अष्टावक्र -5
लयोपदेश-
श्लोक-१ न ते संगोSस्तिकेनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छ्सी |संघातविलयं कुर्वन -नेवमेव लयं ब्रज || १||
अर्थ- हे जनक,तुम्हारा वास्तव में किसी भी वस्तु व्यक्ति या संसार से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है | तुम तो स्वयं शुद्ध चेतना हो ,फिर तुम क्या छोड़ना चाहते हो ? यह जो शरीर ,मन,बुद्धि का झूठा संघात(जोड़)है तुम ने अपने साथ मान रखा है ,इस भ्रम को तोड़ दो और उसी में लीन हो जाओ ,ब्रह्म से एक हो जाओ|तुम त्याग करने की चिंता छोडो .क्यों कि त्याग तब किया जाता है जब कुछ अपना हो|यहाँ तो कुछ अपना है ही नहीं |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र कहते हैं -तुम्हारा किसी से भी संग नहीं ,तुम तो नित्य शुद्ध हो |फिर तुम क्या त्यागना चाह्ते हो ?अज्ञान के कारण हम ने इन्द्रिय ,मन,बुद्धि के समूह को अपना मान लिया है | यह संघात ही बंधन है | गुरु कहते हैं ,इस संघात का अर्थ है -मैं यह नहीं हूँ ,ऐसा निश्चय करके इस दाम्पत्य को तोड़ दो |त्याग किसी वस्तु का नहीं ,बल्कि संबंध का करना है |इसी बोध(ज्ञान) से तुम अपने आप में लय को प्राप्त होंगे |
श्लोक-उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुदबुद: |इति ग्यात्वैकमात्मानं एकमेव लयं ब्रज ||2||
अर्थ-यह सारा संसार तुम आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है ,तुम में ही स्थित है और तुम में ही विलीन हो जायेगा | जैसे समुद्र में बुलबुले उठते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं |अत: आत्मा का चिन्तन करते हुए लय को प्राप्त हो |
विवेचना –
जैसे समुद्र से ही लहरें और बुलबुले उठते हैं,समुद्र से अलग उन का कोई आस्तित्व नहीं ,वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व तुम आत्मा से ही उत्पन्न होता है | विश्व तुम्हारा विवर्त है,तुम उस के अधिष्ठान हो | यह जान लो कि एक आत्मा ही सत्य है ,दूसरा कुछ नहीं | जब यह ज्ञान दृढ हो जाता है कि जगत मुझ से ही उत्पन्न हो कर मुझ में ही लीन हो रहा है ,तो जगत का भय और आकर्षण समाप्त हो जाता है |इसी एकत्व के ज्ञान में स्थित हो कर तुम लय को प्राप्त हो जाओगे |
श्लोक-प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद विश्वं नास्तयमले त्वयि | रज्जुसर्प इव व्यक्तं एकमेव लयं ब्रज ||3||
अर्थ-तुम तो निर्मल शुद्ध आत्मा हो , जो यह दिखाई दे रहा है यह अवास्तविक जगत है | जैसे अँधेरे में रस्सी को देख कर सांप का भ्रम होता है पर वह सांप था ही नहीं | अब तू वर्तमान से परे है ,तुम में इस संसार का आस्तित्व कभी था ही नहीं ,यह केवल कल्पना है |
विवेचना –
यह श्लोक और गहरा है,संसार प्रत्यक्ष दिखने पर भी वस्तुत: है ही नहीं ,क्यों कि तुम मल से मलरहित शुद्ध चैतन्य हो ,जैसे अँधेरे में रस्सी को सांप सकझ लिया जाता है ,सांप दिखता है पर होता नहीं ,वैसे ही आत्मा में यह जगत प्रतीत हो रहा है | यह प्रतीति ही अज्ञान है | रस्सी का ज्ञान होते ही सांप का भ्रम मिट जाता है ,प्रयत्न नहीं करना पड़ता | इसी प्रकार आत्मज्ञान से विश्व का मिथ्यात्व स्पष्ट होते ही तुम सहज ही अपने स्वरूप में लय हो जाओगे |
श्लोक- समदुखसुख: आशानैराश्ययो: सम: | समजीवितमृत्यु: सन-नेवमेव लयं ब्रज ||४||
अर्थ- आत्मज्ञानी के लिए जो तू है सुख दुःख ,आशा निराशा ,जीवन और मृत्यु सब एक समान होते हैं अर्थात आस्तित्व हीन हैं ,|जब तू इन सब अनुभूतियों को त्याग देगा तो उसी क्षण ब्रह्म में लय को प्राप्त हो जाएगा |
विवेचना –
यह लय की सिद्ध अवस्था का वर्णन है |ज्ञानी -सुख दुःख को एक समान देखता है ,क्यों कि वह जानता है दोनों मन की अवस्थाये हैं |वह पूर्ण है ,इसलिए उसे आशा निराशा विचलित नहीं करती |जीवन और मृत्यु भी उस के लिए समान है ,क्यों कि वह शरीर नहीं,अमर आत्मा है | यह समता उदासीन नहीं ,पूर्णता से आती है | जब उहापोह में समता आ जाती हैं ,तब चित का आन्दोलन शांत हो जाता है और आत्मा अपने आप में स्थित हो जाती है |यही सहज लय है यही जीवन मुक्ति है |
विशेष विवेचना -इस प्रकरण का सार है कि तुम शुद्ध ,असंग,एक आत्मा हो |तुम्हारा किसी जड पदार्थ या शरीर,मन के संधात से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है |सारा संसार तुम से ही उत्पन्न होता है ,जैसे समुद्र से बुलबुला ,पर तुम में उस का आस्तित्व रस्सी में दिखने वाले सांप के समान मिथ्या है | जब सुख दुःख ,आशा निराशा ,जीवन मृत्यु में समता आ जाती है ,तब साधक को कुछ करना नहीं पड़ता ,वह स्वयं ही अपने स्वरूप में लय हो जाता है |
इति पंचम प्रकरण –
अनुवादक- मदन लाल शर्मा
वेबसाइट-http://thegodweknow.com
