेकों इतिहास कह कर उन्हें समझाने कि बहुत चेष्टा की परन्तु उन्हें सांत्वना न मिली ,उन का शोक न मिटा |

शास्त्र का वचन है कि राजा यदि प्रजा का पालन करने के लिए धर्मयुद्ध में शत्रुओं को मारे तो उसे पाप नहीं लगता ,फिर भी इस से भी युधिष्ठर को संतोष नहीं हो रहा था | उन का मानना था कि जैसे कीचड़ से गन्दला जल स्वच्छ नहीं किया जा सकता वैसे ही बहुत से हिंसा बहुल यज्ञों द्वारा एक भी प्राणी की हत्या का प्रायश्चित नहीं किया जा सकता |

इति अष्टमोSध्याय प्रथम: स्कन्ध:

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