भारत में आर्य आगमन निराधार है

आज से प्राय: कुछ सौ वर्ष पहले पूर्व प्रख्यात भाषाविद मैक्समूलर तथा उस के अनुयायों ने आर्यवाद की कहानी रची है | यह कहानी पूर्णत: कपोलकल्पित और निराधार है | तथापि आधुनिक समय में इस कहानी को इतिहासकारों ने निर्विवाद रूप से स्वीकार भी कर लिया है और इस को आधार बना कर आर्यों के बारे में कई कुछ अनापशनाप प्रचारित किया जा रहा है |

कहा जाता है कि अति प्राचीन काल में एक आर्य जाति भारत के बाहर किसी भूखंड में रहती थी | वहां से प्राय: २५०० से १५०० ई० पूर्व उस जाति के लोग विभिन्न दलों में भारत,फारस,ग्रीस ,रोम,जर्मनी स्केंडिनेविया आदि देशों की और निकल पड़े | पहले कहा जाता था कि तत्कालीन असभ्य भारतीय ने दस्युओं को पराजित किया | परन्तु आजकल Toynbee,Piggott आदि लेखकों का मत ठीक इस के विपरीत है | इन के मत से आर्य लोग निम्नस्तर के असभ्य लोग थे | उन का मानना है कि हडप्पा और मोहनजोदड़ों के लोग सुसभ्य थे परन्तु वह उन से परास्त हो गए |”असभ्य आर्यों ने विजित सिन्धु सभ्यता से बहुत कुछ ग्रहण किया | वैदिक धर्म (सनातनी) धर्म और संस्कृति इस मिश्रित सभ्यता का परिणाम मात्र है |

यह दोनों मत भ्रमपूर्ण हैं | अनेकों प्रमाणों में से कुछ का उल्लेख करके यह स्पष्ट किया जायेगा कि वैदिक वर्णाश्रमी जाति इस देश में ३००० ई० पूर्व से बहुत पहले से ही निवास कर रही है |

१(क).ज्योतिष का प्रमाण -भारत में प्रचलित युधिष्ठराब्द और कल्यब्द कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद अनुमानत: ३१०२ ईo पूर्व से प्रचलित हो गया था |अतएव २५०० से १५०० ई० पूर्व के बीच का आर्य अभियान बिलकुल असत्य बात है | (ख) वेली ,वालेस आदि पाश्चात्य लेखकों ने गणित से प्रमाणित किया है कि भारतीय ज्योतिष सारणी ज्योमिती की सहायता से अति प्राचीन काल में यहाँ तक कि ३००० वर्ष ई० पूर्व निर्णित और लिपिबद्ध हो गयी थी |अतएव वैदिक सभ्यता उस से बहुत पूर्व वर्तमान थी ,इस में कोई भी संदेह नहीं है |

2. यजुर्वेदीय वंशब्राह्मण -शतपथ ब्राह्मण के अंतर्गत बृहदारण्यक उपनिषद महाभारत (३१०० ई० पूर्व ) से बहुत पहले लिखा गया था | इस उपनिषद में ब्रह्म बिद्या के वंश ब्राह्मण में जो गुरु शिष्य परम्परा पायी जाती है | इस से सिद्ध होता है कि इस बिद्या के आदि गुरु दधिची ऋषि पौतिभाष्य मुनि के ४७ वां पीढ़ी के आदि पुरुष थे | गुरु शिष्य की एक पीढ़ी में ५० वर्ष का समय मानना असंगत न होगा |अतएव देखा जाता है कि पौतिभाश्य का समय अनुमानत:३५०० ई० पूर्व मानने पर दधिची उन से ३५० वर्ष पूर्व अर्थात ५८५० ई० पूर्व बिद्यमान थे | अतएव अंतत: ५००० ई० पूर्व वैदिक सभ्यता भारत में थी ,यह विश्वास करना युक्तिहीन नहीं है |

