हिटलर के नस्लवाद और राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के नस्लवाद में समानताएं

इतिहास में विचारधाराए अक्सर अलग अलग भोगोलिक और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमियों में जन्म लेती हैं ,लेकिन उन की संरचना भाषा और लक्ष्य में आश्चर्य जनक समानताये देखी जा सकती हैं | बीसवी सदी के दो सब से चर्चित सास्कृतिक राष्ट्रवाद के मोडल -जर्मनी में अडोल्फ़ हिटलर का नाजीवाद और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिंदुत्व -इस तुलनात्मक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं | दोनों ही विचार धाराओ ने अपने अपने देश में वहुसंख्यक समुदाय के गौरव ,शुद्धता और एतिहासिक अन्याय के प्रतिशोध के नाम पार एक विशिष्ट प्रकार के नस्लीय -सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का निर्माण किया |

१-नस्ल और संस्कृति पर आधारित राष्ट्र की परिभाषा

हिटलर के लिए राष्ट्र का अर्थ जर्मन राज्य की सवैधानिक सीमाए नहीं थीं ,बल्कि आर्य नस्ल का जैविक और रक्तगत समुदाय था | उस के अनुसार जर्मन राष्ट्र एक नस्लीय इकाई है ,जिस का खून शुद्ध होना चाहिए |यहूदी ,रोमा और अन्य अल्पसंख्यक इस रक्त में मिलावट थे |

राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक वैचारिक ग्रन्थों में भी राष्ट्र की लगभग यही परिभाषा मिलती है | गुरु गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ” हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा “(वि आर नेशनहुड डीफाइंड ) में स्पष्ट लिखा है कि हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दुओं का राष्ट्र है |उन के अनुसार मुस्लिम और ईसाई यहाँ रहते हुए भी राष्ट्रीय जीवन के अंग नहीं हो सकते जब तक वे हिन्दू संस्कृति और धर्म को आत्मसात नहीं कर लेते | हिटलर के लिए जैसे जर्मन हूँ वैसे ही राष्ट्रिय स्वयं -सेवक संघ के लिए हिन्दू संस्कृति और पित्री भूमि -पुण्यभूमि की अवधारणा नागरिकता की कसौटी बन जाती है |दोनों ही धर्मनिरपेक्ष ,क्षेत्रीय और समावेशी राष्ट्रवाद को नकारते हैं

2- अल्पसंख्यक को आंतरिक शत्रु के रूप में चित्रण

नाजी विचार धारा का केन्द्रिय तत्व था -जर्मनी की सभी समस्याओं का कारण यहूदी हैं |हिटलर ने “मं कैम्फ ” में यहूदियों को दीमक,परजीवी और राष्ट्र विरोधी बताया जो जर्मनी को अन्दर से खोखला कर रहे हैं |

राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के साहित्य में यही स्थान मुसलमानों और ईसाईयों को दिया गया है |गोलवलकर ने अपनी पुस्तक “वंच आफ थाट्स | में भारत के लिए तीन आंतरिक खतरों का उल्लेख किया है -मुसलमान,ईसाई और कम्युनिष्ट | उन के अनुसार ये समुदाय विदेशी निष्ठां रखते हैं |हिटलर ने यहूदियों पर वफादारी न होने का आरोप लगाया ,आरएसएस मुसलमानों पर पाकिस्तान प्रस्त होने का आरोप लगाता है | दोनों ही विचार धाराएं बहुसंख्यकों में,अल्पसंख्यकों के प्रति भय और संदेह पैदा करती हैं ताकि बहुसंख्यक एकजुट हो सकें |

3. स्वर्णिम अतीत और उपमान का आख्यान –

हिटलर का प्रचार था कि प्राचीन आर्य जर्मन एक महान और शुद्ध नस्ल थी ,जिसे यहूदियों ,उदारवादियों और वर्साय की संधि ने अपमानित किया |जर्मनों को इस अपमान का बदला लेना है और तीसरे राइख के रूप में फिर से विश्व गुरु बनना है |

