चाणक्य और शास्त्रों के अनुसार राजा (शासक) के कर्तव्य

चाणक्य और हमारे शास्त्रों में राजा को केवल शासक ही नहीं ,बल्कि प्रजा का पिता ,सेवक और योगी -तीनों एक साथ माना है |

चाणक्य के अनुसार -अर्थ शास्त्र और चाणक्य नीतिमें,चाणक्य कहते हैं -“राजा का सुख प्रजा के सुख में है ,प्रजा के हित में ही उस का हित है | ” उन के अनुसार राजा में ये 7 विशेषताएं होनी चाहिए ,जिसे वे राजा के सप्तगुण कहते हैं |

1. आत्मसंयमी और जितेन्द्रिय -जो अपनी इन्द्रियों -काम,क्रोध,लोभ,मद,मत्सर पर विजय पा ले |चाणक्य कहते हैं -जो राजा अपनी इन्द्रियों को नहीं जीत सकता ,वह पूरी पृथ्वी को भी नहीं जीत सकता |

2. कुलीन ,बुद्धिमान और दूरदर्शी -राजा उच्चकुल,शास्त्रज्ञानी,तर्क बुद्धि वाला और भविष्य को देखने वाला होना चाहिए |उसे अर्थशास्त्र ,दंडनीति,वेद और इतिहास का ज्ञान होना चाहिए |

3. उत्साही और परिश्रमी- आलसी राजा से राज्य नष्ट होता है |राजा को सूर्य की तरह सदा सक्रिय रहना चाहिए | चाणक्य के अनुसार राजा का दिनचर्या तक बंधी हुई होनी चाहिए-सुबह गुप्तचरों से मिलना,दिन में प्रजा के कार्य शाम को मन्त्रणा |

४. गुप्तचर और मंत्रियों पर निर्भर ,पर अंध विश्वासी नहीं -चाणक्य कहते हैं राजा की आँखें उस के गुप्तचर होते हैं,पर उसे मंत्रियों की परीक्षा ले कर ही -धर्म,अर्थ,काम और भय से नियुक्त करना चाहिए |

५. न्याय प्रिय और दंड में कठोर,दंड ही धर्म की रक्षा करता है|अपराधी चाहे पुत्र ही क्यों न हो ,दंड अवश्य देना चाहिए और निरपराध को दंड नहीं| दंड का उद्देश्य बदला नहीं ,सुधार होना चाहिए |

6. मितव्ययी और कोष रक्षक -राजा को प्रजा से कर फूल से मधु लेने की तरह होना चाहिए -न बहुत अधिक,न बहुत कम और कोष का उपयोग प्रजा -कल्याण ,सेना और आपदा के लिए करना चाहिए

7. प्रजा वत्सल- चाणक्य की सब से बड़ी बात -राजा को प्रजा के दुःख को अपना दुःख समझना चाहिए | अकाल रोग,या शत्रु के समय प्रजा की रक्षा ही उस का पहला धर्म है |

१. शास्त्रों के अनुसार -मनुस्मृति ,महाभारत ,रामायण शास्त्रों में राजा के लिए राजधर्म शब्द आता है ,जिस का वर्णन सब से विस्तार से महाभारत के शन्ति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठर को किया है |

१, धार्मिक और सत्यनिष्ठ -राजा स्वयं धर्म पर चलेगा तभी प्रजा धर्म पर चलेगी |मनुस्मृति कहती है -यथा राजा तथा प्रजा |राजा में सत्य ,शौच,दया और क्षमा होनी चाहिए |

2. इंद्र के समान गुण वाला -शास्त्रों में राजा को ५ देवताओं का रूप कहा गया है |

१. इंद्र के समान ऐश्वर्यवान और् शक्तिशाली |

2. सूर्य के समान न्याय में तेजस्वी |

3. वायु की तरह सर्वत्र गुप्तचरों से विचारने वाला |

४. यम की तरह निष्पक्ष न्याय करने वाला |

५. वरुण की तरह पापियों को बंधन में रखने वाला |

४. वर्णाश्रम का रक्षक -रामायण में श्री राम को आदर्श राजा इसलिए कहा गया है क्यों कि उन्होंने धर्म,मर्यादा और सभी वर्णों के कर्तव्यों की रक्षा की |शासक का काम किसी एक का नहीं,सब का संतुलन वनाये रखना है |

५. शत्रु के प्रति भी विवेकी -शास्त्र कहते हैं राजा को साम,दाम ,दंड,भेद चारों नीतियों का ज्ञाता होना चाहिए |पहले समझाना ,फिर लालच या सहायता,फिर भेद और अंतिम उपाय ही युद्ध होना चाहिए |

चाणक्य का राजा बुद्धि से कुशल,नीति से प्रवीन और कर्म से कठोर होता है |जब की शास्त्रों का राजा धर्म से बंधा,करुणा से भरा और प्रजा का पिता होता है |और जब यह दोनों एक साथ मिल जाते हैं -नीति और धर्म -तभी रामराज्य बनता है ,जहाँ प्रजा को न किसी बात का भय होता है और न अभाव |

इति-

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com

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