प्रवाह्न जैब्ली का आत्म चिन्तन

जीवन के साय: काल में एक ठहराव है –

यह आत्म चिन्तन किसी आत्म प्रशंसा का दस्तावेज नहीं है ,न ही यह मेरे जीवन की घटनाओं का क्र्म् बार व्योरा है ,एक क्षण है जहाँ मैं मुड कर उस पथ को देखता हूँ जिस पर अब तक चलता आया हूँ और आगे उस पथ को भी जो शेष है |मैं जब लिखने बैठता हूँ तो मन में एक ही प्रश्न उठता है “मैं कौन हूँ “? मेरे पास देने के लिए कोई बड़ा सिधान्त नहीं,कोई नई विचार धारा नहीं | मेरे पास केवल मेरे अनुभव हैं ,मेरी भूलें हैं,और उन भूलों से सीखी हुई कुछ छोटी छोटी समझ है |

मेरा नाम प्रवाह्न जैब्ली है |इस नाम में ही मेरे जीवन का दर्शन छिपा है -प्रवाह्न अर्थात जो बहता है ,जो रूकता नहीं जैब्ली ,वह भूमि जहाँ से मैंने जीवन की पहली सांस ली ,जहाँ की मिट्टी ने मुझे चलना सिखाया ,जहाँ के पहाड़ों ने मुझे अडिग रहना और नदियों ने मुझे निरन्तर बहना सिखाया | मैंने जीवन भर यही कोशिश की कि मैं एक नदी की तरह बहता हूँ -कभी शांत ,कभी तेज ,कभी उलझा हुआ ,पर रुका नहीं |रुकना मृत्यु है और बहना ही जीवन है ,यही मेरे नाम का संदेश है |

१. मैं कौन हूँ ?इस प्रश्न की निरन्तर खोज –

बचपन में लगता था कि मैं शरीर हूँ ,जवानी में लगा कि मैं पद हूँ ,मेरी नौकरी हूँ ,मेरा नाम हूँ ,मेरी उपलब्धियां हूँ|प्रौढ़ावस्था में समझा कि मैं अपने सम्बध हूँ-किसी का बेटा ,किसी का पिता ,किसी का पति ,किसी का मित्र ,पर आज जीवन के इस पडाव पर ,अस्सी वसंत देखने के बाद जब अकेले बैठता हूँ ,तो कि मैं इन में से कुछ भी नहीं हूँ |मैं तो एक द्रष्टा हूँ जो इन सब भूमिकाओं को निभाते हुए देख रहा है |शरीर बदल गया ,पद छुट गया ,कई सम्बध विछुड़ गए ,पर जो देखने वाला भीतर है ,वह आज भी वैसा ही है |

हम जीवन भर एक पहचान बनाने में लगे रहते हैं | लोग हमें पहचाने ,हमारा सम्मान करें ,इस के लिए दिन रात परिश्रम करते हैं ,मैंने भी किया | पर अंत में समझ आया कि जो पहचान हम बाहर खोजते हैं ,वह भीतर ही है |सच्ची पहचान तब मिलती है जब हम निस्वार्थ भाव से किसी के काम आते हैं | जब किसी दुखी व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखते हैं ,जब किसी भूखे को भोजन कराते है ,जब किसी भटके हुए को रास्ता दिखाते हैं तब जो संतोष भीतर उठता है ,वही हमारा असली परिचय है ||बाकी सब तो समाज के दिए हुए मुखोटे हैं |

आत्म चिन्तन का पहला पाठ यही है कि अपने आप से ईमानदार होना सीखो | हम दुनिया को तो धोखा दे सकते हैं पर अपने आप को नहीं | रात को जब तकिये पर जब सिर रखता हूँ तो मन स्वयं ही हिसाब मांगता है -आज क्या अच्छा किया ,क्या बुरा किया ? किस का दिल दुखाया और किस की मदद की ?यही हिसाब हमें मनुष्य बनाये रखता है ,जो व्यक्ति अपने आपसे संवाद करना बंद कर देता है ,वह भीड़ में भी अकेला हो जाता है |

2. समय सब से बड़ा गुरु और सब से बड़ा सत्य –

समय ने मुझे बड़ी शिक्षा दी है ,समय किसी के लिए नहीं रूकता |यह किसी का मित्र नहीं ,किसी का शत्रु नहीं | यह बस बहता है | हम ने कितने लोगों को आते जाते देखा है कितने सम्बध बने और बिगड़े |कितनी इच्छाएं पूरी हुईं और कितनी अधूरी रह गईं | जो कल अत्यंत महत्वपूर्ण था ,आज वह स्मृति मात्र रह गया है |जो बात कभी पहाड़ जैसी लगती थी ,आज वह रेत के कण जैसी लगती है | यही समय का जादू है |

