वाराह अवतार की दिव्य कथा
तृतीय स्कन्द के त्रयोदशोSध्याय में ब्रह्मा जी की मानसिक सृष्टि का वर्णन सुनने के बाद विदुर जी के मन में जिज्ञासा और बढ़ गई | उन्होंने मैत्रेय मिनी से पूछा -हे भगवन ,आप ने बताया कि ब्रह्मा जी ने देवता,ऋषि मनु आदि की रचना की,फिर आगे सृष्टि का विस्तार कैसे हुआ ?
विदुर जी के प्रश्न पर मैत्रेय मुनि मुस्कुराए और बोले- हे विदुर,जब ब्रह्मा जी ने अपने मन से मरीचि,अत्री,अंगीरा आदि प्रजापतियों को उत्प्न्न किया ,तब भी उन्हें संतोष नहीं हुआ | उन्हें लगा कि सृष्टि अभी अधूरी है |वे विचार मग्न हो गए | इसी चिन्तन में अचानक उन के मुख से चार वेद प्रकट हुए,फिर उन के चार मुखों से ही धर्म के चार चरण-सत्य,तप,दया और दान तथा आश्रम व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ |
परन्तु ब्रह्मा जी के मन में एक और व्याकुलता थी | उन्होंने देखा कि इन के द्वारा रची गई अधिकाँश सृष्टि का स्वभाव तामसिक है ,जो अज्ञान में डूबी है ” वे सोचने लगे कि ऐसी सृष्टि से तो संसार अन्धकार में बढ़ेगा |इसी ग्लानी से उन्होंने अपने उस तामसिक शरीर का त्याग किया | कहते हैं ,ब्रह्मा जी के उस त्यागे हुए शरीर से ही अन्धकार ,निंद्रा,भय और क्रोध जैसे भावों की उत्पति हुई,जो राक्षस और यक्ष योनियों में चले गए |
अब ब्रह्मा जी ने सात्विक मन से पुन: सृष्टि का संकल्प लिया | उन्होंने अपने आप को कमल पर बैठा पाया ,जिस की नाल भगवान विष्णु की नाभि से निकली थी |उन्हें यह बोध हुआ कि सृष्टि का मूल आधार तो वे परमपुरुष ही है | उन्होंने सैकड़ों वर्षों तक तपस्या करके भगवान् गरुडध्वज की स्तुति की,उन की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान ने उन्हें सृष्टि रचने का ज्ञान दिया |
इस के बाद ब्रह्मा जी ने सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार नामक चार कुमारों को अपने मन से उत्पन्न किया |वे चाहते थे कि ये सृष्टि को आगे बढायें ,परन्तु वे चारों बालक जन्म से ही परमहंस और विरक्त थे | उन्होंने कहा-पितामह,हम भक्ति मार्ग पर चलेंगे ,हमें माया में नहीं बंधना |यह कह कर वे भगवान के ध्यान में लीन हो गए |अपने पुत्रों की इस अवज्ञा से ब्रह्मा जी को बड़ा क्रोध आया |उन्होंने क्रोध को रोकने का बहुत प्रयास किया ,परन्तु वह उन की भौंहों के बीच से एक नील-लोहित बालक के रूप में प्रकट हो गया | वही बालक रूद्र कहलाया जो आगे चल कर भगवान शिव के रूप में प्रसिद्ध हुआ| रोते हुए जन्म लेने के कारण उन का नाम रूद्र पड़ा |ब्रह्मा जी ने इन्हें रहने के लिए हृदय,इन्द्रिय,प्राण,आकाश ,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी,सूर्य,चंद्रमा,और तप ग्यारह स्थान दिए |
इसी क्रम में ब्रह्मा जी ने धर्म को उत्पन्न किया,जिस से माया,मृत्यु और लोभ आदि का विस्तार हुआ | फिर उन्होंने अपने शरीर के दो भाग किये |दहिने भाग से स्वायम्भुव मनु और वाएं भाग से शतरूपा रानी प्रकट हुई|मनु और शतरूपा ही मानव सृष्टि के आदि माता पिता बने | एक दिन स्वायम्भुव मनु ने हाथ जोड़ कर ब्रह्मा जी से कहा- हे तात ,आप ने हमें उत्पन्न किया है,अब हमारे रहने और प्रजा बढाने के लिए कोई स्थान बताइए | यह सुन कर ब्रह्मा जी विचार करने लगे | तभी उन्हें ध्यान आया कि सृष्टि के आरम्भ में पृथ्वी तो प्रलय के जल में डूबी हुई है | हिरण्याक्ष नामक महापराक्रमी दैत्य ने पृथ्वी को चुरा कर रसातल में छिपा दिया है | तब तक पृथ्वी का उद्धार नहीं होगा ,तब तक सृष्टि कैसे बसेगी ?
ब्रह्मा जी इसी चिंता में डूबे हुए थे कि अचानक उन की नासिका से अंगूठे के आकार का एक छोटा सा श्वेत वराह शावक निकला ,देखते ही देखते वह वराह आकाश में स्थित हो गया और हाथी के बराबर विशाल हो गया | उस की घुरघुराहट से सारी दिशाएँ गूँज उठीं | ब्रह्मा जी ,मरीचि और मुनि और सनकादि आश्चर्य चकित हो कर उस अदभुत प्राणी को देखने लगे | वेदज्ञ मुनियों ने स्तुति करते हुए कहा- यह कोई साधारण वराह नहीं ,स्वयं यज्ञ पुरुष श्री हरि ही हैं |
तभी भगवान वराह ने अपनी थूथनी से जल को चीरते हुए प्रलय के महासागर में प्रवेश किया | वे अपनी कठोर खुरों से समुद्र को चीर रहे थे ,उन की पूंछ कठोर और चमकदार थी,दाढें सफेद पर्वत के समान थे ,समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे रसातल लोक में पहुंचे जहाँ पृथ्वी को रखा गया था |वहां उन्होंने देखा कि पृथ्वी अचेत अवस्था में पड़ी है जैसे कोई माता अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रही हो |
भगवान वराह ने बड़े प्रेम से अपनी विशाल दाढ़ों पर पृथ्वी को धारण कर लिया | जिस प्रकार गजराज कमल के पते को अपनी सूंढ़ से उठा लेता है ,उसी प्रकार दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाए हुए भगवान जल से बाहर निकलने लगे | उसी समय पराक्रमी दैत्य हिरण्याक्ष ,जो सोने के समान चमकते हुए कबच और भयानक गदा धारण किये हुए था सामने आया | उस ने गर्जना करते हुए कहा- अरे जंगली पशु,तू इस पृथ्वी को कहाँ लिए जा रहा है ? यह तो रसातल वासियों की है ,इसे छोड़ दे |तू माया से वराह बना है ,मैं तुझे अभी मार डालूँगा |
हिरण्याक्ष की चुनोती पर भगवान ने पृथ्वी को जल के उपर स्थापित किया और उसे अपने योगबल से धारण करने की शक्ति प्रदान की ,फिर वे दैत्य की और मुड़े ,दोनों में भयंकर युद्ध होने वाला था ,इस का वर्णन अगले अध्याय में आता है |
मैत्रेय मुनि कहते हैं -हे विदुर ,बगवान का यह वराह अवतार धर्म की स्थापना और भक्तों के कल्याण के लिए हुआ | जो मनुष्य इस कथा को श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है ,उस के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान् विष्णु के धाम की प्राप्ति होती है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे वराह -प्रादुर्भावानूवर्णने त्रयोदशोSध्याय:\\१३\\
लेखक -मदन लाल शर्मा
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