सनातन धर्म
धार्यते इति धर्म:जो धारण किया जाये वह धर्म है ,समाज में मनुष्य जीवन के प्रति जो धारणा बनाता है वही उस का धर्म है |गीता के अनुसार धर्म मनुष्य के जीवन की प्रेरणा है जिस से वह सही और गलत का विचार कर अपने कर्मों और कर्तव्यों का पालन करता है |सनातन धर्म मूल्यों कर्तव्यों और जिमेवारियों का वर्णन करता है जिन का पालन करना जीवित और निर्जीव मनुष्यों को भी करना पड़ता है |सनातन धर्म का वर्णन वेदों में किया गया है |सनातन धर्म यज्ञ ,साधना ,तप और ध्यान को प्राथमिकता देता है जब की हिन्दू धर्म जहाँ प्रतिष्ठान पूजा, मंदिर और व्रतों को महत्व देता है | भारत में जितने भी सम्प्रदाय हैं जैसे सिख,जैन,बोध अन्य धर्मों के सम्प्रदाय हैं वैसे ही हिन्दू धर्म भी हिन्दू सम्प्रदाय है |यह सभी सम्प्रदाय सनातन से ही निकले हैं |सनातन का कोई भी संस्थापक नहीं है क्यों कि अनादी काल(बिना शुरुआत के)शाश्वत माना गया है ,सनातन को किसी व्यक्ति द्वारा नहीं बनाया गया वल्कि इस की स्थापना स्वंय परमेश्वर ने की है ,अन्य धर्मों के विपरित जिन के संस्थापक हैं जैसे इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद ,इसाई धर्म के ईसा म|सीह | सनातन को ऐसा माना जाता है हमेशा से मौजूद है |गीता में परमात्मा को सनातन माना गया है साथ ही जीवत्मा को भी सनातन धर्म के रूप में स्वीकार किया गया है अर्थात सनातन में सभी चीजें सनातन हैं |सनातन का अर्थ हमेशा रहने वाला जो आदि काल से चला आ रहा है इस का कोई ज्ञात बिंदु नहीं है | भगवान कृष्ण ,राम ,शिव और बिभिन्न ऋषि परम्पराओं जैसे देवताओं और ऋषियों को इस का प्रचारक माना जाता है |यह ज्ञान और परम्पराओं की धारा है ऋषि और मनुओं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है |
सनातन धर्म के तीस लक्षण शास्त्रों में कहे गये हैं :-
सत्य-सत्य एक नैतिक गुण है अपने विचारों में वाणी में और कर्मों में सच्चा होना योग में सत्य को यम (आचरण के नियम ) में से एक माना गया है |सत्य वह है जो वास्तविक या तथ्य के अनुरूप हो यह ऐसा गुण है जो,कथनों विश्वासों और प्रस्तावों को वास्तविकता से जोड़ता है |सामन्य भाषा में सत्य का अर्थ वास्तविक और ईमानदार होना है | 2. दया -यह एक सद्गुण है जो दूसरों के दुःख से उत्पन्न सहानुभूतिपूर्ण दुःख है ,किसी के कष्टों को कम करने के लिए की गई दया और क्षमा भी होता है |सनातन का यह मूल गुण है और नैतिकता का अनिवार्य हिस्सा है यह न्याय के साथ मिल कर काम करती है “| यह सभी धर्मों और परम्पराओं का महत्वपूर्ण गुण है | 3. तपस्या -किसी उच्च लक्ष्य ,विशेष कर आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए स्वेच्छा से शारीरिक और मानसिक कष्टों को सहनाऔर आत्म अनुशासन का पालन करना ,इस में सांसारिक सुखों का त्याग इन्द्रिओं पर नियन्त्रण ,एकांतवास जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं | इस का उदेश्य आत्म शुधि करना और आंतरिक स्थिरता प्राप्त करना है | तपस्या का अर्थ अग्नि या उर्जा पैदा करना है |४.