भक्ति योग की महिमा

भगवान कपिल द्वारा माता देवहूति को ब्रह्म ज्ञान –

प्रस्तावना और पूर्व कथा

श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के 28 वें अध्याय तक भगवान कपिल मुनि ने अपनी माता देवहूति को सांख्य योग का गूढ़ ज्ञान दिया था | उन्होंने बताया था कि किस प्रकार महतत्व से अहंकार ,अहंकार से पञ्च तन्मात्रा ,इन्द्रियां और पंच महाभूतों की उत्पति होती है और कैसे यह २४ तत्वों का जड -समूह चेतन पुरुष के साथ मिलकर सृष्टि का कारण बनता है |

परन्तु केवल तत्वों के ज्ञान से मुक्ति नहीं मिलती ,जब तक जीव को यह नहीं पता चले कि बंधन से छूटने का क्रियात्मक साधन क्या है ,तब तक ज्ञान अधूरा है | इसी जिज्ञासा को ले कर तृतीय स्कन्ध के २९ वें अध्याय का प्रारम्भ होता है ,जिसे भक्ति योग का सार -ग्रन्थ कहा जाता है |

देवहूति की विनम्र प्रार्थना

बिन्दुसर सरोवर के पावन तट पर स्थित कर्दम ऋषि के आश्रम में देवहूति ने अपने पुत्र,जो साक्षात विष्णु के अवतार हैं,उन कपिल भगवान से कहा – हे प्रभु ,हे मेरे पुत्र रूप में आये परमात्मा ,आप ने बड़ी कृपा कर के मुझे प्रकृति और पुरुष का भेद समझाया | आप ने कहा कि जीव वास्तव में नित्य शुद्ध,बुद्ध और मुक्त है ,परन्तु प्रकृति के गुणों में आसक्ति के कारण ही वह अपने आप को कर्ता-भोक्ता मान बैठता है ,और जन्म मृत्यु के चक्र में घूमता है |

हे दयासिंधो ,अब मेरे मन में एक शंका शेष है |इस प्रकृतिके बंधन से छूटने का ,इस संसार रुपी अंधे कुँए से बाहर निकलने का सब से सुगम ,सब से सरल और सब से शीघ्र फल देने वाला उपाय क्या है ? कृपया ऐसा साधन बताइए जिसे अल्प बुद्धि वाला मनुष्य भी अपना सके और परम पद को पा सके | माता की ऐसी भक्ति भरी बाणी सुन कर कपिल भगवान का हृदय करूणा से भर गया |

भगवान कपिल का मुख्य उपदेश-भक्ति योग ही परम साधन

भगवान कपिल बोले-हे माते ,मनुष्यों को मोक्ष के लिए योग ,सांख्य,तप,यज्ञ ,दान,व्रत आदि अनेक साधन शास्त्रों में कहे गये हैं ,परन्तु उन सभी में भक्ति योग सर्वोपरि है | हे माता,जैसे सूर्य के उदय होते ही कोहरा अपने आप नष्ट हो जाता है ,वैसे ही मेरी भक्ति हृदय में आते ही अविद्या,अस्मिता,राग, द्वेष और अभिनिवेश -यह पांचो क्लेश नष्ट हो जाते हैं | मेरी भक्ति से चित इतना शुद्ध हो जाता है कि जीव को तत्क्षण परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है |भक्ति के बिना न तो ज्ञान टिकता है और न वैराग्य |भक्ति ही ज्ञान और वैराग्य को पुष्ट करती है |

भक्त के दिव्य लक्षण

भगवान कपिल जी कहते हैं , मेरे सच्चे भक्तों के लक्षण सुनो -मेरे भक्त सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और करूणा का भाव रखते हैं | वे किसी से भी शत्रुता नहीं रखते ,वे सहनशील ,क्षमावान,शांत चित वाले ,सब के हित में लगे रहने वाले ,अहंकार से रहित ,ममता से रहित ,सुख दुःख में एक समान रहने वाले होते हैं |वे निरन्तर मेरे नाम का जप ,मेरे गुणों का कीर्तन और मेरी लीलाओं का श्रवण करते रहते हैं |वे मुझे ही अपना सर्वस्व मानते हैं और अपने सारे कर्म मुझे ही अर्पण करते हैं |

भक्ति के भेद- सकाम और निष्काम

हे माता , यह भक्ति भी करने वाले के भाव के अनुसार कई प्रकार की होती है | मुख्य रूप से इस के दो प्रकार हैं -सकाम और निष्काम | , क-१-सकाम भक्ति – जो मनुष्य दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए ,ईर्ष्या से,क्रोध से या अहंकार के साथ हिंसापूर्ण तरीके से मेरी पूजा करता है ,उस की वह भक्ति तामस गुण वाली होती है | वह अधम है 2 राजसी भक्ति – जो मनुष्य विषय ,यश,एश्वर्य,धन,और भोगों को पाने की इच्छा से बड़े आडम्बर ,दिखावे और भेदभाव के साथ मेरी पूजा करता है,उस की वह भक्ति राजस गुण वाली होती है |

3-सात्विकी भक्ति – जो मनुष्य अपने पापों को धोने के लिए ,वेद की आज्ञा है इस भाव से,बिना दिखावे के,श्रद्धा से मेरी पूजा करता है ,पर मन में फल की इच्छा रखता है ,तो वह सात्विकी भक्ति है | यह पहले के दो भेदों में श्रेष्ठ है,पर यह भी पूर्ण नहीं है |