मैंने अपने जीवन में देखा कि पहाड़ भी खिसक जाते हैं ,नदियाँ भी रास्ता बदल लेती हैं ,पर मनुष्य का अहंकार नहीं बदलता |हम सोचते हैं कि हम समय को नियंत्रित कर लेंगे ,उसे बाँध लेंगे |पर सत्य यह है कि समय ही हमें नियंत्रित करता है ,बुद्धिमानी इसी में है कि समय के साथ बहना सीखें ,उस के विरुद्ध तैरने की कोशिश न करें |समय के साथ चलने वाला व्यक्ति कभी थकता नहीं ,और समय से लड़ने वाला कभी जीतता नहीं |

आज की पीढ़ी बहुत तेज भाग रही है |सब कुछ तुरंत चाहिए ,तुरंत सफलता ,तुरंत पैसा , तुरंत प्रसिद्धि | पर मैंने अपने लम्बे जीवन में सिखा है कि जो चीज तुरंत मिलती है ,वह तुरंत चली भी जाती है | जो धीरे धीरे पकता है ,वह टिकता है ,जैसे धीमी आंच पर पका हुआ भोजन अधिक स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है ,वैसे ही धैर्य से किया गया कार्य अधिक स्थाई होता है | जल्दी किये गए कार्य में अक्सर पछतावा ही हाथ लगता है | इसलिए धीरज रखना सीखो,समय को अपना मित्र बनाओ |

3.सुख और दुःख -एक ही सिक्के के दो पहलू-

लोग अक्सर मुझ से पूछते हैं कि जीवन में सुख कैसे मिले ? मैं हंस कर कहता हूँ -दुःख को स्वीकार करना सिख लो ,सुख अपने आप मिल जाएगा | हम दुःख से भागते हैं ,इसलिए और अधिक दुखी रहते हैं | जीवन में दुःख आएगा ही , बिमारी आएगी ,अपनों का विछोह होगा ,इच्छाएं अधूरी रहेंगी ,अपमान सहना पड़ेगा | यह जीवन का नियम है ,इस से कोई भी नहीं बच सकता ,चाहे राजा हो या रंक |

मेरे जीवन में भी ऐसे अनेक क्षण आये जब लगा कि अब सब समाप्त हो गया ,अब आगे कोई रास्ता नहीं ,पर हर अंधरी रात के बाद सुबह हुई है ,हर पतझड़ के बाद वसंत आया है ,यही प्रकृति का शाश्वत नियम है |यदि आज दुःख है तो यह अटूट विश्वास रखो कि कल सुख भी आएगा | दुःख हमें तोड़ने नहीं हमें गढने आता है |जैसे सोने को आग में तपा कर शुद्ध औए सुन्दर बनाया जाता है ,वैसे ही मनुष्य को दुःख की भट्टी में तपा कर परिपक्क और् संवेदनशील बनाया जाता है जिस ने दुःख नहीं देखा ,वह दूसरे के दुःख को कभी नहीं समझ सकता |

सच्चा सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं है |बड़ा घर ,बड़ी गाडी ,बैंक में पैसा ,ऊँचा पद -यह सब साधन हैं ,साध्य नहीं | यह सुविधाएं दे सकते हैं ,सुख नहीं ,सच्चा सुख तो मन की शांति में है ,और मन की शान्ति तब मिलती हैं जब हम कम में जीना सीख लेते हैं ,जब हम तुलना करना छोड़ देते हैं |दुसरे के पास क्या है ,यह देख कर हम कभी सुखी नहीं हो सकते |अपने पास जो है उस से संतोष करना ,जो मिला है उस में ईश्वर का धन्यवाद करना ही सुख है |संतोष सब से बड़ा धन है |

४. सम्बधों की पूँजी-सब से बड़ी कमाई –

जीवन भर मैंने क्या कमाया ?यदि कोई पूछे तो कहूँगा -सम्बध कमाए,कुछ अच्छे मित्र,कुछ अच्छा करने वाले लोग ,परिवार का प्रेम ,यही मेरी असली पूँजी है |धन तो आता जाता रहता है ,आज है कल नहीं |पर एक सच्चा सम्बंध ,एक सच्चा मित्र जीवन भर साथ देता है | पर सम्बन्धों को निभाना भी एक साधना है | इस में धेर्य चाहिए ,क्षमा चाहिए ,सुनने की कला चाहिए | आज सम्बंध टूटने का कारण ,सब से बड़ा कारण -सुनने की कमी और बोलने की जल्दी हम सब अपनी बात कहना चाहते हैं ,दूसरे की सुनना कोई नहीं चाहता | मैंने सीखा है कि कभी कभी चुप रहना भी एक उतर होता है और सुन लेना भी एक बहुत बड़ी मदद होती है |हर बात पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है |

