मनुष्य को कितना चाहिए

एकोSपि पृथ्वी कृत्स्नामेकच्छ्त्रा प्रशांस्ति च | एकस्मिन्नेव राष्ट्रे तु स चापि निवसेंनृप: ||

तस्मिन राष्ट्रSपि नगरमेकमेवाधितिष्टति | नगरेSपि गृहं चैकं भवेत तस्य निवेशनम ||

एक एव प्रदिष्ट: स्यादावासस्तदगृहेSपि च | आवासे शयनं चैकं निशि यत्र प्रलीयते ||

शयनस्यार्धमेंवास्य स्त्रियाश्चार्ध विधीयते | तद्नेंन प्रसगेंन स्वल्पेनैवेह युज्यते ||

सर्व ममेति सम्मुढो बलं पश्यति बालिश: | एवं सर्वोपयोगेशु स्वल्पमस्य प्रयोजनम ||

तंडुलप्रस्थमात्रेण यात्रा स्यात सर्वदेहिनाम | ततो भूयस्तरों भोगो दुखाय तपनाय च ||

जो राजा अकेला ही समूची पृथ्वी का एकछत्र शासन करता है ,वह भी किसी एक ही राष्ट्र में निवास करता है | उस राष्ट्र में भी किसी एक ही नगर में रहता है | उस नगर में भी किसी एक ही घर में निवास होता है | उस घर में भी उसके लिए एक ही कमरा नियत होता है | उस कमरे में भी उस के लिए एक ही शय्या होती है ,जिस पर वह रात में सोता है | उस शय्या का भी आधा ही भाग उस के पल्ले पड़ता है | उस का आधा भाग उस की रानी के काम आता है | इस प्रसंग से वह अपने लिए थोड़े से ही भाग का उपयोग कर पाता है | तो भी वह मूर्ख गंवार सारे भूमण्डलको अपना ही समझता है और सर्वत्र अपना ही बल देखता है | इस प्रकार सभी वस्तुओं के उपयोगों में उस का थोडा सा ही प्रयोजन होता है | प्रतिदिन सेर भर चावल से ही देहधारियों की प्राण यात्रा का निर्वाह होता है | उस से अधिक भोग दु:ख और संताप का कारण होता है |

सन्दर्भ -महाभारत अनु० प० १४५

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