श्री कपिल जी का जन्म

तृतीय स्कन्ध के चौवीसवें अध्याय में परम पावन अवतार श्री कपिल भगवान के प्रादुर्भाव की कथा है |य्ह अध्याय भक्ति ज्ञान और वैराग्य का संगम है | इस अध्याय के वक्ता श्री मैत्रेय जी हैं और श्रोता विदुर जी हैं | मैत्रेय जी कहते हैं:-

पूर्व कथा के अनुसार कर्दम मुनि और देवहूति ने सरस्वती नदी के तट पर स्थित बिंदु सरोवर के समीप अपने दिव्य विमान में अनेक वर्षों तक भोग विलास किया |कर्दम मुनि के योगबल से निर्मित उस विमान में देवहूति के साथ विहार करते हुए समस्त लोकों में घूमें |समय आने पर देवहूति के गर्भ से नौ कन्याओं का जन्म हुआ – कला,अनसूया,श्रद्धा ,हविर्भू,गति,क्रिया,ख्याति ,अरुंधती और शान्ति |इन कन्याओं का विवाह क्रमश: मरीचि,अत्री,अंगीरा,पुलस्त्य,पुलह,क्रतु,वसिष्ठ और अथर्वा ऋषियों से हुआ |

कन्याओं के विवाह के पश्चात एक दिन परम सुन्दरी उतम गुणों से युक्त देवहूति ने अत्यंत वैराग्य भाव से अपने पति कर्दम जी से कहा- हे भगवन ,आप ने मुझे सब सुख दिए ,मेरे गर्भ से नौ कन्याएं उत्पन्न हुईं ,अब वे अपने अपने आश्रमों में चली गईं | अब मैं इस भव सागर से पार होना चाहती हूँ |आप ने जो वचन मुझे दिया था कि पुत्र उत्पन्न होने के बाद आप सन्यास लेंगे ,अब समय आ गया है |कृपया मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए जिस से मैं इस जन्म मरण के के बंधन से मुक्त हो जाऊं |

देवहूति की वैराग्य बाणी सुन कर कर्दम मुनि को भगवान विष्णु के पूर्व में दिए वरदान का स्मरण हो आया भगवान ने कहा था कि वे स्वयं उन के पुत्र रूप में अवतार लेंगे |कर्दम जी ने देवहूति से कहा -हे कल्याणी,तुम्हारे अन्दर जो वैराग्य और भक्ति उत्पन्न हुई है ,वही मोक्ष का द्वार है |तुम चिंता मत करो ,स्वयं श्री हरि ही तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार लेने वाले हैं |

उसी समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं,आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी, बादल बिना जल के गर्जना करने लगे | उसी शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु ने कर्दम जी के आश्रम प्रवेश किया | श्रीमद्भागवत में वर्णन आता है कि उस समय भगवान कपिल के रूप में प्रकट हुए |उन का वर्ण काला -काला सा ,नेत्र कमल के समान ,हाथों में शंख,चक्र,गदा ,पद्म ,वक्ष स्थल पर श्री वत्स चिन्ह और गले में कौस्तुभ मणि शोभायमान थी |उन का तेज करोड़ों सूर्यों के समान था | उन्हें देखते ही कर्दम मुनि और देवहूति प्रेम से विहल हो गए |

कर्दम मुनि ने हाथ जोड कर स्तुति की -हे प्रभु, आप ही सांख्य शास्त्र के प्रवर्तक ,प्रकृति-पुरुष के ज्ञाता ,समस्त जीवों के हृदय में वास करने वाले परमात्मा हैं |आप ने ही मुझे वर दिया था ,आज आप ने मेरे कुल को पवित्र कर दिया |

देवहूति ने भी आँखों में आंसू भर कर प्रार्थना की |भगवान ने अपनी मधुर बाणी में कहा-हे मुनि ,मैंने तुम्हें वर दिया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा ,उसी प्रतिज्ञा को पूरा करने मैं आया हूँ |मेरे इस अवतार का नाम कपिल होगा और मैं संसार को सांख्य योग का उपदेश दूंगा ,जिस से तुम्हारी पत्नी और समस्त मानव जाति का कल्याण होगा |

इस प्रकार भगवन कपिल का जन्म हुआ |वे २४ वें अवतारों में से एक माने जाते हैं | भागवत के अनुसार वे सिद्धों के आचार्य माने जाते हैं |

कपिल जी के जन्म के बाद कर्दम मुनि ने अपना गृहस्थ धर्म पूर्ण मान कर सन्यास लेने का निश्चय किया |उन्होंने अपने पुत्र कपिल जो साक्षात भगवान हैं की परिक्रमा की,उन से आज्ञा ली और वन की और प्रस्थान कर गए | वहां उन्होंने कठोर तपस्या कर के भगवान के परमधाम को प्राप्त किया |

पिता के चले जाने के बाद माता देवहूति अपने पुत्र कपिल के आश्रम में रहने लगी | एक दिन माता ने पुत्र से कहा -हे पुत्र ,यद्यपि तुम साक्षात परब्रह्म हो तथापि शास्त्र मर्यादा के अनुसार तुम मेरे पुत्र हो | मैं इस अज्ञान ,अहंकार और ममता के अन्धकार में फंसी हूँ |मुझे ऐसा तत्व ज्ञान दो जिस से मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो | यह प्रश्न अगले अध्यायों में कपिल-देवहूति संवाद और सांख्य योग का आधार बनता है ,जहाँ भगवान कपिल अपनी माता को भक्ति योग का परम गोपनीय ज्ञान प्रदान करते हैं |

इस अध्याय का महत्व और संदेश :-

१. गृहस्थ धर्म की पूर्णता – कर्दम-देवहूति का चरित्र बताता है कि गृहस्थ में रह कर भी ईश्वर प्राप्ति सम्भव है यदि जीवन में संयम,भक्ति और अंत में वैराग्य हो |

2. नारी का गौरव -देवहूति जैसी पतिव्रता और ज्ञान पिपासु नारी के कारण ही स्वयं भगवान पुत्र रूप में आते हैं | माता ही प्रथम गुरु है |

3. अवतार का उद्देश्य -भगवान कपिल का अवतार केवल एक परिवार के लिए नहीं ,बल्कि समस्त मानवता को सांख्य और भक्ति योग का ज्ञान देने के लिए हुआ |

४. भक्ति ही सार है : अंत में समस्त योग,ज्ञान और तप का सार भगवान की अनन्य भक्ति ही है ,यही इस अध्याय की शिक्षा है |

बिंदु सरोवर आज भी गुजरात में स्थित है जिसे सिद्धपुर के नाम से जाना जाता है ,जहाँ कपिल मुनि का आश्रम था | इस कथा का श्रवण,पठन करने से पित्री दोष शांत होता है ,ज्ञान की प्राप्ति होती है और अंत में भगवान के धाम की प्राप्ति होती है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण तृतीयस्कन्धे चतुर्विशोSध्याय:सम्पूर्ण |

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com जिज्ञासु जो श्रीमद्भागवत पढना चाहते हैं मेरा अनुगमन करते रहें |

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