शूद्र – धर्म

आजकल शूद्र नाम लेने मात्र से ही यह मान लिया जाता है कि यह वर्ण निकृष्ट है | पर यह वास्तव में लोगों की महान भूल है | जिन लोगों ने वेद शास्त्र का अध्ययन नहीं किया है वे ही ऐसा सोचा करते हैं और उन शूद्र् जनों से घृणा करते हैं |यद्यपि ऐसा करना सर्वदा त्याज्य है | हमारे शास्त्रों में शूद्रों का धर्म सर्वोपरि बताया गया है ,क्यों की इन का परम धर्म ही सेवा कार्य है और सेवा कार्य ही भगवान को प्रसन्न करने का सर्वोतम साधन है | सेवा से प्रत्येक प्राणी इस संसार बंधन से पार हो सकता है |

धर्मराज युधिष्ठर के राजसूययग्य में विभिन्न कार्यों का भार विभिन्न लोगों को दे दिया गया | उस समय एक कार्य बचा था आये हुए अतिथियों का चरण पखारना | श्रीकृष्ण ने झट से उठ कर कहा -“यह कार्य मेरे लिए छोडिये |” लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ परन्तु इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं ,क्यों कि सेवा करने वाला शिष्य ही एक दिन गुरु के पद पर परिलक्षित होता है | ब्राह्मण,क्षत्रिय वैश्य आदि वर्णों के लिए भी सेवा का विधान है | भगवान श्रीकृष्ण ने इसी उद्देश्य को ले कर गीता के १८वें अध्याय के 42,४३ तथा ४४ वें श्लोकों में ब्राह्मण,क्षत्रिय एवं शूद्रों के लिए अलग अलग स्वधर्म रूप सेवा कार्यों का प्रतिपादन किया है || पर शूद्र तो चतुर्वर्ण प्रासाद का मूलाधार पाया है | उस के बिना यह इमारत खड़ी ही नहीं रह सकती |

आजकल प्राय: यह कहा जाता है कि ब्राह्मण सदैव ही शूद्रों को नीचे गिराने के प्रयत्न में रहे हैं ,जिस से कि वे अपनी उन्नति न कर सकें |पर ऐसा समझना सर्वथा भ्रम है ,क्यों कि शास्त्रों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि स्वधर्म पालन करना ही उत्तम गति का साधन है | यह साधन ब्राह्मण के तप आदि साधनों की अपेक्षा शूद्रों के लिए सुगम है | चारों युगों में मुनियों ने कलियुग को ही सर्वोतम माना है ,क्यों कि इस युग में भगवान्नाम -कीर्तन करने मात्र से ही संसार सागर से मुक्ति मिल जाती है |-

कलिजुग सम जग नहिंजो नर कर बिसवास |

गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ||

एक बार कुछ मुनि ” किस समय में थोडा सा पुन्य महान फल देता है और कौन उस का सुगमता से सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं ? इस प्रश्न को ले कर श्री व्यास जी के पास पहुंचे | व्यास जी उस समय गंगा जी में स्नान कर रहे थे |व्यास जी ने गंगा जी में गोता लगा कर फिर कहा – “कलियुग श्रेष्ठ है |शूद्र तुम ही श्रेष्ठ हो,तुम् ही धन्य हो | स्त्रियाँ ही साधू हैं ,वे ही धन्य हैं |”

तदनन्तर व्यास जी ने बाहर निकल कर नित्यकर्म किया | फिर मुनियों का अभिवादन करके आने का कारण पूछा | मुनियों ने कहा ,” हम एक प्रश्न को ले कर आये थे ,परन्तु पहले आप यह बताईये कि आप ने जो कलियुग को ,शूद्र को और स्त्रियों को श्रेष्ठ,साधू और धन्य कहा – इस का क्या रहस्य है ?”

व्यास जी ने हंसते हुए -जो धर्म सत्य युग ,त्रेता ,द्वापर में बहुत समय से तथा तप,ध्यान ,पूजन से प्राप्त होता था,वह कलियुग में श्रीकृष्ण के नाम कीर्तन मात्र थोड़े से प्रयत्न से ही प्राप्त हो जाता है ,इसलिए मैं कलियुग से अति प्रसन्न हूँ | ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य को बड़े संयम से रह कर प्रसन्नतापूर्वक साधन करने पर जिन पुण्यलोकों की प्राप्ति होती है ,वह सद्गति शूद्र को केवल सेवा करने से ही प्राप्त हो जाती है | इसलिए वह अन्य जातियों की अपेक्षा धन्यतर है और स्त्रियाँ केवल तन मन वचन से पति की सेवा करके ही शुभ गति को प्राप्त हो जाती हैं ,इसलिए वे साधू हैं | मैंने इसी अभिप्राय से कलियुग,शूद्र और स्त्रियों को श्रेष्ठ तथा धन्य बताया है |

ऋषियों ने कहा -महामुने ,हमें जो कुछ पूछना था ,उस का यथार्थ उत्तर तो आप ने हमारे इसी प्रश्न के उत्तर में दे दिया है | इस प्रकार महर्षि व्यास ने शूद्रों की महिमा गायी है अत: शूद्र भाइयों से सादर निवेदन है कि वे ब्राह्मणों को दोष न दे कि उन्होंने हमें नीच बनाया है |जाति जन्म से ही उस के नाम बिधाता वर्ण के रूप में लिख देता है ,ब्राह्मण तो केवल बताने वाला है , और वर्ण सभी आधुनिक जातियों में और सभी धर्मों में समान रूप से होते है | व्यक्ति वर्ण अनुसार ही व्यवसाय करते हैं | जातियों में कट्टरता आने पर ही कुछ स्वार्थी लोग इस का फायदा उठाने का प्रयास करते रहते हैं |

नोट- वर्ण व्यवस्था ईश्वर रचित पढ़ें http://thegodweknow.com

लेखक- प० अवधनारायण जी भारती

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