द्वादशोऽध्यायः प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत )
परीक्षित का जन्म – अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र चलाया था ,उस से उतरा का गर्भ नष्ट हो गया था ,परन्तु भगवान ने उसे पुन: जीवित कर दिया था | उस गर्भ से पैदा हुए महाज्ञानी महात्मा परीक्षित | उतरा के गर्भ में स्थित वह बीर शिशु परीक्षित जब अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगा ,तब उस ने देखा कि उस की आँखों के सामने एक ज्योतिर्मय पुरुष है | उस पुरुष को अपने समीप देख कर वह गर्भस्थ शिशु सोचने लगा कि यह कौन है | इस प्रकार उस दस मास के शिशुके सामने ही धर्म रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत करके अंतर्ध्यान हो गये|
तदनन्तर अनुकूल ग्रहों के उदय से युक्त समस्त सद्गुणों को विकसित करने वाले शुभ समय में परीक्षित का जन्म हुआ| पुत्र जन्म की बात सुन कर राजा युधिष्ठर मन में बहुत प्रसन्न हुए |उन्होंने धौम्य ,कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगल वाचन और जातकर्म संस्कार करवाए | ब्राह्मणों ने संतुष्ट हो कर कहा -पुरुवंश शिरोमणि काल की गति से यह पुरुवंश मिटना ही चाहता था परन्तु तुम लोगों पर भगवान विष्णु ने यह बालक दे कर इस की रक्षा कर दी है |इस लिए इस बालक का नाम विष्णुरात होगा | धर्मराज यह मनु पुत्र इक्ष्वाकु के समान अपनी प्रजा का पालन करेगा तथा भगवान श्री राम के समान ब्राह्मण भगत और सत्य निष्ठ होगा |
ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ ब्राह्मण राजा युधिष्ठर को इस प्रकार बालक के जन्म फल बतला कर और भेंट पूजा लेकर अपने अपने घर चले गये|वही यह बालक संसार में परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ ,क्यों कि वह समर्थ बालक गर्भ में जिस पुरुष का दर्शन पा चूका था ,उस का स्मरण करता हुआ लोगों में उसी की परीक्षा करता रहता था कि देखें इन में से कौन सा वह है | जैसे शुक्ल पक्ष में दिन प्रति दिन चन्द्रमा अपनी कलाओं से पूर्ण होता हुआ बढ़ता है ,वैसे ही वह राजकुमार भी अपने गुरु जनों के लालन पालन से क्रमश: दिन प्रति दिन बढ़ता हुआ शिघ्र ही सयाना हो गया |
इसी समय राजा युधिष्ठर ने अपने स्वजनों के वध का प्रायश्चित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ के द्वारा भगवान की आराधना करने का विचार किया ,परन्तु प्रजा से वसूल किये गये कर और दंड की रकम के अतिरिक्त और धन न होने के कारण वे चिंता में पड़ गये| उन का अभिप्राय समझ कर भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन के भाई उतर दिशा में राजा मरूत और ब्राह्मणों द्वारा छोड़ा हुआ बहुत सा धन ले आये | उस से यज्ञ की सामग्री एकत्र करके महाराज युधिष्ठर ने तीन अश्वमेघ यज्ञों के द्वारा भगवान की पूजा की | इस के बाद भाइयों सहित ,राजा युधिष्ठर तथा द्रोंपदी से अनुमति ले कर अर्जुन के साथ यदुवंशियों से घिरे हुए भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारिका के लिए प्रस्थान किया |
इति प्रथम:स्कन्ध:द्वादशोऽध्यायः