शौच -इस का सम्बन्ध पवित्रता और निर्मलता से है और इस में शरीर की शुद्धता के साथ साथ मन की शुद्धता भी शामिल है | पवित्रता पूर्वक धर्माचरण करना ,शरीर और मन को शुद्ध रखना ,सत्य बोलना और निषिद्ध पदार्थों तथा कार्यों आदि का त्याग करना ,योग के नियमों में से एक है |५.तितिक्षा -सहनशीलता या धीरज रखना ,सुख दुःख ,सर्दी गर्मी ,लाभ हानी और मान सम्मान जैसी विपरीतताओं को बिना विलाप किये धैर्य पूर्वक सहन करने की क्षमता है |६.उचित अनुचित का विचार -उचित अनुचित की समझ हमें सही मार्ग चुनने और सामाजिक रूप से स्वीकृत व्यवहार करने में मदद करती है ,जो काम समाज की भलाई के लिए हो वह उचित होता है जो हानी के लिए हो वह अनुचित होता है |7.मन का संयम -स्वयं को उन शारीरिक गतिबिधियों में शामिल होने से स्वेच्छिक रूप से रोकना जो आनंद प्रदान करतीं हैं |संयम व्यक्तिगत प्राथमिकताओं ,धार्मिक प्रथाओं या व्यबहारिक कारणों से हो सकता है |अच्छी आदतें अपनाकर स्वयं पर नियन्त्रण किया जा सकता है गुस्सा और क्रोध से संयम प्रभावित होता है इस से बचना चाहिए |८.इन्द्रिओं का संयम – यदि आप अपनी इच्छा अनुसार प्रत्याहार कर सकते हैं सचेतन रूप से मन इन्द्रीयों से जोड़ और अलग कर सकते हैं तो आप ने मन पर वास्तव में अच्छा नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है ,प्रत्याहार प्रिय व् अप्रिय विषयों को इन्द्रियों से हटा कर आत्मतत्व में स्थित करना प्रत्याहार है | प्रत्याहार का वर्णन हठयोग के अंतर्गत आता है |यदि इन्द्रियाँ आत्मा में तन्मय हो जाती हैं तब कोई कारण नहीं कि मन का आत्मा में लय न हो सके | 9.अहिंसा-किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहना चाहे वह शरीरिक हो या मानसिक हो खुद को ,दूसरों को चोट नहीं पहुंचाना ,क्रोध न करना |किसी प्रकार का विरोध हो शांति पूर्वक होना चाहिए |जीव हत्या नहीं करनी चाहिए | 10.ब्रह्मचर्य – यह ऐसी स्थिति है जहाँ व्यक्ति योन सम्बन्धों से दूर रह कर पवित्र ज्ञान और आध्यात्मिक मुक्ति की तलास के लिए सात्विक जीवन ,अहिंसा ,ध्यान और आत्म नियन्त्रण करता है |यह ब्रह्म के ध्यान से सम्बन्धित है | ११. त्याग- का अर्थ किसी चीज,इच्छा ,सुख या अधिकार का छोड़ना त्याग कहलाता है |यह एक व्यक्ति की अपनी भलाई या स्वार्थ का बलिदान करके किसी उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने की क्रिया है ,अपने भौतिक सुखों ,कामनाओं और अहंकार से खुद को दूर करना भी हो सकता है जैसा कि धार्मिक और आध्यात्मिक सन्दर्भों में देखा जा सकता है स्वार्थ का त्याग ,अधिकार का ,पद का ,आसक्ति का त्याग ,अहंकार से मुक्ति,मैं और मेरा का त्याग करना | मोक्ष की कामना वाले भौतिक सुखों का त्याग करते हैं | 12.स्वाध्याय -अपने व्यक्तित्व और विचारों का अध्ययन करना है |आत्मचिंतन ,मनन और पवित्र ग्रंथों का अध्ययन शामिल है |यह ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को अपने विचारों ,व्यवहारों और प्रेरणाओं को गहराई से समझने में मदद करती है ,जिस से व्यक्ति का विकास और आन्तरिक सुधार होता है |१३.