सृष्टि के दस प्रकार -ब्रह्मा द्वारा रचना का विस्तार
परमपावन श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के नवम अध्याय में हम ने देखा कि ब्रह्मा जी ने भगवान की स्तुति की और भगवान ने उन्हें सृष्टि रचने की आज्ञा दी |अब दशम अध्याय में विदुर जी मैत्रेय मुनि से सृष्टि के रहस्य के बारे में प्रश्न करते हैं |
विदुर जी कहते हैं -हे ब्रह्मन,आप ने कहा कि भगवान् की प्रेरणा से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की |अब कृपा कर के मुझे विस्तार से बताइए कि यह सृष्टि कितने प्रकार की है और इस की उत्पति कैसे हुई? भगवान् की माया से जीव कैसे संसार में बंधता है ?
मैत्रेय जी बोले -हे विदुर ,भगवान श्री कृष्ण अनन्त हैं,उन की लीला भी अनन्त है | महापुरुषों ने सृष्टि के मुख्यत:तीन भेद बताये हैं |प्राकृत सर्ग,विकृत सर्ग,और प्राकृत-विकृत उभ्यात्मक् सर्ग | इन के ही विस्तार से दस प्रकार की सृष्टि होती है | १-६ तक प्राकृत सर्ग -जो भगवान की महत आदि शक्तियों से होती है |
पहला सर्ग -महतत्व सर्ग -जब सृष्टि का समय आता है तब काल के द्वारा भगवान के अन्दर क्षोभ उत्पन्न होता है उस से भगवान की त्रिगुणमयी माया जागृत होती है |पहले महतत्व की उत्पति होती है | यही समस्त सृष्टि का बीज है | अर्थात भगवान मतलब शून्य में जब क्षोभ उत्पन्न होता है तो अणु जो उस में विखंडित रूप में हैं, वह अणु का रूप लेना शुरू कर देते हैं ,पहला अणु ही सृष्टि का बीज है | इसे ही आदि शक्ति कहा गया है |
दूसरा सर्ग- अहंकार का सर्ग- महतत्व से त्रिविध अहंकार सात्विक ,राजस और तामस उत्पन्न होता है | सात्विक अहंकार से मन और इन्द्रियां,तामस से पंच महाभूत के कारण रूप पंचतन्मात्रा और राजस से दोनों का संयोजन होता है |अर्थात सात्विक (प्रोटोन)और तामस (इलेक्ट्रोन) का मिलाप राजस (न्यूट्रॉन ) के कारण होता है,तब एक अणु बजूद में आता है ,अणु का कारण राजस है | यही विष्णु ,शिव,और ब्रह्मा का नाम धारण करते हैं | राजस ही ब्रह्मा है सृष्टि का जनक |
तीसरा सर्ग -तन्मात्रा का सर्ग -तामस अहंकार से शब्द,स्पर्श,रूप,रस,और गंध-ये पांच सूक्ष्म तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं | यही पंचभूतों का मूल कारण है |
चौथा सर्ग-इन्द्रियों का सर्ग -सात्विक अहंकार से मन सहित दस इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं | कान ,त्वचा,नेत्र,जीभा,नासिका,-ये पांच ज्ञानेद्रियाँ और वाक्,हस्त,पाद,उपस्थ,गुदा-ये पंच कर्मेन्द्रियाँ |
पांचवां सर्ग-देवताओं का सर्ग -सात्विक अहंकार से ही इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवताओं की उत्पति होती है ,दिशा,वायु,सूर्य,वरुण,अश्विनी कुमार,अग्नि,इंद्र,विष्णु,मित्र,और ब्रह्मा,ये दस इन्द्रियांभिमानी देवता हैं ,मन का देवता चंद्रमा है |
