श्रीमद्भागवत – भागवत कथा
प्रस्तावना -श्रीमद्भागवत पुराण का तृतीय स्कन्ध सृष्टि रचना के रहस्यों को खोलता है |इस के पंचम अध्याय का नाम है”विदुर मैत्रेय संवाद “|इस अध्याय में महात्मा विदुर जी मह्रिषी मैत्रेय से भगवान की लीलाओं और सृष्टि के क्रम की जानने की जिज्ञासा करते हैं |यह अध्याय भक्ति,ज्ञान और वैराग्य का संगम है | यहाँ विदुर जी के प्रश्न और मैत्रेय ऋषि के उतर के माध्यम से ब्रह्मांड की उत्पति ,भगवान के स्वरूप तथा जीव के कल्याण का मार्ग बताया गया है |
कथा का आरम्भ :विदुर का हस्तिनापुर त्याग –
महाभारत युद्ध के बाद धृतराष्ट्र ,गान्धारी और कुंती के साथ विदुर जी भी वानप्रस्थ धर्म का पालन करने वन चले गए थे |धृतराष्ट्र के देह त्याग के बाद विदुर जी तीर्थ यात्रा करते हुए प्रयास क्षेत्र पहुंचे |वहां उन की भेंट श्रीकृष्ण के परम सखा उद्दव जी से हुई |उद्दव जी ने विदुर को बताया कि अब श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेट ली है और यदुवंश का भी संहार हो चुका है | यह सुन कर विदुर जी अत्यंत व्याकुल हो गए |संसार की नश्वरता देख कर उन के मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ |उद्दव जी ने उन्हें सलाह दी कि वे मह्रिषी मैत्रेय के पास जाएँ जो पराशर मुनि के शिष्य हैं और भगवान के रहस्यों को जानते हैं |
मैत्रेय ऋषि के आश्रम में विदुर जी –
विदुर जी गंगा तट पर हरिद्वार के पास मह्रिषी मैत्रेय के आश्रम पहुंचे | मह्रिषी उस समय समाधि में लीन थे | विदुर जी ने बड़ी विनम्रता से प्रतीक्षा की | जब मैत्रेय ऋषि की समाधि टूटी ,तो उन्होंने विदुर को अपने सामने विनीत भाव से बैठा देखा |विदुर जी ने हाथ जोड़ कर कहा,”हे ब्रह्मन ,कौरवों के ससर्ग से दूषित हूँ | मेरा मन संसार के कोलाहल से अशांत है | आप कृपा करके मुझे भगवान की उन लीलाओं का वर्णन सुनाइए ,जिन से जीव का कल्याण हो | मै जानना चाहता हूँ कि भगवान ने इस जगत की रचना कैसे की ? जीव कैसे माया से बंधता है और कैसे मुक्त होता है
मैत्रेय का उपदेश :भगवान का ध्यान –
विदुर जी की जिज्ञासा सुन कर मैत्रेय ऋषि बहुत प्रसन्न हुए |उन्होंने कहा -“हे विदुर,तुम भागवत धर्म के अधिकारी हो |भगवान की कथा सुनने की तुम्हारी इच्छा समस्त लोकों का मंगल करने वाली है”| मैत्रेय जी बोले -“सृष्टि से पूर्व केवल भगवान नारायण ही थे | न सत था न असत ,न आकाश था | उस समय भगवान योगनिन्द्रा में लीन थे | जब उन के मन में सृष्टि रचने का संकल्प हुआ ,तब उन की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ,उसी कमल पर ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए”|
ब्रह्मा जी ने चारों तरफ देखा ,तो कुछ समझ में नहीं आया | तभी आकाश बाणी हुई -“तप करो”|ब्रह्मा जी ने हजार दिव्य वर्षों तक तप किया |तप से प्रसन्न हो कर भगवान ने उन्हें अपने विराट रूप का दर्शन दिया | उस रूप में अनन्त ब्रह्मांड समाये हुए थे | भगवान ने ब्रह्मा को सृष्टि रचने की शक्ति और ज्ञान दिया |
सृष्टि रचना का क्रम –
मैत्रेय ऋषि ने बताया कि भगवान की इच्छा से काल ,प्रकृति और पुरुष के सयोग से महातत्व उत्पन्न हुआ | महतत्व से अहंकार,अहंकार से पंचतन्मात्राएँ ,उन से पंचमहाभूत और इन्द्रियाँ बनी | इस प्रकार विराट पुरुष की रचना हुई | विराट पुरुष के अंगों से लोकों की रचना हुई -मुख से ब्राह्मण ,भुजाओं से क्षत्रिय ,जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए | उन के मन से चन्द्रमा ,नेत्रों से सूर्य ,प्राण से वायु प्रकट हुई | इस प्रकार समस्त सृष्टि भगवान का ही रूप है |
