आत्मा -परमात्मा
मनुष्य हमेशा प्रतिदिन की बातचीत में कई बार मैं शब्द का प्रयोग करता है लेकिन आश्चर्य है कि प्रतिदिन मैं और मेरा शब्द का कई बार प्रयोग करना के बाद भी वास्तव में यह नहीं जनता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है ,मैं शब्द किस बात का सूचक है | मैं क्या है? आज विज्ञानं ने बड़ी बड़ी खोजें कर ली हैं बड़ी बड़ी चीजें बना ली हैं ,अनेक जटिल समस्याओं का हल निकाल लिया है लेकिन मैं कहने वाला कौन है इस सच्चाई को नहीं जानता | आज किसी मनुष्य से पूछा जाए आप कौन हैं ,आप का परिचय क्या है तो वह अपने शरीर का नाम बता देगा वह क्या करता है उस का नाम बता देगा |
वास्तव में मैं शब्द शरीर से अलग चेतन सत्ता है जिसे आत्मा कहा जाता है | कोई भी जीव आत्मा और शरीर से मिल कर बनता है इसलिए इसे जीवात्मा कहा जाता है | शरीर पंच तत्व अर्थात पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश से बना है वैसे ही आत्मा मन,बुधिऔर संस्कारों द्वारा अपने आप को प्रदर्शित करती है |उस में सोचने और निर्णय करने की शक्ति होती है ,वह शरीर से भिन्न चेतना है और अविनाशी है |शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती अपनी मूल अवस्था में स्थिर रहती है |गीता में भी कहा गया है कि आत्मा अजर अमर है उसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती उसे किसी भी तरीके से नष्ट नहीं किया जा सकता उसे केवल दिव्य दृष्टि से ही देखा और महसूस किया जा सकता है ,इस का सम्बन्ध मस्तिष्क से जुड़ा होता है और मस्तिष्क का सम्बन्ध पूरे शरीर में फैले ज्ञान तन्तुओं से है |आत्मा में ही पहले संकल्प पैदा होता है और फिर मस्तिष्क और ज्ञान् तन्तुओं द्वारा व्यक्त होता है |आत्मा ही सुख दुःख का अनुभब करती है | आज आत्मा अपने आप को भूल गई है उस ने अपने आप को शरीर मान लिया है यही देह अभिमान दुःख का कारण है |आत्मा ही शरीर पर नियंत्रण करती है और आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण हो जाता है |इसलिए जिस मनुष्य को अपनी पहचान मालूम नहीं है वह दुखी और अशांत रहता है | सुख और शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है |
प्राकृतिक स्वरूप के बिना परमात्मा का जो स्थूल जगत रुपी आकर है यह उन की माया के महत्वपूर्ण गुणों से परमात्मा में ही उस की कल्पना की गई है जैसे बादल वायु के आश्रय रहते हैं परन्तु बिना ज्ञान के मनुष्य बादलों का आकाश में होना कहते हैं वैसे ही बिना ज्ञान के लोग सब की साक्षी आत्मा में स्थूल दिखाई देने वाले जगत का होना कहते हैं | इस जगत के बड़े आकर से परे परमात्मा का एक बहुत ही सूक्ष्म और अव्यक्त अर्थात जिस का वर्णन न किया जा सके रूप है जो न तो बड़े आकार आदि गुणों वाला है और न ही तो देखने सुनने ही आ सकता है ,वही परमात्मा का सूक्ष्म शरीर है | उसी का आरोप होने से यही जीव कहलाता है और बार बार इसी का जन्म होता है ,उपरोक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर अविद्या अर्थात अज्ञान से ही आत्मा में होना अर्थात आरोपित है |जिस अवस्था में आत्म स्वरूप के ज्ञान से यह आरोप दूर हो जाता है उसी समय ब्रह्म का दर्शन होता है अर्थात ज्ञान होता है |तत्व ज्ञानी लोग जानते है कि जिस समय यह बुद्धिमता परमात्मा की यह माया निवृत हो जाती है ,उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपने स्वरूप को जान लेता है | वास्तव में जिस का जन्म भी नहीं होता कोई कर्म भी नहीं होता उस परमात्मा के प्राकृत जन्म और कर्मों का वर्णन तत्वज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं |
भगवान की लीला बड़ी है इस लीला से ही इस जगत का सृजन ,पालन और संहार करते हैं लेकिन उस में आसक्त नहीं होते | प्राणीओं के अंतकरण में छिपे रह कर ज्ञानइन्द्रीओं और मन के द्वारा उन के विषयों को ग्रहण करते भी हैं और उन से अलग भी रहते हैं | वह परम स्वतंत्र है ,यह विषय कभी उन्हें लिप्त नहीं कर सकते |परमात्मा का वास्तविक स्वरूप एक रस,शांत एवं ज्ञान स्वरूप है |वह सत असत दोनों से परे हैं | जो कुछ भी संसार में हो रहा है वह सब उन की प्रेरणा से ही हो रहा है और नहीं भी हो रहा |पंचभूतों वाला यह शरीर नाशवान है लेकिन इस में रहने वाला मैं नष्ट नहीं होता वह आकाश रूप काल पुरुष का ही तो एक हिस्सा है ,नष्ट कैसे होगा ,अर्थात आत्मा और परमात्मा एक ही है ,आत्मा उसी परमात्मा का एक सूक्ष्म अंश है | परमात्मा स्थिर है तो आत्मा चलायमान कैसे हुई वह भी स्थिर है |
मुक्ति चाहने वालों अपने अंदर मैं रुपी चेतना को जान कर सांसारिक बिषयों से विरक्त होना होगा ,शरीर नाशवान है यह तो कभी भी नष्ट हो सकता है आत्मा अजर अमर और अविनाशी है और यह सब आप हो शरीर नहीं और यही सत्य है | जिस मनुष्य को अपनी पहचान नहीं वह दुखी और अशांत रहता है ,सुख और शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है ,जो आप हो वह आत्मा है शरीर नहीं ,जब यह सत्य मन में बैठ जाता है कि पंचभूतों से निर्मित शरीर कुछ भी नहीं केवल आत्मा का साक्षी रूप है तो देह अभिमान समाप्त हो जाता है और मनुष्य मुक्त हो जाता है | आत्मा परमात्मा एक ही है यही सत्य है |