अपनों से कभी अहंकार मत करो |अहंकार से बड़ा शत्रु नहीं है |यह आते ही सारे गुणों को खा जाता है |विनम्र व्यक्ति को हर कोई अपनाता है और अहंकारी को हर कोई छोड़ देता है | पहाड़ कितना भी ऊँचा क्यों न हो ,वह कभी किसी को पानी नहीं पिलाता ,पानी तो हमेशा झुक कर बहने वाली नदी ही पिलाती है | इसलिए जीवन में झुकना सीखो |

५. समाज के प्रति ऋण और नई पीढ़ी से संवाद –

मनुष्य अकेला नहीं जी सकता ,हम समाज से ही बनते हैं |समाज ने हमें भाषा दी ,संस्कार दिए ,शिक्षा दी,पहचान दी ,सुरक्षा दी,इसलिए समाज के प्रति हमारा ऋण है ,जिसे चुकाना हमारा कर्तव्य है केवल लेना ही जीवन नहीं ,देना भी जीवन है |

आज मैं देखता हूँ कि मनुष्य आत्म केन्द्रित होता जा रहा है |”मेरा क्या लाभ होगा ” ? यही एक मात्र प्रश्न रह गया है ,पर इस प्रश्न से समाज नहीं चलता ,परिवार नहीं चलता ,समाज तब चलता है जब हम पूछते हैं -“मैं क्या दे सकता हूँ ? मैं किस के काम आ सकता हूँ ?”

मैंने अपने जीवन में जो थोडा बहुत सीखा ,वह यही कि अपना ज्ञान बांटने से घटता नहीं ,बल्कि बढ़ता है |यदि आपके पास कोई अनुभव है ,तो उसे अगली पीढ़ी को बताइए | यदि आप के पास कोई हूनर है, तो उसे सिखाइए | यही सच्चा दान है ,धन का दान तो क्षणिक है ,पर ज्ञान और संस्कार का दान पीढ़ियों तक चलता है |मैं युवाओं से विशेष रूप से कहना चाहता हूँ आधुनिक बनो,पर अपनी जड़ों से जुडे रहो | अपनी संस्कृति ,अपनी भाषा अपने गाओं को मत भूलो |तकनीक को अपनाओ,पर अपनी संवेदना और मनुष्यता को मत खोओ |

६.उपसंहार-लौटना अपनी और

इस आत्म चिन्तन के अंत में ,मैं कहाँ पहुंचा हूँ ? मैं फिर वहीं लौट आया हूँ जहाँ से चला था – अपने भीतर , बाहर की सारी यात्रा ,सारे भटकाव अंतत: भीतर की और ही ले जाते हैं |बाहर हम जितना भी खोज लें ,शान्ति भीतर ही मिलती है | अब मेरी कोई बड़ी महत्वकांक्षा नहीं है ,कोई पद की लालसा नहीं ,कोई प्रसिद्धि की इच्छा नहीं ,बस इतनी इच्छा है कि जब तक जीवन है किसी के काम आ सकूं ,किसी को सही रास्ता दिखा सकूं और जब अंतिम समय आये तब मन में कोई बोझ न हो कोई अधूरा हिसाब न हो |

मैंने जीवन में एक छोटा सा सूत्र पकड़ा है और उसी को आप सब के साथ सांझा करके विदा लेना चाहता हूँ -“सरल रहो,सत्य बोलो और प्रेम करो “जीवन इतना जटिल नहीं है जितना हम उसे बना देते हैं |सरलता से ही सुन्दरता है ,सत्य में ही शक्ति है ,और प्रेम में ही ईश्वर है | प्रकृति हमें हर दिन सिखाती है | सूर्य हर दिन बिना किसी भेदभाव के सब को प्रकाश देता है ,वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता ,नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती ,फूल अपनी सुगंध अपने लिए नहीं रखता | यह सृष्टि का नियम है -जो बांटता है ,वही बढ़ता है ,जो रोकता है वह सड़ जाता है |

तो यह था मेरा आत्मचिन्तन ,अधूरा,अपूर्ण पर सच्चा और मेरे हृदय से निकला हुआ |यदि मेरे इन शब्दों से किसी एक व्यक्ति को भी अपने जीवन को देखने की नई दृष्टि मिले ,किसी के मन में भी शान्ति का दिया जले ,तो मैं समझूंगा कि मेरा लिखना,मेरा जीना सार्थक हुआ क्यों कि अन्त में हम क्या ले कर जाते हैं न धन ,न पद ,न प्रतिष्ठा , ले कर जाते हैं तो केवल अपने कर्म ,अपनी यादें और कुछ लोगों के दिल में हमारे लिए बचा हुआ प्रेम | उसी प्रेम को कमाना ही जीवन का सब से बड़ा लक्ष्य होना चाहिए |

इति

लेखक- मदन लाल शर्मा

वेबसाइट – http://thegodweknow.com आने वाले शुक्र -वार एक और आत्म चिन्तन |

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