तृतीयोSध्याय:-प्रथम:स्कन्ध:
सृष्टि के आदि में भगवान् ने लोकों के निर्माण की इच्छा से पुरुष रूप धारण किया | उस में दस इन्द्रियां ,एक मन और पांच भूत – यह सोलह कलाएं थी | उन्होंने सृष्टि का कारण -योग निंद्रा में रहते हुए ब्रह्मा अर्थात रज की उत्पति की और उसी रज के कारण उस पुरुष में ही समस्त लोकों की उत्पति की गई वह भगवान् का विशुद्ध रूप है | योगी लोग दिव्य दृष्टि से भगवान् के उसी रूप का दर्शन करते हैं | भगवान् का वह रूप हजारों पैर,जांघें ,भुजाएं,और मुखों के कारण अत्यंत बिलक्षण है ,उस में सहस्त्रों सिर,हजारों कान,हजारों आँखें और हजारों नासिकायें हैं | हजारों मुकुट,वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह सुसजित रहता है अर्थात पूरा ब्रह्मांड ही भगवान् का पुरुष रूप है जिसे नारायण कहते हैं अनेक अवतारों का कोष भी है -इसी से सारे अवतार प्रकट होते हैं | इस रूप के छोटे से छोटे अंश से देवता ,पशु पक्षी और मनुष्य आदि योनियों की सृष्टि होती है |
उन्हीं प्रभु ने पहले कौमारसर्ग में सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार – इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार लिया तथा अत्यंत कठिन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया |दूसरी बार इस संसार के कल्याण हेतु रसातल में गई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर रूप धारण किया | ऋषियों की सृष्टि में उन्होंने देवऋषि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्र का उपदेश दिया ,उस में कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्म बंधन से मुक्ति मिलती है ,इस का वर्णन है | धर्मपत्नी मूर्ती के गर्भ से उन्होंने नर-नारायण के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया | इस अवतार में उन्होंने ऋषि बन कर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की | पांचवें अवतार में वे स्वामी कपिल के रूप में प्रकट हुए और तत्वों का निर्णय करने वाले सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया |जिस में बताया गया है कि पुरुष और प्रकृति ही सृष्टि की उत्पति का मूल कारण है | अनसूया के वर मांगने पर छठे अवतार में अत्री की सन्तान -दतात्रेय हुए | इस अवतार में उन्होंने अलर्क,एवं प्रहलाद आदि को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश किया | सातवीं बार रूचि प्रजापति की आकूति नामक पत्नी से यग्य के रूप में उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की | राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभ देव के रूप में भगवान् ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया ,इस रूप में उन्होंने परमहंसों का वह मार्ग ,जो सभी आश्रमियों के लिए वन्दनीय है ,दिखाया | ऋषियों की प्रार्थना से नवी बार वे राजा पृथु के रूप में अवतीर्ण हुए | इस अवतार में उन्होंने पृथ्वी से समस्त औषधियों का दोहन किया था ,इस से उन का यह अवतार सब के लिए बड़ा ही कल्याणकारी हुआ | चाक्षुष मन्वन्तर के अंत में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी तब उन्होंने मत्स्य के रूप में दसवां अवतार ग्रहण किया और पृथ्वी रुपी नौका पर बैठा कर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की | जिस समय देवता और दैत्य समुद्र मंथन कर रहे थे तो उस समय ग्यारहवां अवतार धारण कर के कच्छपरूप से भगवान् ने मन्दराचल को अपनी पीठ पार धारण किया | बारह्बीं बार धन्वन्तरी के रूप में अमृत ले कर समुद्र से प्रकट हुए और तेरहवी बार मोहिनिरूप धारण कर के दैत्यों को मोहित करते हुए देवताओं को अमृत पिलाया | चौदहवें अवतार में उन्होंने नरसिंह रूप धारण किया और अत्यंत बलबान दैत्यराज हिरण्यकशीयप की छाती अपने नखों से अनायास ही फाड़ डाली | पंद्रहवी बार वामन का रूप धारण करके दैत्यराज बलि के यग्य में गए |वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य ,परन्तु मांगी उन्होंने तीन पग पृथ्वी |सोलहवें परशुरराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गए हैं ,तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया | इस के बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशर जी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए | उस समय लोगों की समझ और धारना शक्ति कम देख कर आप ने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएं बना दीं | अठारहवीं बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजा के रूप में रामावतार ग्रहण किया और सेतु बंधन ,रावण वध आदि वीरतापूर्ण बहुत सी लीलाएं की |उन्नीसवे और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदुवंश में बल राम और श्रीकृष्ण नाम से प्रकट हो कर पृथ्वी का भार उतारा |इसके बाद कलियुग आ जाने पर बुद्धा अवतार हुआ | इस के बाद जब कलियुग का अन्त समीप आएगा और राजा लोग लुटेरे हो जायेगे तब जगत के रक्षक भगवान् विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे |
जैसे बड़े सरोवर से हजारों छोटे छोटे नाले निकलते हैं ,वैसे ही सत्व निधि भगवान् श्रीहरि के असख्य अवतार हुआ करते हैं |ऋषि मनु ,देवता,प्रजापति ,मनु पुत्र और जितने भी महान शक्तिशाली हैं,वे सब के सब भगवान् के ही अंश हैं |यह सब अवतार तो भगवान के अंशावतार हैं ,परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान ही हैं | जब दैत्यों के अत्याचार बढ़ जाते हैं तब तब उन की रक्षा के लिए युग युग में अनेक रूप धारण कर के भगवान उन की रक्षा करते हैं | भगवान के जन्मों की यह दिव्य कथा अत्यंत गोपनीय है जो मनुष्य एकाग्र चित से नियम पूर्वक सायं काल और सुबह प्रेम से इस का पाठ करता है ,वह सब दुखों से छूट जाता ही |
प्राकृत स्वरूप रहित भगवान का जो यह दर्शनीय जगत रूप है इसी में उन की माया की कल्पना की गई है |जैसे बादल वायु के आश्रय रहते हैं और धूल का धुन्लापन धुल में होता है परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलों का आकाश में और धूसरपने का होना वायु में मानते हैं | वैसे ही अज्ञानी लोग आत्मा का होना इस जगत में मानते हैं अर्थात आत्मा का सम्बन्ध शरीर के साथ मानते हैं | जगत के इस विशाल रूप से परे भगवान का एक सूक्ष्म जो जाना न जा सके ऐसा रूप है अर्थात अव्यक्त रूप है |-जो न तो स्थूल अर्थात विशाल की तरह आकारादि गुणों वाला है और न देखने ,सुनने में ही आ सकता है ,वही सूक्ष्म शरीर है |आत्मा का प्रवेश होने से यही जीव कहलाता है और इसी का बार बार जन्म होता है |उपर्युक्त सूक्ष्म और बिशाल शरीर अज्ञान के कारण आत्मा में आरोपित हैं | जिस अवस्था में आत्मस्वरूप के ज्ञान से यह आरोप दूर हो जाता है ,उसी समय ब्रह्म का साक्षात्कार होता है |तत्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिमता ईश्वर की माया निवृत हो जाती है ,उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपने स्वरूप को जान जाता है | वास्तव में जिस का जन्म और कर्म भी नहीं होता ,उस परमेश्वर का अप्राकृत जन्म और कर्मों का तत्व ज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं ,क्यों कि उन का जन्म और कर्म वेदों के अत्यंत गोपनीय रहस्य हैं |
भगवान की लीला अमोघ है |वे इस लीला से ही इस जगत का सृजन,पालन और संहार करते हैं ,किन्तु इसमें आसक्त नहीं होते | प्राणियों के अंत:करण में छिपे रह कर ज्ञानेद्रिय और मन के नियन्ता के रूप में उन के बिषयों को ग्रहण करते भी हैं और उन से अलग भी रहते हैं | वे परम स्वतंत्र हैं -यह विषय वासना कभी उन्हें लिप्त नहीं कर सकते | भगवान की शक्ति और पराक्रम अनन्त है – उस की कोई थाह नहीं पा सकता ,वे सारे जगत के निर्माता होने पर भी उस से सर्वथा परे हैं | उन के स्वरूप को वही जान सकता है ,जो नित्य निरंन्तर निष्कपट सेवा भाव से उन का चिन्तन करता रहता है |
इति-प्रथम स्कन्ध तृतीयSध्याय
