श्रीमद्भागवत द्वितीय:स्कन्ध: चतुर्थोSध्याय
विषय- राजा परीक्षित का सृष्टिविषयक प्रश्न और सृष्टि का आरम्भ
शुकदेव जी की बात सुन कर परीक्षित का मन और शांत हो जाता है |अब वह पूछते हैं कि यह सृष्टि कैसे बनी,भगवान पहले क्या करते हैं और दुनिया कैसे चलती है | चौथे अध्याय में सृष्टि का पूरा विज्ञान खुलता है |
नम: परस्मै पुरुषाय भूयसे सदुभद्वस्थाननिरोधलीलया |
गृहीतशक्तित्रितयाय देहिनामन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने ||
उन पुरुषोतम भगवान् के चरणकमलों में मेरा कोटि कोटि प्रणाम है,जो संसार की उत्पति ,स्थिति और प्रलय की लीला करने के लिए सत्व,रज तथा तमोगुणरूप तीन शक्तियों को स्वीकार कर ब्रम्हा,विष्णु और शंकर का रूप धारण करते हैं ,जो समस्त चर अचर प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं,जिन का स्वरूप और उस की उपलब्धी का मार्ग बुद्धि विषयक नहीं है ,जो स्वयं अनन्त हैं तथा जिन की महिमा भी अनन्त है |
व्याख्या – कोई भी काम शुरू करने से पहले भगवान का स्मरण किया जाता है |सृष्टि से पहले पुरुष अर्थात भगवान ही थे प्रकृति के तीनों रूप सत्व,रज और तम उन में साम्यवस्था में थे |फिर उन के हृदय में अहंकार पैदा होता है और सत्व,रज और तम प्रकट होते हैं और यही क्रमश: विष्णु,ब्रम्हा और शंकर का नाम धारण करते हैं ||पुरुष अर्थात यहाँ कृष्ण को पांच नाम दिए गये हैं :-
१. शुद्ध -जिस पर माया का कोई असर नहीं होता |
2. ब्रह्म – सब से बड़ा जिस से सब निकला |
3. परमात्मा -सब के दिल में बैठा हुआ है अर्थात सब के अन्दर है |
४. योगेश्वर- सारे योग उसी से निकले हैं |
५. योग -स्वयं ही जोड़ने वाली शक्ति |
राजा परीक्षित के छ: प्रश्न राजा ने पूछा कि – १. यह दुनिया कैसे बनी?, 2 -भगवान उस में रहते हुए भी उस में फंसते क्यों नहीं ? 3.-वह अपनी माया से कैसे खेल करते हैं ? ४- ब्रह्मा जी को ज्ञान कहाँ से मिला ? ५ – भगवान कहाँ रहते हैं ? ६. प्रलय के समय सब कहाँ जाता है ?
शुकदेव जीके उतर – सृष्टि से पहले केवल भगवान ही थे -न दिन था न रात न धरती न आकाश ,सिर्फ भगवान् अपनी शक्ति के साथ सो रहे थे अर्थात अदृश्य थे | उन की नाभि से कमल निकलता है और उस में ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं | ब्रह्मा जी को तप करने का आदेश -आकाशबाणी हुई कि तप करो उन्हें तप से ज्ञान मिला | ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची -भगवान की शक्ति से ब्रह्मा जी ने १४ लोक,पहाड़,नदियाँ,देवता,मनुष्य यनी सभी कुछ बनाया |
आज की सीख –
शरणागति – कोई भी काम शुरू करो तो त्वाह्म शरण गत: बोलो ,मैं तेरी शरण में हूँ ,डर खत्म हो जाएगा |
सवाल पूछो – राजा परीक्षित की तरह ज्ञान के लिए सवाल पूछना पाप नहीं है |शंका समाधान से ही भक्ति पक्की होती है |
तप का अर्थ- तप सिर्फ जंगल में बैठना नहीं है अपने काम को इमानदारी से करना ही तप है उसी से ज्ञान प्राप्त होता है |
निष्कर्ष – चौथा अध्याय बताता है कि दुनिया अपने आप नहीं बनी |एक शक्ति है जो यह सब कर रही है उस शक्ति का नाम कृष्ण है | जो उस की शरण में आ गया उस का बेडा पार है | कृष्ण क्या है ,विष्णु,ब्रह्मा और शंकर क्या है, इन के बारे में अगले अध्याय सृष्टि वर्णन में विस्तार से बताया जायेगा ,विस्तार से जानने के लिए मेरी पोस्टें पढ़ते रहिये |
लेखक – मदन लाल शर्मा
वेबसाइट – thegodweknow.com
