प्रथम:स्कन्ध:-द्वितीयोSध्याय
सूत जी कहते हैं कि श्रीमद्भागवत अत्यंत गोपनीय रहस्यात्मक पुराण है | यह समस्त वेदों का सार है | जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकार से पार जाना चाहते हैं उन के लिए यह मार्गदर्शक का काम करता है | संसार और अंत:करण के समस्त विकारों पर बिजय पाने के लिए इस भागवत पुराण को पढना चाहिए | मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है जिस से भगवान श्री कृष्ण की भक्ति हो |भक्ति निष्काम होनी चाहिए और निरन्तर होनी चाहिए ऐसी भक्ति से हृदय आनन्दस्वरूप परमात्मा की उपलब्धी करके कृतार्थ हो जाता है तथा निष्काम ज्ञान और वैराग्य का भाव उत्पन्न हो जाता है | धर्म का ठीक ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि हृदय में भगवान् की लीलाओं के प्रति प्रेम उत्पन्न न हो तो ऐसा श्रम करना बेकार है | धर्म का फल मोक्ष होता है न कि अर्थ अर्थात धन भोगविलास उस का फल नहीं माना जा सकता | न ही स्वर्ग प्राप्ति उस का फल है | तत्ववेता लोग ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखंड सचिदानन्दस्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं | मुनिजन भागवत सुनने से प्राप्त ज्ञान=वैराग्य युक्त भक्ति से अपने हृदय में उस परम तत्व रूप परमात्मा का अनुभव करते हैं |
भगवान् श्रीकृष्ण के यश का गान करने से,सुनने से,श्रद्धा के कारण भगवत कथा में रुचि पैदा होती है | वे अपनी कथाओं को सुनने वालों के हृदय में स्थित हो कर उन के मन की वासनाओं को नष्ट कर देते हैं तथा मन पवित्र हो जाता है और भगवान् के प्रति प्रेम पैदा होता है | तब रजोगुण और तमोगुण -काम और लोभ आदि शांत हो जाते हैं और हृदय इन से रहित हो कर सत्व गुण में स्थित और निर्मल हो जाता है |इस प्रकार भगवान् की प्रेममयी भक्ति से जब संसार की समस्त आसक्तियां मिट जाती हैं ,हृदय आनंद से भर जाता है तब भगवान् के तत्व का अनुभव अपने आप हो जाता है | हृदय में आत्मस्वरूप भगवान् का साक्षात्कार होते ही हृदय के सारे संदेह मिट जाते हैं और कर्म बंधन भी क्षीण हो जाता है | इसलिए बुद्धिमान लोग नित्य निरन्नतर बड़े आनंद से श्रीकृष्ण की प्रेम भक्ति करते हैं जिस से उन्हें आत्म् प्रसाद की प्राप्ति होती है|
प्रकृति के तीन गुण हैं-सत्व,रज और तम इन्हीं से संसार की स्थिति,उत्पति और प्रलय के लिए परमात्मा ही विष्णु,ब्रह्मा और शिव -यह तीन नाम ग्रहण करते हैं ,अर्थात विष्णु,ब्रह्मा और शिव इन्हीं तत्वों को कहा जाता है | फिर भी मनुष्य का कल्याण सत्व तत्व अर्थात श्रीहरि से ही होता है | तमों गुण से रजो गुण श्रेष्ठ है वैसे ही रजो गुण से सत्व गुण श्रेष्ठ है क्यों की यह भगवान् का दर्शन करवाने वाला है | पहले लोग अपने कल्याण के लिए विशुद्ध सत्वमय भगवान् विष्णु की आराधना किया करते थे | जो लोग इस संसार सागर से पार जाना चाहते हैं वे सत्व गुणी भगवान् श्री विष्णु के अंश के कला स्वरूपों की ही उपासना करते हैं | परन्तु जिन का स्वभाव रजोगुणी या तमोगुणी है वे धन,एश्वर्य और सन्तान की कामना से भूत ,पितर और प्रजापतियों की उपासना करते हैं क्यों कि इन लोगों का स्वभाव उन से मिलता जुलता है | वेदों का तात्पर्य श्रीकृष्ण से ही है योग और समस्त कर्मों की समाप्ति भी श्रीकृष्ण में ही है |ज्ञानसे ब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण की ही प्राप्ति होती है | तपस्या ,धर्मों का अनुष्ठान और सभी गतियाँ श्रीकृष्ण में ही समा जातीं हैं ,भगवान् श्री कृष्ण प्रकृति और उस के इन तीन गुणों अर्थात सत्व,रज और् तम से उपर हैं फिर भी अपनी माया से इस संसार की रचना की है | यह सत्व,रज और तम उन्हीं की माया के लिवास हैं इन्हीं के अंदर रह कर वे इन्हीं की तरह मालूम पड़ते हैं | अग्नि तो एक ही है परन्तु वह अनेक प्रकार की लकड़ियों में प्रकट होती है | वैसे ही आत्म रूप भगवान् तो एक ही हैं परन्तु प्राणियों की अनेकता के कारण अनेक जान पड़ते हैं |
भगवान् ही सूक्ष्म भूत -तन्मात्रा ,इन्द्रिय तथा अंत:करण आदि गुणों के विकारभूत भावों के द्वारा अनेक प्रकार की योनियों की रचना करते हैं और उन में भिन्न भिन्न जीवों के रूप में प्रवेश करके उन उन योनियों के अनुरूप विषयों का उपभोग करते कराते हैं | वे ही समस्त लोकों का निर्माण करते हैं और देवी देवता ,पशु पक्षी ,मनुष्य आदि योनियों में लीला-अवतार ग्रहण करके सत्वगुण से जीवों का पालन पोषण करते हैं |
इति द्वितीSध्याय प्रथमस्कन्धे