सिन्धु सभ्यता का प्रमाण – मोहनजोदड़ों ,हडप्पा आदि स्थानों में जो प्राचीन ध्वंसावशेष मिले हैं ,वे २५०० वर्ष ई० पूर्व था इस से भी प्राचीन हैं | यह सिन्धु घाटी की सभ्यता वैदिक वर्णाश्रम सभ्यता थी ,यह निम्नलिखित प्रमाणों से प्रतिपादित होती है – (क)इन स्थानों में पाई गई मूर्तियों में आसनबद्धता ,नासाग्रदृष्टि आदि पाई जाती है | आसन योग का एक प्रधान अंग है | आसन लगा कर बैठने की पद्धति भारत के बाहर कहीं कभी न थी | यह चीन ,जापान और हिन्देशिया आदि में इस देश से ही गई है | नासाग्रदृष्टि मन को अन्तर्मुखी करने का एक योगिक उपाय है |अतएव सिन्धु सभ्यता संस्कृति वैदिक थी | (ख)-एक सील मुहर पर कलसी,काष्ट आदि के साथ श्मशान का दृश्य अंकित है | (ग)- खुदाई में कितने ही शिवलिंग पाए गए हैं |वैदिक सनातन धर्म को छोड़ कर अन्यंत्र शिवलिंग की पूजा कहीं नही होती | (घ)- जो सील मुहर ध्वशावशेष में पाए गए हैं ,उन में जो लिपि है,उस का पाठोद्वार पश्चमी देशों में अभीतक नहीं हुआ है | किन्तु सिलचर निवासी पंडित श्री महेंद्रचंदर ने कुछ मुहरों का किया है | एक सील में जो चित्र है ,उस में एक वृक्ष पर दो पक्षी चित्रित हैं ,एक पक्षी फल खा रहा है ,दूसरा कुछ खाता नहीं है,केवल देख रहा है | इस चित्र में सम्भवत: ईश्वर और जीव बिषयक एक सुप्रसिद्ध वेदमन्त्र का भाव अंकित हुआ है -दवा सुपर्णा इत्यादि |

पंडित जी ने इस लिपि को पढ़ा है | दो सुवर्ण (मुद्रा) | 2 सुवर्ण की ध्वनी का सुंदर मेल है और चित्र भी सम्भवत: इस मेल के कारण इस प्रकार से अंकित हुआ है | यदि यह अनुमान सत्य है और यही सम्भव है तो अंतत: यह प्रमाणित होता है कि सिन्धु सभ्यता इस वेद मन्त्र के बहुत बाद की है तथा सिन्धु सभ्यता के लोग वैदिक धर्म का ही पालन करते थे | और भी कई सीलों को पंडित जी ने पढ़ा है वे सब भी विभिन्न मुद्राओं के मान के द्योतक हैं -यथा 3 धरण,नव निष्क ,गुण चरण ,रजत दी नार ,पल आदि | ये सारे मुद्रा भारत में प्राचीन युग में ब्यवहार में लाये जाते थे तथा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में इन का उल्लेख मिलता है | उन का मत से यह सील व्यवसायी लोग हुंडी या वस्त्रादि विक्रय के द्र्व्यादी के ऊपर मुद्रांकन के लिए व्यबहार में लाते थे |यही सिधान्त युक्ति संगत है | पिगट ने भी Prehistoric India नामक ग्रन्थ में इस के अनुरूप ही मत प्रकाशित किया है |

ड- इन दोनों नगरों के ध्वंसावशेष में ईंटें बंधे कूप मौजूद हैं |इन के चारों और असंख्य मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े पड़े हुए हैं |इस को समझने में कष्ट नहीं होता कि जल पीन्रे के बाद वह फेंक दी गई होंगी | संसार की किसी दूसरी जाति में या किसी देश में ,स्पर्शास्पर्श या आहार शुद्धि और आचार ,इस को आजकल कूड़ा कहते हैं ,नहीं था और न है |केवल वैदिक जाति के शास्त्रानुसार मिट्टी के वर्तन को एक बार ओठ लगाने से ही वह अशुद्ध हो जाता है और उसे फेंक देते हैं |सिन्धु घाटी के वासी वैदिक धर्म को मानते थे और आचार का पालन करते थे |- यह टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तनों से पूर्णत: प्रमाणित होता है | ,इस लिए किसी तर्क की आवश्यकता नहीं और न संदेह के लिए ही कोई जगह रह जाती है |अतएव वैदिक धर्म इस देश में ५००० वर्ष ई० पूर्व में तथा बहुत पहले से मौजूद था,यह निश्चय हो जाता है|

४.-मेगास्थनीज का लेख – ग्रीक सम्राट सेल्यूकस के दूत मेगास्थनीज ने मौर्य राज्यसभा में कई वर्ष व्यतीत किये थे | उन के निबन्ध बिशेष महत्व पूर्ण हैं कि भारत में बहुत से लोग और जातियां हैं,परन्तु उन में कोई बाहर से आया हुआ था या विदेशी वाशिंदा नहीं है |१५०० ई० पूर्व तक भारत में आर्य-अभियान हुआ होता तो उस को प्राय: १००० बर्ष के भीतर ही लोग भूले नहीं होते | अतएव बाहर से आर्यों के अभियान की कहानी बिलकुल ही निर्मूल है और कपोल कल्पना मात्र है | अनादि काल से एतिहासिक मत से भी ६००० बर्ष के उपर से वैदिक भारतीय जाति भारत खंड में वास करती आ रही है ,इस में संदेह नहीं है |

