प्रथम:स्कन्ध:-पंचमोंSध्याय (श्रीमद्भागवत)

महऋषि व्यास जी ने महाभारत की रचना की थी ,वे धर्म आदि पुरुषार्थों से परिपूर्ण थे ,सनातन ब्रह्म तत्व को भी जानते थे ,समस्त गोपनीय रहस्यों को भी जानते थे उन्होंने पुराण पुरुष की उपासना की थी ,जो प्रकृति-पुरुष के स्वामी हैं और असंग रहते हुए ही अपने संकल्प मात्र से गुणों के द्वारा संसार की सृष्टि ,स्थिति और प्रलय करते रहते हैं | योगानुष्ठान और नियमों द्वारा परब्रह्म और शब्दब्रह्म दोनों की पूर्ण प्राप्ति कर लेने पर भी अपने आप में कमी महसूस कर रहे थे | अपने आप में जो कमी रह गई है उसी का समाधान करने हेतु वे नारद जी से प्रार्थना करते हैं | देवऋषि नारद जी उन्हें भगवान् जो प्रकृति -पुरुष के भी स्वामी हैं स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हैं उन के यश का गान न करना बताते हैं | नारद जी कहते हैं – आप ने भगवान् के निर्मल यश का गान नहीं किया | मेरा मानना है कि जिस से भगवान् संतुष्ट नहीं होते,वह शास्त्र का ज्ञान अधूरा है | आप ने धर्म आदि पुरुषार्थों का जैसा वर्णन किया है ,भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का वैसा बर्णन नहीं किया |

भगवान अनंत हैं | कोई विचारवान ज्ञानी पुरुष ही संसार की और से निवृत हो कर उन के स्वरूपभूत परमानन्द का अनुभव कर सकता है अत: जो लोग पारमार्थिक बुद्धि से रहित हैं और गुणों के द्वारा नचाये जा रहे हैं ,उन के कल्याण के लिए ही आप भगवान् की लीलाओं का सर्वसाधारण के हित की दृष्टि से बर्णन कीजिये |जो मनुष्य अपने धर्म का त्याग कर के भगवान के चरण कमलों का भजन सेवन करता है उस का कोई अमंगल नहीं हो सकता | बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह उसी वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करे ,जो तिनके से ले कर ब्रह्मा पर्यन्त समस्त छोटी बड़ी योनियों में कर्मों के फलस्वरूप आने जाने पर भी स्वयं प्राप्त नहीं होती | जो भगवान श्री कृष्ण के चरणारविन्द का सेवक है,वह भजन न करने वाले कर्मींमनुष्यों के समान कभी बुरा भाव हो जाने पर भी जन्म-मृत्युमय संसार में नहीं आता | वह भगवान के चरण कमलों का स्मरण करके फिर उसे छोड़ना नहीं चाहता ,उसे रस का चस्का जो लग चूका है | जिन से जगत की उत्पति ,स्थिति और प्रलय होते हैं ,वे भगवान ही इस विश्व के रूप में भी हैं ,ऐसा होने पर भी वे इस से विलक्ष्ण हैं | इस बात को आप स्वयं जानते हैं आप की दृष्टि अमोघ है आप भगवान पुरुषोतम के कलावतार हैं | आप ने अजन्मा हो कर भी विश्व कल्याण के लिए जन्म लिया है | इसलिए आप विशेषरूप से भगवान की लीलाओं का कीर्तन कीजिये | विद्वानों ने भी इस बात का निरूपण किया है कि मनुष्य की तपस्या ,वेदाध्ययन ,यज्ञानुष्ठान,स्वाध्याय ,ज्ञान और दान का एक मात्र प्रयोजन यही है कि पुण्य कीर्ति श्री कृष्ण के गुणों और लीलाओं का वर्णन किया जाए |

पुरुषोतम भगवान श्री कृष्ण के प्रति समस्त कर्मों को समर्पित कर देना ही संसार के तीनों तापों की एकमात्र औषधि है , प्राणियों को जिस पदार्थ के सेवन से जो रोग हो जाता है ,वही पदार्थ चिकित्सा विधि के अनुसार प्रयोग करने पर क्या उस रोग को दूर नहीं करता ? इसी प्रकार सभी कर्म मनुष्यों को जन्म मृत्यु रूप संसार के चक्र में डालने वाले हैं ,तथापि जब वे भगवान को समर्पित कर दिए जाते हैं ,तब उन का कर्मपना ही नष्ट हो जाता है | इस लोक में जो शास्त्रविहित कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किये जाते हैं ,उन्हीं से पराभक्ति युक्त ज्ञान की प्रप्ति होती है |
उस भगवदर्थ कर्म के मार्ग में भगवान की आज्ञानुसार आचरण करते हुए लोग बार बार भगवान श्री कृष्ण के गुण और नामों का कीर्तन तथा स्मरण करते हैं | प्रभो ,आप भगवान वासुदेव को नमस्कार है ,हम आप का ध्यान करते हैं | प्रदुम्न ,अनिरूद्ध और संकर्षण को भी नमस्कार है ,इस प्रकार जो पुरुष चतुर्व्युहरुपी भगवान की मूर्तियों के नाम द्वारा प्राकृत -मूर्तिरहित अप्राकृत मन्त्र मूर्ति भगवान का पूजन करता है ,उसी का ज्ञान पूर्ण एवं यथार्थ है |

आप का ज्ञान पूर्ण है ,आप भगवान् की ही कीर्ति का -उन की प्रेममयी लीला का बर्णन कीजिये | उसी से बड़े बड़े ज्ञानियों की भी जिज्ञासा पूर्ण होती है | जो लोग दु:खों के द्वारा बार बार रौंदे जा रहे हैं ,उन के दु:ख की शान्ति इसी से हो सकती है ,और कोई उपाय नहीं है |

इति-पंचमोंSध्याय

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