वैराग्य,धारणा,ध्यान

भौतिक सुखों के विषयों के प्रति उदासीनता विकसित करना वैराग्य है जिस ने सभी सांसारिक सुख और मोह माया का त्याग कर दिया है वह वैरागी होता है |गीता के अनुसार जीवन से विमुख होना नहीं है वल्कि मन की निर्भरता और भावनात्मक बंधन से मुक्त होना है जब हम निस्वार्थ भाव से काम करते हैं तो हमें शांति,स्पष्टता और सच्ची आन्तरिक स्वतन्त्रता प्राप्त होती है |

वेदों की वर्णन शैली ही इस प्रकार की है कि लोगों की बुद्धि स्वर्ग और निरर्थक नामों के चक्कर में फंस जाती है |मनुष्य वहां सुख की वासना से स्वप्न सा देखता हुआ भटकने लगता है |किन्तु उन माया लोकों में कहीं भी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं होती ,इसलिए ज्ञानी पुरुष को चाहिए की वह अलग अलग नाम वाले पदार्थों से उतना ही व्यबहार करे जितना प्रयोजनीय हो |अपनी बुद्धि को उन की निरर्थकता से दूर रखे |यदि संसार के पदार्थ यों ही मिल जाएँ ,तब उन को प्राप्त करने का परिश्रम व्यर्थ समझ कर उन के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए |जब जमीन पर सोने से काम चल सकता है ,तब पलंग के लिए क्यों प्रयत्न करे ,जब भुजाये अपने को स्वयं ही मिली हैं ,तब तकिये की क्या आवश्यकता | जब वस्त्र हीन रह कर भी यदि जीवन जिया जा सकता है तो वस्त्रों की क्या आवश्यकता |भूख लगने पर दूसरों के लिए ही शरीर धारण करने वाले वृक्ष क्या फल फूल की भिक्षा नहीं देते ? रहने के लिए पहाड़ों पर गुफाएं क्या बंद कर दी गई हैं ? सब न सही क्या भगवान् भी अपनी शरण में आये हुओं की रक्षा नहीं करते ?ऐसी स्थिति में बुद्धिमान लोग भी धन के नशे में चूर घमंडी पैसे वालों की चापलूसी क्यों करते हैं ? इस प्रकार विरक्त हो जाने पर अपने ह्रदय में नित्य विराजमान ,स्वत: सिद्ध ,आत्म स्वरूप ,परम सत्य जो अनंत भगवान् है ,बड़े प्रेम और आनंद से दृढ निश्चय कर के उन्हीं का भजन करें ,क्यों की उन के भजन से जन्म मृत्यु के चक्कर में डालने वाले अज्ञान का नाश हो जाता है | पशुओं की बात अलग है परन्तु मनुष्यों में कोन ऐसा है जो संसार रुपी वैतरणी नदी में गिर कर अपने कर्म से प्राप्त दुखों को भोगते हुए देख कर भी भगवान् का मंगलमय चिन्तन नहीं करेगा ,इन असत विषय भोगों में ही अपने चित को भटकने देगा |

कोई कोई साधक अपने शरीर के अंदर ह्र्द्यरूपी आकाश में विराजमान भगवान् के स्वरूप की धारणा करते हैं ,वे ऐसा ध्यान करते हैं कि भगवान की चार भुजाओं में शंख ,चक्र ,गदा और पद्म है ,उन के मुख पर प्रसन्नता झलक रही है ,कमल के समान विशाल और कोमल नेत्र हैं ,कदम्ब के फूल के केसर के समान पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं | भुजाओं में श्रेष्ठ रत्नों से जड़े हुए सोने के बाजूबंद सुशोभित हो रहे हैं ,सिर पर सुंदर मुकुट और कानों में कुंडल हैं | उन के चरण कमल योगेश्वरों के खिले हुए ह्रदय रुपी कमल की कर्णिकापर विराजित है | गले में कौस्तुभमणि लटक रही है ,उन के ह्रदय पर श्री वत्स का निशान एक सुनहरी रेखा है |वक्ष स्थल कभी न कुम्हला ने वाली वनमाला से घिरा हुआ है | वे कमर में करधनी,अंगुलिओं में बहुमूल्य अंगूठी, चरणों में नूपुर और हाथों में कंगन आदि आभूषण धारण किये हुए हैं | उन के वालों की लटें बहुत चिकनी ,निर्मल,घुंघराली और नीली हैं | जब तक मन इस धारणा के द्वारा स्थिर न हो जाए तब तक बार बार इन चिन्तन स्वरूप भगवान् को देखते रहने की चेष्टा करनी चाहिए |भगवान के चरण कमलों से लेकर उन के मुस्कान युक्त मुख कमल पर्यन्त समस्त अंगों की एक एक अंग का ध्यान ठीक ठीक होने लगे तब उसे छोड़ कर दुसरे अंग का ध्यान करना चाहिए | वे भगवान् दृश्य नहीं द्रष्टा हैं ,सगुण और निर्गुण सब कुछ इन्हीं का स्वरूप है | जब तक इन में अनन्य प्रेममय भक्तियोग न हो जाये तब तक साधक को नित्य नैमितिक कर्मों के बाद एकाग्रता से भगवान के उपर्युक्त स्थूल रूप का चिन्तन करना चाहिए |

जब योगी पुरुष इस मनुष्य लोक को छोड़ना चाहे तब देश और काल में मन को न लगाये ,सुख पूर्वक स्थिर आसन में बैठ कर प्राणों को जीत कर मन में इन्द्रिओं का संयम करे |उस के बाद निर्मल बुद्धि से मन को नियमित करके मन के साथ बुद्धि को क्षेत्रज्ञ में क्षेत्रज्ञ को अन्तरात्मा में लीन कर दे फिर अन्तरात्मा को परमात्मा में लीन कर के धीर पुरुष उस परम शांतिमय अवस्था में स्थित हो जाए ,फिर उस के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता |इस अवस्था में सत्वगुण भी नहीं है ,फिर रजोगुण और तमोगुण भी नहीं रहता |अहंकार ,महतत्व और प्रकृति का भी वहाँ अस्तित्व नहीं है | योगी लोग यह नहीं यह नहीं इस प्रकार परमात्मा से भिन्न पदार्थों का त्याग करना चाहते हैं और शरीर तथा उस के सम्बन्धी पदार्थों में आत्मबुद्धि का त्याग कर के ह्रदय के द्वारा पद पद पर भगवान के जिस परम पूज्य स्वरूप का आलिंगन करते हुए अनन्य प्रेम से परिपूर्ण रहता हैं ,वही भगवान् विष्णु का परम पद है -इस विषय में समस्त शास्त्रों की सम्मति है |

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