आरएसएस का वैचारिक आधार भी इसी प्रकार के आख्यान पर टिका है |उस के अनुसार प्राचीन हिन्दू भारत विश्व गुरु था ,सोने की चिड़िया था ,जिसे पहले मुसलमानों आक्रमणकारियों और फिर अंग्रेजों ने नष्ट कर दिया |यह १००० साल की गुलामी का सिधान्त हिन्दुओं में प्रतिशोध और गौरव -बोध दोनों जगाता है |दोनों विचार धारायें इतिहास को तथ्यों के रूप में नहीं,बल्कि घाव और गौरव के मिथक के रूप में इस्तेमाल करती हैं |

४. सगठनात्मक और सास्कृतिक समानता –

दोनों आन्दोलनों की कार्य पद्दति में भी गहरी समानता है |

क -वर्दी और परेड : हिटलर की स्टार्म ट्रूपर्स ASA और SS खाकी वर्दी,परेड ,ध्वज,वन्दन और शारीरिक व्यायाम पर जोर देते थे |आरएसएस की शाखा में भी खाकी निकर,काली टोपी ,दंड ,ध्वज ,प्रणाम और शारीरिक व्यायाम अनिवार्य है | दोनों मानते हैं कि विचार से ज्यादा अनुशासित शरीर और आदेश पालन महत्वपूर्ण है |

ख.- युवा और प्रचार -हिटलर ने यूथ के माध्यम से बच्चों के मन में नस्लीय गौरव भरा |आरएसएस शिशु मंदिर,बिद्या भारती और शाखाओं के माध्यम से बाल्यावस्था से ही सास्कृतिक राष्ट्रवाद का संस्कार देता है|

ग – एक नेता,एक विचारधारा – नाजीवाद में फ्यूरर सिधांत था -नेता कभी गलत नहीं होता |आरएसएस में सर संघचालक को परम पूज्य माना जाता है आयर संगठन में प्रश्न पूछने की परम्परा का अभाव है |व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा विचार |

५. शुद्धता और शुद्धिकरण का आग्रह –

हिटलर के नस्लवाद का अंतिम लक्ष्य था – जर्मनी से यहूदियों का पूर्ण निष्कासन ,जिसे उस ने अंतिम समाधान कहा |आरएसएस प्रत्यक्ष रूप से ऐसा नहीं कहता ,लेकिन उस का सास्कृतिक शुद्धिकरण का अजेंडा -घर वापसी ,लव जेहाद के विरुद्ध अभियान ,शाकाहार का आग्रह,हिंदी-हिन्दू -हिंदुस्तान -उसी शुद्धता बोध से प्रेरित है |दोनों के अनुसार अल्पसंख्यक को या तो वहुसंख्यक में विलीन होना होगा या द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रूप में रहना होगा |गोलवलकर ने स्वयं जर्मनी के यहूदी-शुद्धिकरण को एक अच्छा सबक बताया था कि कैसे नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाये रखी जा सकती है |

६. लोकतंत्र और उदारवाद का विरोध –

हिटलर लोकतंत्र को कमजोर और यहूदियों की साजिस मानता था |आरएसएस भी पश्चिमी लोकतंत्र ,धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद को भारतीय आत्मा के विरुद्ध मानता है| दोनोके लिए वहुमत का अर्थ केवल चुनावी संख्या नहीं,बल्कि सास्कृतिक वर्चस्व है |विरोधी को राजनितिक प्रति द्वन्धता ही नहीं बल्कि राष्ट्र द्रोही माना जाता है |इसलिए दोनों में प्रेस,विश्वबिद्यालय और बौधिक वर्ग के प्रति अविश्वास दिखता है |

निष्कर्ष -कहा जा सकता है कि हिटलर का नस्लवाद जैविक था जब की आरएसएस का नस्लवाद सांस्कृतिक है पर दोनों का व्याकरण एक ही है |दोनों एक काल्पनिक शुद्ध अतीत का आवाहन करते हैं|एक आंतरिक शत्रु का निर्माण करता है ,वहुसंख्यक समुदाय में भय और गौरव का मिश्रण भरते हैं और एक अनुशासित ,वर्दीधारी संगठन के माध्यम से राष्ट्र को एकरूप बनाने का सपना देखते हैं|अन्तर केवल डिग्री और एतिहासिक सन्दर्भ का है ,दिशा एक ही है | आरएसएस के आदर्श हिटलर और मसोलिनी हैं दोनों ही तानाशाह हैं उन्हीं के पदचिन्हों का अनुसरण किया जा रहा है |

मदन लाल शर्मा

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