पाश्चात्य लेखक ईसाई हैं ,ईसाई मत यहूदी धर्म की ही एक शाखा है | ईशा और उस के अनुयायी (शिष्यगण) यहूदी थे | अतएव पाश्चात्य जातियों का धर्म दर्शन सेमिटिक है | इस्लाम धर्म भी यहूदी और ईसाई मत पर अब्लम्बित है | इस के अतिरिक्त पाश्चात्य संस्कृति का मूल स्त्रोत ग्रीक रोमन आधारित है | अंग्रेजी,फ़्रांसिसी ,जर्मन,इतालियन आदि भाषाएँ भी मूलत: ग्रीक और लैटिन से निकली हैं ,इन की वर्णमाला इतिहास भी अनुरूप है |अतएव वर्तमान यूरोपीय और अमेरिकन सभ्यता सेमिटिक (यहूदी) ,पैगन,ग्रीकरोमिय तथा नोर्दिक,उतर यूरोपीय – इन सब संस्कृतियों की खिचड़ी है विभिन्न नर-नारियों के अबाध मिलन के फलस्वरूप इन सब समाजों में संकरता भी पर्याप्त हुई है |

केवल एक सौ वर्ष पहले पाश्चात्य लेखक अपने ईसाई तथा यहूदी धर्म ग्रंथों के अनुसार विश्वास करते थे कि पृथ्वी की सृष्टि और मानव जाति का उद्दभव केवल ४००४ ई० पूर्व अर्थात आज से प्राय: ५९६९ वर्ष पूर्व हुआ था | सनातन धर्म के पुराणों के अनुसार युग् भेद की बात सुन कर उन में से बहुतेरे इस बात को मजाक समझते थे | परन्तु नृतत्व ,पुरातत्व ,भूगर्भ आदि शास्त्रों की तथा भौगोलिक और एतिहासिक नाना प्रकार की वैज्ञानिक गवेषणा के फलस्वरूप क्रमश:यह प्रमाणित हो गया है और हो भी रहा है कि केवल ६००० वर्ष ही नहीं ,पृथ्वी की सृष्टि कोटि कोटि वर्ष पूर्व की घटना है |अंतत:४ लाख वर्ष पूर्व भी इस भूमि पर मनुष्य जाति का आस्तित्व था | ईसाई धर्म ग्रन्थ (Old Testament ) बाइबिल में वर्णित सृष्टि रचना की बात बिलकुल कल्पित और मिथ्या है | यह बात अब पाश्चात्य लेखक भी स्वीकार करने के लिए बाध्य हो गए हैं |

भारतीय वैदिक सभ्यता का उदय और भी अनेक युगों पूर्व हुआ था | इस के अतिरिक्त प्रागेतिहासिक युग में ईरान,एशियामाइनर ईराक,आदि देश वैदिक वर्णाश्रम के साथ संलिप्त थे ,इस का प्रमाण प्राप्त होता है सम्भवत:प्राचीन मेक्सिको और माया सभ्यता भी वैदिक संस्कृति से प्रभावित थीं |ईसा की दूसरी शताब्दी के बाद चीन,जापान,मध्य एशिया आदि देशों ने बौद्ध धर्म और उस के साथ थोडा बहुत भारतीय आचार व्यबहार को ग्रहण किया | पूर्व अफ्रीका,मदागास्कर द्वीप आदि देश भी वैदिक विचारधारा से प्रभावित हुए थे |

जम्बू द्वीपे भारत खंडे आर्यावर्त अंतर्गते अर्थात भारत ही आर्यों का देश है यहीं के निवासी हैं कहीं बाहर से नहीं आये हैं | जिन लोगों को विदेशी लेखकों पर विश्वास है उन्हें अपने पुराणों को पढ़ लेना चाहिए | यहीं से सब देशों में लोगों ने पलायन किया है सभी धर्मों और जातियों पर वैदिक सभ्यता का प्रभाव देखने को मिलता है | ऋषि अत्री के पुत्र ययाति के पुत्र तुर्वसु पारस {ईरान) चले गए थे उन की संताने यवन कहलाये ,उन के दूसरे पुत्र द्रुह्यु अफगानिस्तान ,बलोचिस्तान के शासक हुए राजा कांधार उन की ही पीढ़ी के थे इस वंश के अंतिम राजा प्रचेतस थे उन के बाद उन का इतिहास नहीं मिलता यही वंश आगे चल कर कबीलों में बंट गया | इन्हीं कबीलों से यहूदी धर्म निकला और यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म निकले | आर्य श्रेष्ठ पुरुष को कहा जाता था न की कोई जाति है ,हम यहाँ आये नहीं हैं बल्कि यहाँ से बाहर गये हैं |

इति –

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