मरणासन्न जीव की दशा और तत्वमसि महावाक्य का स्वरूप

भारतीय दर्शन में जीवन का सत्य मृत्यु को नहीं,मृत्यु के समय जीव की चेतना की दशा को माना गया है | इसी सन्दर्भ में सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद का महावाक्य “तत्वमसि ” मरणासन्न जीव के लिए परम -प्रकाश स्तम्भ बन जाता है |

१. मरणासन्न जीव की दशा -शास्त्रीय दृष्टि

मरण कोई क्षणिक घटना नहीं,एक प्रक्रिया है |गरुड पुराण ,क्ठोपनिषद और गीता में इस का सूक्ष्म वर्णन मिलता है | जब जीव मरणासन्न होता है,तब स्थूल शरीर शिथिल होने लगता है |आयुर्वेद कहता है -पहले कफ की अधिकता ,फिर वात का प्रकोप और अंत में अग्नि शमन होता है |इन्द्रियां अपने अपने अधिष्ठान से सिमटने लगती हैं |आँखों की ज्योति धुंधली ,कानों की श्रबन शक्ति क्षीण ,वाणी लडखडाने लगती है |इसे इन्द्रिय -प्रत्याहार कहा गया है |

इस समय जीव के समक्ष उस के सम्पूर्ण जीवन के कर्म संस्कार रूप में उपस्थित हो जाते हैं |योग वशिष्ठ में कहा गया है “-मरणं सर्वनाशो नहि,वासनोत्क्रमण मतम |मृत्यु सर्वनाश नहीं,वासनाओं का एक देह से दूसरी देह में उत्क्रमण मात्र है |

साधारण जीव की दशा बड़ी कातर होती है |उसे तीन प्रकार के ताप घेरते हैं |

क-पुत्रैषणा,वितैषणा और लोकेषणा का मोह ,छूटते हुए सम्बन्धो के प्रति आसक्ति उसे पीड़ा देती है |

ख. अनागत का भय – कहाँ जाऊँगा ,क्या होगा ,यह अज्ञात भय ,उसे व्याकुल करता है |

ग. कर्मों का पश्चाताप – जो करना था ,नहीं किया |

इसी कारण श्वास उखडती है ,चेतना कंठ ,फिर तालू और अंत में ब्रह्मरन्ध्र की और ऊर्ध्वगमन करती है|गीता में भगवान कहते हैं -अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम |य:प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ||

तात्पर्य यह कि मरण काल में जिस भाव में जीव स्थित होता है वही उस की गति का निर्धारण करता है यदि चित में भय ,मोह और वासना में है तो पुनर्जन्म ,और यदि आत्म स्वरूप में स्थिर है तो मुक्ति | यही पर तत्वमसि का उपदेश सार्थक होता है |

2. तत्वमसि वाक्य का विस्तार –

तत्वमसि सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद के छठे अध्याय का महावाक्य है | मह्रिषी उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ बार अलग अलग उदाहरणों से यही बोध अर्थात ज्ञान कराते हैं | इस वाक्य में तीन पद हैं -तत+त्वमं+असि |

तत का अर्थ है -वह परमात्मा ,जो सत-स्वरूप है,जगत का निमित और उपादान कारण है ,जो सृष्टि से पहले भी था ,जो नेत्रों से परे है जिसे वेद सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ,कहते हैं |वही ब्रह्म,वही ईश्वर |

त्वमं का अर्थ – तुम अर्थात जीवात्मा ,यह देह, इन्द्रिय ,मन,बुद्धि से परे ,इन सब का साक्षी,कर्ता-भोक्ता प्रतीत होने वाला चेतन तत्व |

असि का अर्थ है -है,अर्थात एक्य,दोनों की एकता है |

यहाँ शंका होती है कि सर्वज्ञ ,सर्वशक्तिमान ब्रह्म और अल्पज्ञ दुखी जीव एक कैसे ? आचार्यों ने इस का समाधान जह्द्जइल्लक्षणा से किया है | जैसे सोSयं देवदत:-वह देवदत जो काशी में देखा गया ,वही यह देवदत जो आज मथुरा में है | यहाँ काल और देश की उपाधि छोड़ दी जाए तो व्यक्ति एक ही है || वैसे ही तत की सर्वज्ञता आदि माया,विशिष्ट उपाधि और त्वमं की अल्पज्ञता आदि अविद्या -विशिष्ट उपाधि को छोड़ दें ,तो दोनों का शुद्ध चैतन्य एक ही बचता है |

मह्रिषी उद्दालक मधु का उदाहरण देते हैं -जैसे भिन्न भिन्न वृक्षों के रस एकत्र हो कर मधु बन जाता है ,तब वे यह नहीं जानते कि मैं अमुक वृक्ष का रस हूँ ,वैसे ही सत में लीन हो कर जीव अपने पृथकत्व को भूल जाता है |नदियों का उदाहरण -पूर्व से बहने वाली और पश्चिम से बहने वाली नदियाँ अंत में समुद्र में एक हो जाती हैं |

3. मरणासन्न अवस्था में तत्वमसि का प्रकाशन –

साधारण मनुष्य जीवन भर अहं देहोSस्मी-मैं देह हूँ इसी भ्रम में जीता है | इसलिए मृत्यु उस देह का नाश करती है और वह भयभीत होता है | पतन्तु जिस साधक ने श्रवण,मनन,निदिध्यासन द्वारा तत्वमसि का साक्षात्कार कर लिया है,उस के लिए मरणासन्न दशा भय नहीं महोत्सव है | वह जानता है मैं यह क्षीण होता शरीर नहीं हूँ ,मैं वह तत हूँ जो अजर अमर अविनाशी है |

न जायते म्रियते वा कदाचिन -यह आत्मा न जन्म लेता है न मरता है | ऐसे ज्ञानी के प्राण -उत्क्रांति भी भिन्न होती है |वृहदारण्यक कहता है -नं तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ,अत्रैव समबलीयन्ते | उस के प्राण कहीं जाते नहीं ,वहीं ब्रह्म में लीन हो जाते हैं | जैसे घट के फूटने पर घटाकाश महाकाश में मिल जाता है अर्थात घड़े के टूटने पर जैसे उस के अन्दर का आकाश बाहर के आकाश से मिल जाता है वह दोनों एक ही तो हैं |

इसलिए शास्त्र उपदेश देते हैं कि मृत्यु की प्रतीक्षा मत करो |तत्वमसि का अभ्यास जीते जी करो |प्रतिदिन विचार करो -मैं कौन हूँ? यह देह तत तो नहीं ,यह मन में तत नहीं,तो मैं कौन हूँ ? जो इस सब को जान रहा है ,वह मैं हूँ वही तत है |

जब यह निश्चय द्दढ हो जाता है ,तब मरणासन्न दशा में भी जीव कह उठता है -” अहं ब्रह्मास्मि ” शरीर छूट रहा है छूटने दो |मैं ही तो था ,हूँ,रहूँगा | यही विदेह मुक्ति है |

उपसंहार -मरणासन्न जीव की दशा अज्ञान जनित है और तत्वमसि महावाक्य उस अज्ञान की ओषधि है |यह वाक्य केवल पढने के लिए नहीं ,जीने के लिए है |जो इस जीवन में आत्मसात कर लेता है ,उस की मृत्यु ,मृत्यु नहीं रहती ,वह ब्रह्म में विसर्जन का पर्व बन जाती है |यही भारतीय संस्कृति के अमरत्व का उद्घोष है |

इति –

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com

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