सरलता -मनुष्य के अच्छे चरित्र और निष्कपट होने की अवस्था का लक्षण है |समझने समझाने की कोई बात जटिल के विपरित सरल लगती है |सरलता सरल होने की अवस्था का गुण है |१४. संतोष -संतोष एक नैतिक अवधारणा है जिस का अर्थ संतुष्टि है ,संतुष्टि सब से बड़ा धन है ,यह मन की पूर्णता का भाव है |मनुष्य को जो भी मिले संतुष्ट रहना चाहिए | १५. समदर्शी- वह है जो सब को समान दृष्टि से देखता है ,किसी से भेदभाव नहीं करे ,दुसरे के सुख दुःख को अपना समझता है और सब के साथ एक जैसा व्यबहार करता है या निष्पक्षता और संतुलन को दर्शाता है |१६.महात्माओं की सेवा -से तात्पर्य पवित्र और आध्यात्मिक सेवा से है |संतों के सान्निध्य में रह कर उन के आदेशों और जीवनशैली से प्रेरणा लेनी चहिये |१७.सांसारिक भोगों से निवृति -तात्पर्य सांसारिक सुखों और पदार्थों के प्रति अत्याधिक आसक्ति को छोड़ कर जीवन में बने रह कर उन से अनासक्त रहना है ,अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर के फल की इच्छा न करना जिस से जीवन में शांति और आनंद के साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है |१८.मनुष्य के अभिमानपूर्ण प्रयत्नों का फल उल्टा ही होता है -ऐसा विचार -जो मनुष्य घमंडी प्रवृति के होते हैं उन के द्वारा किये गए काम या प्रयत्न असफल रहते हैं अर्थात घमंड नहीं करना चाहिए |१९.मौन -ध्यान की एकाग्रता और सचेतनता को बढाता है जिस से अभ्यासकर्ता अधिक सटीकता और जागरूकता के साथ आसन कर पातें हैं | नियमित अभ्यास से भावनाओं को नियन्त्रण करने,चिंता को कम करने और तनाव के प्रति लचीलापन बनाने में मदद मिलती है |२०.आत्मचिंतन -अपने विचारों व्यबहारों ,विश्वासों और अनुभवों पर ईमानदारी और गहराई से विचार करने और मूल्यांकन करने की प्रक्रिया को आत्मचिंतन कहते हैं |ऐसा करने से हम एक बेहतर और अधिक जागरूक व्यक्ति बन सकते हैं |२१.प्राणियो को अन्न आदि का यथायोग्य विभाजन -सब प्रकार के धन ईश्वर के दिए हैं मनुष्य को उतना ही धन और अन्न ग्रहण करना चाहिए जितनी उस को आवश्यकता है ,मनुष्य का अधिकार केवल उतने ही अन्न पर है जिस से उस की भूख मिट जाये अपनी समस्त भोग सामग्रीओं को सब प्राणियो को यथायोग्य बाँट कर ही अपने काम में लाना चाहिए |२२.मनुष्यों में आत्मा तथा इष्टदेव का भाव -सभी जीवों में आत्मा परमात्मा का ही अंश है यह समझ कर उन से मित्रवत व्यबहार करना चाहिए |२३. श्री कृष्ण लीलाओं का श्रवण -श्री कृष्ण के नाम और गुणों को सुनना और मनन करना चाहिए |२४.कीर्तन-कीर्तन एक प्रकार का जप या संगीतमय बर्तालाप है जिस में कृष्ण लीलाओं का गुण गान किया जाता है |२५.स्मरण -मानसिक अवस्था है जो कुछ भी इष्टदेव की लीलाओं के बारे में ,उन के जीवन में क्या घटित हुआ है उस को याद करना ,बचपन में क्या क्या लीलाएं की उन को यथावत मन में रखना | २६.उन की सेवा,- ,पूजा और नमस्कार -इष्टदेव की सेवा और पूजा करने के बाद नमस्कार करना चाहिए |२८,२९,३०.-दास्य,सखा ,आत्म समर्पण -भगवान कृष्ण का मैं दास हूँ वह मेरे सखा भी हैं ऐसा जान कर मैं अपने आप को उन की सेवा में समर्पण कर रहा हूँ |
यह तीस प्रकार का आचरण सभी मनुष्यों का परम धर्म है |इस के पालन से सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते हैं | यही सनातन धर्म है |
