अथ दशमोSध्याय -प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत )

श्रीकृष्ण का द्वारका गमन -सम्पूर्ण सृष्टि को उज्जीवित करने वाले श्री हरी परस्पर क्ल्हाग्नि से दग्ध कुरुवंश को पुन: अंकुरित कर और युधिष्ठर को उनके राज्य सिंहासन पर बैठा कर बहुत प्रसन्न हुए | भीष्मपितामह और भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों को सुन कर उन के अंत:करण में ज्ञान का उदय हुआ और भ्रान्ति मिट गयी | भगवान के आश्रय में रह कर वे इंद्र के समान शासन करने लगे | महाराज युधिष्ठर के राज्य में किसी प्राणी को कभी भी आधी व्याधि अथवा दैहिक,भौतिक और आत्मिक क्लेश नहीं होते थे |

अपने बन्धुओं का शोक मिटाने के लिए और बहिन सुभद्रा की प्रसन्नता के लिए भगवान श्रीकृष्ण कई महीनों तक हस्तिनापुर में ही रहे | फिर जब उन्होंने राजा युधिष्ठर से द्वारका जाने की अनुमति मांगी ,तब राजा ने उन्हें अपने हृदय से लगा कर स्वीकृति दे दी | उस समय सुभद्रा,द्रोपदी ,उतरा,गान्धारी,धृतराष्ट्र ,युयुत्सु ,कृपाचार्य,नकुल ,सहदेव,भीमसेन,धौम्य,और सत्यवती आदि सब श्रीकृष्ण की विरह में व्याकुल हो गए | उन्हीं भगवान के दर्शन तथा स्पर्श से ,उन के साथ अलाप करने से तथा साथ साथ सोने ,उठने बैठने और भोजन करने से जिनका सम्पूर्ण हृदय उन्हें समर्पित हो चूका था ,वे पांडव भला ,उन का विरह कैसे सह सकते थे | भगवान श्रीकृष्ण के घर से चलते समय उन के बन्धुओं की स्त्रियों के नेत्र उत्कंठा वश उमड़ते हुए आंसुओं से भर आये ,परन्तु इस भय से कि कहीं यात्रा के समय अशकुन न हो जाए ,उन्होंने बड़ी कठिनाई से उन्हें रोक रखा |

भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्थान के समय मृदंग,शंख,भेरी,बीणा ,ढोल,नरसिंगे,धुन्धवी,नगारे,घंटे,और दुन्दुभियाँ आदि बाजे बजने लगे | भगवान की दर्शन की लालसा से कुरुवंश की स्त्रिया अटारियों परे चढ़ कर प्रेम लज्जा एवं मुस्कान से युक्त चितवन से भगवान को देखती हुई पुष्प वर्षा करने लगीं | मार्ग में भगवान श्रीकृष्ण पर चारों और से पुष्पों की वर्षा ही रही थी | बड़ी ही मनमोहक झांकी थी | जहाँ तहां ब्राह्मणों के दिये हुए सत्य आशीर्बाद सुनाई पड़ रहे थे | वे सगुण भगवान के अनुरूप तो थे ही ,क्यों कि उन में सब कुछ है परन्तु निर्गुण के अनुरूप नहीं थे |,क्यों कि उन में कोई प्राकृत गुण नहीं है |

हस्तिनापुर की औरतें आपस में बातचीत कर रही हैं कि श्रीकृष्ण सनातन परम पुरुष हैं ,जो प्रलय के समय भी अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं | उस समय सृष्टि के तीनों गुण सत्व,रज और तम भी नहीं रहते ,उस ईश्वर में जीव भी लीन हो जाते हैं और महत्व आदि समस्त शक्तियाँ अपने कारण अव्यक्त में मिल जाती हैं | उन्होंने ही फिर अपने नाम रूप सहित स्वरूप में नाम रूप के निर्माण की इच्छा की ,तथा अपनी काल शक्ति से प्रेरित प्रकृति का ,जो की उन के अंशभूत जीवों को मोहित कर लेती है और सृष्टि की रचना में प्रवृत रहती है ,अनुसरण क्रिया और व्यबहार के लिए वेदादि शास्त्रों की रचना की | इस जगत में जिस के स्वरूप का साक्षात्कार जितेन्द्रिय योगी अपने प्राणों को वश में करके भक्ति निर्मल हृदय में किया करते हैं ,श्रीकृष्ण वही साक्षात परब्रह्म हैं | वास्तव में इन्हीं की भक्ति से अंत:करण की पूर्ण शुद्धि हो सकती है ,योगादि द्वारा नहीं | वास्तव में ये वही हैं जिन की सुन्दर लीलाओं का गायन वेदों में और दूसरे गोपनीय शास्त्रों में व्यासादि रहस्यवादी ऋषियों ने किया है -जो एक अद्वितीय ईश्वर हैं और अपनी लीला से जगत की सृष्टि,पालन तथा संहार करते हैं परन्तु उन में आसक्त नहीं होते | जब तामसी बुद्धि वाले राजा अधर्म से अपना पेट पालने लगते हैं तब ये ही सत्व गुण को स्वीकार कर एश्वर्य ,सत्य,दया,और यश प्रकट करते हैं और संसार के कल्याण के लिए युग युग में अनेकों अवतार ग्रहण करते हैं | यदुवंश धन्य है जहाँ इन्होंने जन्म लिया ,बाल लीलाएं की और मद में मतवाले राजाओं का मान मर्दन किया , इन की महिमा का वर्णन कोई क्या करे |

हस्तिनापुर की स्त्रियाँ इस प्रकार बातचीत कर रहीं थीं कि भगवान श्रीकृष्ण मंद मंद मुसकान और प्रेम पूर्ण चितवन से उन का अभिनन्दन करते हुए वहां से विदा हो गये | युधिष्ठर ने भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए हाथी,घोड़े,रथ,और पैदल सेना उन के साथ कर दी ,उन्हें स्नेह वश यह शंका हो गयी थी कि कहीं रास्ते में शत्रु इन पर आक्रमण न कर दें | वे लोग उस समय भाबी विरह से व्याकुल हो रहे थे |भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बहुत आग्रह करके विदा किया और सात्यकी ,उद्धव आदि प्रेमी मित्रों के साथ द्वारका की यात्रा की |

इति दशमोSध्याय

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