धर्म का रहस्य क्या है ?
धर्म कोई मनघडन्त वस्तू नहीं है | नित्य की जीवन यात्रा में धर्म के साथ मनुष्य का गहरा नाता है |धर्म से जीवन को मिलती है पवित्रता ,मन की शुद्धता जिस से हम सत्य को जान सकें | सत्य के अनुपम आलोक का ज्ञान प्राप्त कर सकें | सत्य की रौशनी से आकाश के ज्योतिर्मय पिंड जगमगा रहे हैं ,पृथ्वी प्राणमय है और वायु ध्वनित हो रही है | धर्म यथार्थ रहस्य को न जान कर हम लोग एक एक व्यक्ति देवता विशेष बन कर लोक संग्रह के लिए व्यस्त हो रहे हैं | धर्म हृदय की वस्तु है ,अनुभूति का विषय है ,केवल मंदिर जा कर दो बार सिर झुकाने अथवा चारों धाम घूम आने से ही धर्म सम्पादन नहीं हो जाता |
जीवन भर जिस परम आनन्दको प्राप्त करने के लिए दौड़ धुप कर के शरीर और मन को कष्ट दे रहे हो ,वह बाहर के रूप रस गंध आदि में नहीं है | वह तो अपनी आत्मा के ही निभृत कुञ्ज में नित्य विराजमान रहता है | उसे बाहर खोजने पर कोई कैसे प्राप्त करेगा ? एक सरल अनुभूति के अन्दर चल कर भगवान के साथ सम्बन्ध स्थापित होता है | मृण्मय जगत चिन्मय रूप में दिख पड़ता है ,यही धर्म है | तब लगता है कि भगवान सब से बड़े निज जन हैं | फिर तो त्रिलोकी के एश्वर्य की और लक्ष्य नहीं रह जाता | तब वह जगत विस्मृत हो कर देखता है किउन की महिमा द्युलोक से भूलोक तक व्याप्त है ,ब्रह्मा से लेकर कीटाणु पर्यन्त अणु परमाणु में उन्हीं की सता विराजमान है | उस समय उस विश्व प्रेमी का जीवन सहज और सरल हो जाता है ,कृत्रिमता का लेशमात्र भी उस में नहीं रह जाता |
धर्म की मूल शक्ति है -भगवान | धर्म ही जगत का प्राण है |धर्म ही जीव के आनन्द का स्त्रोत है |माया के जाल में पड़ा वासना कलिष्टजीव आज रोग,शोक और ताप से जर्जर है | वह केवल निराशा के दीर्घ नि:स्वास छोड़ रहा है |देहभिमानी जीव भगवान से बहुत दूर हट गया है | कोई भी दुष्कर्म करने में वह कुछ भी भयभीत या लज्जित नहीं होता | जगत की भूषण स्वरूपा दया,करुणा आदि अभ्युदयकारी शक्तियाँ आज जगत से मानो लुप्त हो गयी हैं | लोग पशु के समान भोग लालसा की परितृप्ति के लिए सदा ही लालायित हैं| वे भूल गये हैं अपने स्वरूप को,भूल गये हैं अपने निजी नित्य निकेतन को |
धर्म का यथार्थ रहस्य क्या है | वेदों में कर्मकांड का विधान देखा गया है ,वेदान्त में आत्मतत्व की घोषणा है ,सांख्य मत के अनुसार अहं तत्व का प्रचार होता है ,और वैष्णव लोग अपने धर्म में श्याम सुन्दर की मोहनी वंशी ध्वनी सुन कर आनन्दमें नृत्य करते हैं | दस्यु रत्नाकर मरा मरा जप कर के ब्रह्मविद हो गया | महाप्रभु गौरांग ने नाम प्रचार द्वारा जगत को उन्मत कर दिया | तुलसीदास ने एक राम नाम के द्वारा सत्य की महिमा का प्रचार किया | वास्तविक धर्म ऐसा ही विराट ,विशाल है | धर्म धृ धातु से निष्पन्न होता है | धर्म का अर्थ है धारण करना | धर्म ही जगत को धारण कर रहा है | इसी कारण धर्म के सूक्ष्म अति सूक्ष्म रहस्य जाल को समझना बड़ा ही कठिन है |परन्तु उस में जो सत्य निहित है ,उस सत्य की महिमा सब धर्मों में और सब ग्रन्थों में प्रचलित है | पंथ और मत अलग अलग हो सकते हैं किन्तु गन्तव्य स्थान एक ही है | जिस प्रकार नदी से जल लेते समय जिस का जितना बड़ा पात्र होता है ,वह उतना ही जल ले सकता है ,उसी प्रकार मन बुद्धि के आधार और गठन भेद से हम सत्य को वैसे ही ग्रहण कर सकते हैं | परन्तु यह सत्य नहीं है कि हमारा मन गढंत भाव ही ठीक है ,दूसरे भाव ठीक नहीं हैं | सत्य का स्वरूप अनन्त भावमय है | वह सब के सब रूपों को ग्रहण करके स्थित है | वह सब का प्रभु है ,सर्वशक्तिमान है |
