कपिल गीता-सांख्य योग से सृष्टि -रहस्य

श्रीमद्भागवत का तृतीय स्कन्ध वैराग्य और ज्ञान का स्कन्ध है | इस में कर्दम ऋषि और देवहूति के संवाद के माध्यम से सृष्टि का आदि इतिहास और मोक्ष का मार्ग बताया है | पचीसवें अध्याय में भगवान कपिल ने अपनी माता को भक्ति योग का महत्व समझाया ,परन्तु भक्ति में स्थिर होने के लिए ज्ञान और वैराग्य की भूमि आवश्यक है |यह अध्याय केवल कथा नही,भारतीय दर्शन के सब से प्राचीन और वैज्ञानिक दर्शन -सांख्य दर्शन का मूल है \

माता देवहूति की तत्व जिज्ञासा –

कर्दम आश्रम में एक दिन देवहूति ने हाथ जोड़ कर पुत्र कपिल से कहा -हे जगद्गुरु ,आप ने कृपा कर के मुझे भक्ति का सरल मार्ग बता दिया ,परन्तु मेरे मन में संशय अब भी है |वेद कहते हैं तत्व ज्ञान से मुक्ति मिलती है |वह तत्व क्या है ?यह जगत जिसे मैं सत्य मान रही हूँ ,वह बना कैसे ?मैं कौन हूँ ?यह प्रकृति क्या है ? और ईश्वर का इस में क्या स्थान है ?हे प्रभो ,आप मुझे विस्तार से तत्वों की गणना समझाइये ,जिससे मुझे द्दढ वैराग्य हो |

माता की परमार्थिक जिज्ञासा को सुन कर भगवान कपिल ,जो स्वयं विष्णु के अवतार हैं ने कहना प्रारम्भ किया – हे माते,अब मैं तुम्हें प्रकृति आदि सब तत्वों के अलग अलग लक्षण बतलाता हूँ |उन्हें जान कर मनुष्य प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है ,आत्म दर्शन रूप ज्ञान ही पुरुष के मोक्ष का कारण है और वही उस की अहंकार रूप हृदयग्रंथिका छेदन करने वाला है ,ऐसा पंडित लोग कहते हैं | उस ज्ञान का मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ | यह सारा जगत जिस से व्याप्त हो कर प्रकाशित होता है, वह आत्मा ही पुरुष है |वह अनादि ,निर्गुण,प्रकृति से परे ,अन्त:करण स्फुरित होने वाला और स्वयमप्रकाश है |

भगवान कपिल बोले -इस संसार में दो अनन्त अनादि शक्तियाँ है –

१. पुरुष तत्व – यह शुद्ध चेतन है |यह नित्य ,अखंड ,ज्ञान स्वरूप ,निर्गुण और साक्षी मात्र है यह न कुछ करता है न भोक्ता है |यह केवल प्रकाश देता है ,जैसे सूर्य प्रकाश देता है,पर स्वयं लिप्त नहीं होता ,यही तुम हो ,यही प्रत्येक जीव है |गीता में इसी को क्षेत्रज्ञ कहा है |

2. प्रकृति तत्व -यह जड है ,परन्तु अति शक्तिशाली और क्रियाशील है -सत्व गुण (ज्ञान प्रकाश ) रजोगुण (क्रिया चंचलता ) और तमो गुण (जड़ता-अज्ञान ) यह तीनों इस की रस्सीयें हैं ,यही सारे जगत की माता है | सारा खेल इसी का है ,पुरुष तो केवल इस के निकट आ जाता है ,इसलिए अपने को बंधा हुआ मान लेता है | इस का उदाहरण देते हुए कपिल जी कहते हैं -जैसे निर्मल स्फटिक मणि के पास लाल फूल रख देने से स्फटिक भी लाल दिखने लग पड़ता है ,वैसे ही शुद्ध आत्मा प्रकृति के गुणों के संग से अपने को सुखी दुखी मानने लगता है |यही अज्ञान है ,यही बंधन है |

सृष्टि का क्रम-तत्वों का विज्ञान –

अब सृष्टि कैसे बनी- इस का वैज्ञानिक क्रम सुनो | जब सृष्टि का समय आता है ,तब काल रूप भगवान अपनी दृष्टि से प्रकृति को देखते हैं ,तब उस में हलचल होती है |

चरण -१ : महत तत्व या बुद्धि

प्रकृति के क्षोभ से सब से पहले महत तत्व उत्पन्न होता है ,इसे बुद्धि कहते हैं | यह समष्टि बुद्धि है ,सारे जीवों की बुद्धि का मूल स्त्रोत ,जैसे बीज में पूरा वृक्ष छिपा रहता है ,वैसे ही महत में पूरी सृष्टि छीपी रहती है |यह सात्विक प्रधान होता है |

चरण-2 : त्रिविध अहंकार

महत से अहंकार उत्पन्न होता है |अहंकार अर्थात मैं हूँ का भाव | यह तीन प्रकार का होता है –

विकृत या सात्विक अहंकार – इस से ज्ञान की शक्ति मिलती है |

तेजस या राजस अहंकार – यह क्रियाशील है,यह अन्य दोनों को गति देता है ,मिलाता है |

भूतादि या तामस अहंकार -इस से जड पदार्थ बनते हैं |

चरण 3. इन्द्रियों और तन्मात्राओं की उत्पति :

