अष्टावक्र – 8
बंधन – मुक्ति
श्लोक- तदा बन्धो यदा चितं किन्चिद वांछति शोचति | किंचिन मुंचति गृन्हाती किन्चिद हृष्यति कुप्यति ||१||
अर्थ – श्री अष्टावक्र जी कहते हैं -तब बंधन है जब मन कुछ चाहता है,शोक करता है,कुछ छोड़ता है ,कुछ ग्रहण करता है ,कभी हर्षित होता है और कभी क्रोधित होता है |
विवेचना –
यह श्लोक बंधन की मनोवैज्ञानिक परिभाषा है |सामन्यत: हम बंधन को बाहर की परिस्थिति समझते हैं -परिवार, नौकरी,समाज |पर अष्टावक्र कहते हैं बंधन बाहर नहीं,चित की चंचलता में है |वांछा ,शोक,त्याग,ग्रहण,हर्ष और क्रोध-यह छ: ही संसार की जड़ें हैं | जब तक चित किसी वस्तु को पाने के लिए दौड़ता है (वांछति) न मिलने पर शोक करता है (शोचति) किसी को अपना और किसी को पराया करके छोड़ता -पकड़ता है | (मुंचति गृनहाति) और अनुकूल -प्रतिकूल में हर्ष क्रोध करता है ,तब तक वह बंधा ही है | यह श्लोक आधुनिक मनोविज्ञान से भी मेल खाता है |आज का तनाव ,अवसाद इसी चित की चंचलता का परिणाम है |अष्टावक्र निदान देते हैं कि समस्या परिस्थिति नहीं प्रतिक्रिया है |यदि चित इन छ: विकारों में उलझा है तो महलों में भी बंधन है और यदि इन से मुक्त है तो जेल में भी मुक्ति है |यही अद्वैत का व्यबहारिक सूत्र है |
श्लोक- तदा मुक्तिर्यदा चितं न वांछति न शोचति | न मुंचति न गृन्हाती न हृष्यति न कुप्यति ||2||
अर्थ-तब मुक्ति है जब मन कुछ नहीं चाहता ,शोक नहीं करता,न कुछ छोड़ता है ,न ग्रहण करता है ,न हर्षित होता है और न क्रोधित होता है |
विवेचना –
यह पहले श्लोक का दूसरा पक्ष है ,पर यह निषेधात्मक नहीं ,विधायक है |अष्टावक्र मुक्ति को मृत्यु के बाद की घटना नहीं,इसी क्षण की चित दशा बताते हैं |मुक्ति का अर्थ उदासीनता या जड़ता नहीं ,यहाँ न वांछति का अर्थ है कामना के ज्वर से मुक्त होना ,ज्ञानी भी कर्म करता है ,भोजन करता है ,पर् चाह के बिना ,शोक का अभाव अर्थात अतीत का बोझ न ढोना |त्याग ग्रहण का अभाव अर्थात् चुनाव रहित स्वीकृति |हर्ष क्रोध का अभाव अर्थात समता | यह स्थित प्रज्ञा अवस्था है जो भगवद्गीता में भी कही गई है |इस श्लोक की विशेषता है कि यह मुक्ति को अति सामान्य बना देता है | किसी हिमालय जाने की आवश्यकता नहीं | बस देखो क्या मन अभी भी कुछ मांग रहा है ? क्या किसी बात पर कुढ़ रहा है ?यदि नहीं ,तो यह मोक्ष है |यह क्षणिक नहीं ,अभ्यास से सहज स्वभाव बन जाता है |साधक के लिए यह कसौटी है -अपनी मुक्ति को बाहर मत खोजो,अपने चित की शान्ति में पहचानो |
श्लोक-तदा बन्धो यदा चितं सक्तं काश्वपिदृष्टिषु | तवा मोक्षो यदा चितम-सक्तं सर्वदृष्टिषु ||3||
अर्थ -तब बंधन है जब मन किसी भी दृश्य में आसक्त होता है ,और तब मोक्ष है ,जब मन सभी दृश्यों में अनासक्त रहता है |
विवेचना –
पहले दो श्लोकों में चित की आंतरिक वृतियों की बात थी ,इस श्लोक में उस के बाहरी विषय -दृश्य जगत से सम्बन्ध की बात है |दृष्टि का अर्थ केवल आँखों से देखना नहीं ,वल्कि पंच इन्द्रियों से अनुभव होने वाला समस्त संसार है -रूप,शब्द,स्पर्श,रस,गंध,विचार मान सम्मान | आसक्ति ही बंधन है |सोने की जंजीर भी जंजीर है |सुन्दर दृश्य ,मीठी प्रसंशा ,या प्रिय व्यक्ति में मन का चिपक जाना ही बंधन है |अष्टावक्र कहते हैं समस्या दृश्य में नहीं ,सक्ति में है |संसार को छोड़ना नहीं ,आसक्ति को छोड़ना है | जब चित सर्वदृष्टिषु असंक्त होता है अर्थात सब देखते सुनते भी कहीं चिपकता नहीं ,कमलवत रहता है ,तब मोक्ष है |यह वैराग्य की पराकाष्ठा है ,यह श्मशान वैराग्य नहीं ,यह ज्ञान जन्य वैराग्य है – यह जान कर कि सभी दृश्य नश्वर,परिवर्तनशील और आत्मा से भिन्न हैं ,उन में सार बुद्धि ,समाप्त हो जाती है | तब व्यक्ति संसार में रह कर भी संसार से परे रहता है जैसे जल में नाव | यह सूत्र गृहस्थ साधकों के लिए अमूल्य है |
श्लोक-यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा | मत्वेति हेलया किंचिन-मा गृहाण विमुंच मा ||४||
अर्थ- जब ‘मैं’ नहीं तब मोक्ष है ,जब ‘मैं’ है तब बंधन है ऐसा जान कर सहज भाव से न कुछ ग्रहण करो और न कुछ त्याग करो |
विवेचना –
यह पूरे प्रकरण का सार है और अष्टावक्र गीता का महावाक्य है | बंधन और मोक्ष का मूल कारण अहं भाव है | ‘अहं’ से तात्पर्य है -मैं शरीर हूँ ,मैं कर्ता हूँ ,मैं भोक्ता हूँ ,यह मेरा है ,यह मैंने किया | यही अहंकार समस्त वासनाओं का केंद्र है | जब तक मैं है ,तब तक वांछा,राग द्वेष रहेंगे | मैं मिटते ही सारा खेल समाप्त |मैं मिटने का अर्थ आत्म हत्या नहीं ,बल्कि मिथ्या पहचान का मिटना है | मैं देह नहीं ,साक्षी चेतना हूँ ,इस निश्चय में ‘अहं’ गल जाता है | दूसरा भाग और भी क्रांतिकारी है -मत्वेति हेलया | जब जान लिया कि बंधन ‘अहं’ का है ,तो अब त्याग ग्रहण का आडम्बर भी क्यों ? लोग मोक्ष के लिए भी त्याग करने लगते हैं ,यह भी अहंकार ही है |अष्टावक्र कहते हैं -हेलया- सहज हो जाओ,लीला से,न पकड़ो,न छोडो , जो प्राप्त है ,उसे आने दो ,जो जा रहा है ,उसे जाने दो |तुम केवल देखो | यही सहज समाधि है |यही जीवन मुक्ति है | अत: हे राजन ,तू ‘मैं’ होने की व्यर्थता को हृदय में धारण कर और किसी भी प्रकार की इच्छा से मुक्त रह |
इति अष्टम प्रकरण अष्टावक्र गीता |
मदन लाल शर्मा
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