परन्तु जिस को धर्म का रहस्य जानना है ,वह जीव ही माया के आश्रित है | माया के आश्रय से हम को यह शरीर प्राप्त हुआ है ,जिस प्रकार कांटे से काँटा निकाला जाता है उसी प्रकार इस शरीर का अवलम्बन करके जीव पुन: अपने सत्य स्वरूप को जान सकता है | जब तक जीव माया के अभिभूत है ,तब तक धर्म क्या है और उस का यथार्थ स्वरूप क्या है -यह किसी तरह नहीं समझ पाता |
जगत की जो कुछ सता है ,वह केवल उस विशुद्ध आत्म् सता से ही उत्पन्न हुई है | केवल वेद,उपनिषद,दर्शन पढने से ही नहीं जाना जा सकता कि धर्म क्या है | यह क्रिया कर्म पर आधारित है | तप और स्वाध्याय के द्वारा ईश्वर प्राणी निधान सिद्ध हो सकता है | तप शब्द का अर्थ है तपोलोक या आज्ञाचक्र ,उस में स्व अर्थात आत्मा की स्थिति होने पर ईश्वर प्राणी निधान होता है |तपस्या के द्वारा आत्मा का ज्ञान प्राप्त होगा | तपस्या क्या है -मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तपस्या है | काय-मन वचन से सत्य का आश्रय लेना होगा तथा नित्य ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित हो कर साध्नाभ्यास करने पर आत्म दर्शन होगा | परन्तु भक्ति के बिना आत्म दर्शन असम्भव है और चित शुद्धि हुए बिना भक्ति का उदय नहीं होता और चित शुद्धि होगी -एकमात्र साधन भजन के द्वारा |
धर्म का तत्व बड़ा ही सूक्ष्म है ,पथ बड़ा ही गहन है तुलसीदास जी कहते हैं -यह ज्ञान का विषय है ,इस के विषय में आलोचना करना भी कठिन है |बहुत शास्त्र ज्ञान होना आवश्यक है और बुद्धि में यदि उज्ज्वल वैदिक प्रकाश का अभाव हो तो वह ज्ञान ठीक ठीक समझ में नहीं आता | इसी कारण इस रास्ते के यात्री कम ही हैं | इस धर्म के तत्व को जानने के लिए एक दिन ऋषि कुमार निचिकेता को यमराज के घर जाना पड़ा था और त्रिभुवन का प्रलोभन त्याग करके धर्मराज के पास रह कर उन्होंने धर्म के रहस्य को जाना था | धर्म का तत्व पर्वत की कन्दरा में खोजते फिरने से प्राप्त नहीं होगा उसे हृदय की कन्दरा में खोजना होगा | धर्म का रहस्य जिस तिस को बताया भी नहीं जाता | बछड़े को देख कर जैसे गाय के स्तन से दूध की धारा स्वत: ही बहने लगती है वैसे ही उपयुक्त शिष्य को देख कर गुरु के प्रेममय हृदय से अमृत प्रबाह बहने लगता है | सद्गुरु की कृपा के बिना धर्म का यथार्थ रहस्य कोई नहीं जान सकता , यदि शिष्य जिज्ञासु नहीं है तो ब्रह्म बिद्या को जानने वाला पुरुष ब्रह्म बिद्या का उपदेश नहीं देता ||
धर्म रहस्य की बातें वेद,उपनिषद ,गीता और दुर्गा सप्तशती में मिलती हैं ,परन्तु सद गुरुकी कृपा के बिना तथा आत्म कृपा के बिना मोक्ष धाम में प्रवेश करना कठिन है | जो विद्वान साधक आत्म साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करता है ,उसी की आत्मा ब्रह्म धाम में प्रवेश करती है |वहां पहुंचने पर उस की पुनरावृति नहीं होती | परमात्मा का स्वरूप इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता | साधना के द्वारा मन और बुद्धि निश्चल होने पर ध्याननिष्ठ मन के समक्ष उन का यथार्थ स्वरूप प्रकाशित होता है ,योगी राज गोरखनाथ कहते हैं – जब तक ध्यान द्वारा आत्म तत्व का साक्षात्कार नहीं हो जाता तब तक ज्ञान की बातें करना मिथ्या प्रलाप मात्र ही है |
इति –