सात्विक अहंकार से मन और 10 इन्द्रियाँ बनी | पांच ज्ञान इन्द्रियाँ -श्रोत (कान ) त्वक(त्वचा) चक्षु(नेत्र ) रसना (जीभ) घ्राण (नाक) और पांच कर्मेन्द्रियाँ -वाक्,पाणी(हाथ) पाद {पैर) पायु(गुदा) ,उपस्थ(लिंग) मन इन सब का राजा है,जो संकल्प विकल्प करता है |

तामस अहंकार – से पांच तन्मात्राए बनी -शब्द,,स्पर्श,रूप,रस,गंध,,यह पंच भूतों के सूक्ष्म रूप हैं |इन्हें हम इन्द्रियों से सीधे नहीं पकड़ सकते |

राजस अहंकार ने इन दोनों से मिल कर कार्य करवाया |

चरण ४. -पंच महाभूत –

फिर इन तन्मात्राओं से स्थूल पंच महाभूत बने- शब्द तन्मात्रा से आकाश -शब्द से गुण वाला,, स्पर्श तन्मात्रा से वायु -शब्द +स्पर्श गुण वाली | रूप तन्मात्रा से अग्नि (तेज) -शब्द_स्पर्श गुण वाली | शब्द+ स्पर्श + रूप वाला | रस तन्मात्रा से जल-शब्द +स्पर्श+रूप _ गुण वाला |गंध तन्मात्रा से पृथ्वी जिस में पाँचों गुण शब्द+स्पर्श+ रूप + रस +गंध है |

इस प्रकार गिनने पर -१ मूलप्रकृति + १ महत +१ अहंकार + १ मन + 10 इन्द्रियां + ५ तन्मात्राएँ +५ महाभूत =२४ तत्व हुए 25 वां पुरुष (जीव)26 वे हैं भगवान या काल ,जो इन सब के नियामक हैं |भागवत में काल को भी एक तत्व माना गया है ,इस लिए २४+१+१ = २६ तत्वों की यह गणना पूर्ण होती है | कहीं कहीं मन को अहंकार से अलग गिन कर और जीव के कर्म ,स्वभाव आदि को जोड़ कर २८ तत्व भी कहे जाते हैं ,इसलिए इसे (अष्टविष्टि तत्व ) भी कहते हैं |

विराट पुरुष की कल्पना

कपिल जी कहते हैं :यह २४ तत्व अलग अलग पड़े थे , इन में चेतना नहीं थी ,तब भगवान ने अपनी काल शक्ति से उन्हें एक साथ संगठित किया |इन के सगठन से एक विराट अर्थात अंड बना | उसी अंड में भगवान ने विराट पुरुष के रूप में प्रवेश किया | उस विराट पुरुष के अंगों से ही लोक बनें ,उस के चरणों से पाताल,जंघा,रसातल,नाभि से अन्तरिक्ष ,छाती से स्वर्ग,मस्तक से सत्य लोक | उस की आँख से सूर्य,मन से चन्द्रमा ,प्राण से वायु प्रकट हुए | यह विराट पुरुष ही समष्टि जगत है और हमारा छोटा सा शरीर उसी की प्रतिकृति -व्यष्टि है |

बंधन और मोक्ष का सूत्र :

हे माता ,अब बंधन समझो,आत्मा तो असंग है पर जब वह अहंकार के साथ तादात्म्य कर लेती है ,तब कहती है ” मै करता हूँ”जब मन के साथ तादात्म्य करती है तब कहती है ” मैं सुखी-दुखी हूँ” यही ग्रन्थि है | मोक्ष क्या है ? जैसे तलवार को म्यान से अलग निकालते हैं ,वैसे ही विवेक रुपी तलवार से आत्मा को अनात्मा से -शरीर ,मन,बुद्धि से अलग कर के देखना |जब साधक द्दढ अभ्यास से देखता है कि मैं देह नहीं,इन्द्रियाँ नहीं,मन नहीं,बुद्धि नहीं,मैं तो उन सब का प्रकाशक साक्षी हूँ ,तब वह मुक्त हो जाता है |

भगवान कपिल जी ने उपसंहार में कहा -हे माते ,यह सांख्य ज्ञान वैराग्य को उत्पन्न करता है और वैराग्य मेरी भक्ति को द्दढ करता है |केवल शुष्क ज्ञान से मुक्ति नहीं मिलती ,पर ज्ञान युक्त भक्ति से शीघ्र ही मेरा धाम प्राप्त होता है | इस लिए तत्वों को जान कर इस मिथ्या जगत से वैराग्य करो और मेरे स्वरूप में अनुराग करो |माता देवहूति इस ज्ञान को पा कर कृत कृत्य हो गई |उन्होंने अपने ही आश्रम में इस ज्ञान का मनन किया और सीद्धि को प्राप्त हुई |

आज के पाठक के लिए संदेश –

यह २६ वां अध्याय आज के विज्ञान के छात्रों के लिए भी आश्चर्य जनक है | आधुनिक विज्ञान कहता है पहले उर्जा (energy) थी फिर सूक्ष्म कण ,फिर परमाणु फिर स्थूल पदार्थ | सांख्य भी यही कहता है -पहले प्रकृति (energy) फिर महत (cosmic intelligence ) फिर अहंकार (इन्दिविसुदुअलिटी ) फिर तन्मात्राए -(subtle particles) और फिर महाभूत(matter ) यह अध्याय हमें सीखता है कि हम इस शरीर रुपी यंत्र के संचालक हैं,यह यंत्र नहीं ,यह ज्ञान ही सच्चे जीवन की शुरुआत है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां तृतीयस्कन्धे कापिलेये तत्वस्माम्नाये षडविशोSध्याय: ||२६||

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com अगले सोम/मंगलवार प्रकृति -पुरुष के विवेक से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन |

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