मैत्रेय ने कहा ,” हे विदुर ,भगवान निष्काम है,फिर भी भक्तों पर कृपा करने के लिए अवतार लेते हैं | वे अजन्मा हो कर भी जन्म लेते हैं ,अकर्ता हो कर भी लीला करते हैं |उन की लीला का प्रयोजन केवल जीवों पर अनुग्रह करना है |”
जीव और माया का सम्बन्ध –
विदुर जी ने पूछा ” यदि जीव ईश्वर का अंश है तो वह माया में क्यों बंधता है ?” मैत्रेय ने समझाया ,” जैसे जल में पड़ने वाला सूर्य का प्रतिबिम्ब जल के हिलने से हिलता सा लगता है ,वैसे ही आत्मा निर्लिप्त होते हुए भी शरीर के धर्मों को अपना मान लेता है |यह अज्ञान ही माया है | जब जीव भगवान की शरण लेता है ,तब माया उस का कुछ नहीं विगाड सकती |” उन्होंने आगे कहा कि भगवान की भक्ति ही माया से तरने का एक मात्र उपाय है | कर्म ,ज्ञान और योग सब भक्ति के बिना अधूरे हैं| जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक बुझ जाता है ,वैसे ही भक्ति के बिना ,अन्य साधन भी शांत हो जाते हैं |
भगवान् के अवतारों की चर्चा –
प्रसंग वश मैत्रेय ऋषि ने भगवान के विभिन्न अवतारों की चर्चा की | वराह अवतार में भगवान ने पृथ्वी को रसातल से निकाला | कपिल अवतार में अपनी माता देवहूति को सांख्य ज्ञान दिया | नृसिंह अवतार में प्रहलाद की रक्षा की | वामन अवतार में बलि से तीन पग पृथ्वी मांगी |ऋषि ने कहा -” भगवान के अवतारों की गणना नहीं की जा सकती जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं ,वैसे ही सभी अवतार श्रीकृष्ण में समा जाते हैं |वे ही समस्त अवतारों के अवतारी हैं |”
उपसंहार :भक्ति की महिमा –
अध्याय के अंत में मैत्रेय जी विदुर से कहते हैं,”हे विदुर, तुम धन्य हो जो भगवान की कथा सुनना चाहते हो ,जो मनुष्य प्रात:काल उठ कर भगवान की सृष्टि लीला का स्मरण करता है ,उस के सब पाप नष्ट हो जाते हैं |”
विदुर जी की जिज्ञासा आगे भी चलती है ,जो अगले अध्यायों का विषय बनती है |परन्तु पंचम अध्याय का सार यही है कि भगवान ही जगत का कारण हैं,उन की भक्ति ही जीव का परम कल्याण है और संतों का संग ही भक्ति का मूल है |
इस कथा से सिक्षा –
१. वैराग्य – विदुर जी ने राजमहल का सुख छोड़ कर ज्ञान की खोज की |यह सिखाता है कि सच्चा सुख भोग में नहीं ,भगवान में है |
2.. जिज्ञासा- बिना पूछे, ज्ञान नहीं मिलता ,विदुर की तरह विनम्र जिज्ञासु बनना पड़ता है |
3.. सत्संग – उद्दव ने विदुर को मैत्रेय के पास भेजा ,अच्छे संत से संग ही भगवान तक पहुंचाता है |
४. भक्ति -सृष्टि का ज्ञान होने पर भी अंत में भक्ति ही सार है | भगवान को जानना है तो उन का भजन करो |
इस प्रकार तृतीय स्कन्ध का पंचम अध्याय हमें सृष्टि के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराता है और बताता है कि समस्त ज्ञान का पर्यवसान भगवान की प्रेममयी भक्ति में ही है | यह कथा सुनने पढने से हृदय शुद्ध होता है और भगवान के चरणों में प्रीति बढती है |
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
वेबसाइट -thegodweknow.com .ऐसी ही कथा रूप में भागवत महापुराण के अध्यायों की क्रम बार जानकारी के लिए देखते रहें | साप्ताहिक भागवत में केवल श्रीकृष्ण लीलाओं का ही वर्णन किया जाता है | सम्पूर्ण भागवत के सभी अध्यायों की जानकारी इतने अल्प समय में नहीं दी जा सकती |