ख – निर्गुणा भक्ति -सर्व श्रेष्ठ भक्ति –

हे माते ,इन तीनों से परे एक और भक्ति है जो गुणों से परे है उसे निर्गुण भक्ति कहते हैं – जब मनुष्य के हृदय में मेरे सिवा किसी और वस्तु की कामना नहीं रहती ,जब वह निष्काम भाव से ,अहंतुकी भाव से ,केवल मेरी प्रसन्नता के लिए मेरी सेवा करता है ,तब वह निर्गुण भक्ति कहलाती है | इस का उदाहरण देते हुए भगवान कपिल जी कहते हैं -जैसे गंगा का प्रवाह अखंड रूप से बिना किसी बाधा के समुद्र की और ही बहता है ,वैसे ही जब मन की समस्त वृतियां -चाहे वह जागृत अवस्था में हों या स्वप्न में ,बिना किसी रोकटोक के ,बिना किसी अन्य इच्छा के ,केवल मुझ परमात्मा की और बहने लगें ,उसीको निर्गुण भक्ति योग कहतेहैं |

ऐसी भक्ति करने वाला भक्त मेरे दिए हुए ,पांच प्रकार के मोक्ष -सालोक्य,सार्ष्टि ,सारुप्य,सामीप्यऔर सायुज्य को भी स्वीकार नहीं करता |वह तो केवल मेरी प्रेममयी सेवा ही चाहता है |ऐसी भक्ति ,मुक्ति से भी बढ़ कर हैं क्यों कि मुक्ति में आनंद का अभाव हो सकता है ,पर भक्ति में प्रतिक्षण बढने वाला दिव्य आनंद है |

निर्गुण भक्ति प्राप्त करने के 9 प्रमुख साधन –

हे माते, ऐसी निर्गुण भक्ति कैसे प्राप्त हो ,इस के साधन भी सुनो –

१ – मेरे भक्तों का संग करना,उन की सेवा करना |

2- मेरे दिव्य जन्म और कर्मों की कथा का श्रवण और कीर्तन करना |

3- सभी प्राणियों में मेरी आत्मा को समान रूप से देखना |

४. सभी जीवों के प्रति दया और करूणा रखना |

५-यम,नियम,आसन,प्राणायाम का पालन करना |

६- सत्संग,तपस्या,और स्वध्याय में लगे रहना |

7- मेरी मूर्ति की श्रद्धा से पूजा करना ,मुझे ही अपना सब कुछ अर्पण करना |

८-मेरे गुणों को गाते हुए हृदय का गदगद हो जाना ,बाणी का गदगद होना और आँखों से प्रेमाश्रु आना |

9-मान-अपमान ,सुख दुःख में सम रहना और किसी भी जीव से द्वेष न करना |

जो साधक इन साधनों का निरन्तर अभ्यास करता है ,उस का चित शीघ्र ही शुद्ध निर्मल और मेरे में तल्लीन हो जाता है |

मुक्ति का स्वरूप –

जब चित भक्ति से शुद्ध हो कर एकाग्र हो जाता है ,तब जीव को आत्म साक्षात्कार होता है ,वह स्पष्ट रूप से देख लेता है कि मैं यह जड शरीर नहीं हूँ,मैं इन्द्रियां नहीं हूँ ,मैं मन बुद्धि भी नहीं हूँ ,मैं तो इन सब का प्रकाशक,इन का साक्षी,शुद्ध चेतन आत्मा हूँ |

इस ज्ञान के उदय होते ही प्रकृति ,जो अब तक जीव को नचा रही थी ,लज्जित हो कर दूर हट जाती है |भगवान कपिल जी एक सुन्दर उदाहरण देते हैं -जैसे एक चतुर नट अनेक प्रकार के स्वांग रच कर लोगों को मोहित करता है,पर जब दर्शक को उस के भेद का पता चल जाता है कि यह तो वही व्यक्ति है जो अलग अलग वेश बना रहा है ,तो वह नट फिर उसे आकर्षित नहीं कर पाता | वैसे ही ज्ञानी पुरुष के सामने से प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है |

जैसे मनुष्य स्वप्न में अनेक पदार्थ देखता है ,पर जागने पर वह स्वप्न का सारा प्रपंच झूठा हो जाता है ,वैसे ही आत्म ज्ञानी के लिए यह सारा जगत मिथ्या हो जाता है | वह परम मुक्त अवस्था को प्राप्त कर मेरे नित्य धाम वैकुण्ठ को चला जाता है |वहां वह नित्य आनंद में मेरी सेवा करता है |

निष्कर्ष- कलियुग के लिए संदेश

अंत में भगवान कपिल अपनी माता को कहते हैं -हे माता मैंने तुम्हें यह भक्तियोग का परम गोपनीय रहस्य बताया है |यह ज्ञान और वैराग्य सहित भक्ति का मार्ग है ,तुम भी श्रद्धा के साथ इसी का आश्रय लो |इस से तुम्हारा कल्याण होगा और तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी |

तृतीय स्कन्ध का यह २९ वां अध्याय आज के युग के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है |आज मनुष्य ज्ञान के बोझ से दबा है ,पर शांति नहीं पा रहा | इस का कारण भक्ति का अभाव ,यह अध्याय हमें सिखाता है कि केवल कर्म काण्ड या शुष्क ज्ञान से कुछ नहीं होगा ,जब तक हृदय में भगवान के प्रति प्रेम समर्पण और भक्ति नहीं होगी | कलियुग में तो केवल हरि भक्ति ही जीव का उद्धार करने वाली है |

इस उपदेश को सुन कर माता देवहूति का मोह नष्ट हो गया ,उन्होंने अपने पुत्र के बताये हुए भक्ति योग के मार्ग पर चल कर उसी जन्म में परम सिद्धि प्राप्त की और अंत में भगवान के परम धाम को प्राप्त हुई |

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