छठा सर्ग-अज्ञान का सर्ग -यह तामसी सृष्टि है | इस से जीव की बुद्धि में अंधकार आता है | इस के पांच पर्व हैं – तम,मोह,महामोह,तामिस्त्र और महातामिस्त्र ,यही अविद्या के पांच ग्रन्थियां हैं जो जीव को बांधती हैं| ये छह सर्ग प्राकृत हैं,जो स्वत:प्रकृति से आते हैं |
7 से 10 तक विकृत सर्ग- जो ब्रह्मा जी के द्वारा र ची जाती है |
सांतवा सर्ग-स्थावर बृक्षों का सर्ग – ब्रह्मा जी ने सबसे पहले ऊर्ध्व स्त्रोत वाले बृक्षों ,लताओं ,झाड़ियों को रचा ,ये वेचारे उपर की और बढ़ते हैं | परन्तु इन् के अन्दर बहुत तमोगुण भरा होता है,इएलिए ये ज्ञान शून्य हैं,परन्तु भीतर भीतर सुख दुःख का अनुभव करते हैं|इन के छ: भेद हैं -वनस्पति,औषधि ,लता,रवक्सार,वीरुध और द्रुम |
आठवाँ सर्ग-तिर्यक योनी का सर्ग-यह तिर्यक स्त्रोत सर्ग है | पशु,पक्षी इस में आते हैं |ये भविष्य का ज्ञान नहीं रखते ,केवल वर्तमान को जानते हैं |इन्हें सूंघने से ,स्पर्श से ज्ञान होता है |इन का हृदय अत्यंत अज्ञानी होता है | पशु २८ प्रकार के माने गए हैं| गाय,बकरी,भैंस,सूअर,हिरण,ऊंट,गधा,घोडा,खच्चर आदि | पक्षी,सर्प,कीट आदि भी इसी में आते हैं |
नवां सर्ग -मनुष्य सर्ग -यह अर्वाकस्त्रोत सर्ग है | मनुष्य नीचे की और नहीं ,बल्कि उपर की और देखते हुए कर्म करता है | मनुष्य में रजोगुण की अधिकता है,इसलिए यह दुःख प्रधान होते हुए कर्म प्रधान है |मनुष्य में ज्ञान और भोग दोनों की क्षमता है |इसी योनी से जीव को मोक्ष का द्वार मिल सकता है |मनुष्य एक प्रकार का ही है ,परन्तु कर्म से अनेक रूपों में विभाजित है |
दसवां सर्ग – देव सर्ग -यह भी वैकृत ही है |इस में देवता पितर,असुर,गन्धर्व,अप्सरा,यक्ष,राक्षस,सिद्ध,चारण आदि की उत्पति होती है | यह सर्ग सुख प्रधान है ,सात्विक है ,आठ प्रकार के देवता और देवयोनियाँ इस में गिनी जाती हैं|
इस प्रकार दस सर्ग हुए |
मैत्रेय जी आगे कहते हैं -हे विदुर, इन दस सर्गों के अतिरिक्त तीन और गौण सर्ग हैं | महासर्ग ,अनुग्रह सर्ग, और कुमार सर्ग | महासर्ग अर्थात ब्रह्मा जी की सृष्टि का प्रलय |अनुग्रह सर्ग अर्थात ज्ञानियों की सृष्टि -जिस में सनकादि मुनि आते हैं ,और कौमार सर्ग – सनत्कुमारों की उत्पति है |
वास्तव में सृष्टि का मूल कारण परब्रह्म परमात्मा ही है ,ब्रह्मा जी तो निमित मात्र है | जैसे मकड़ी अपने मुख से जाला निकाल कर फिर निगल जाती है ,वैसे ही भगवान अपनी माया से इस जगत की रचना करते हैं,पालन करते हैं और फिर संहार कर देते हैं | परन्तु वे स्वयं निर्लिप्त रहते हैं|
इस अध्याय का महान संदेश यह है कि यह सारी सृष्टि भगवान की लीला है |जीव अज्ञान वश इसे अपना मान कर बन्ध जाता है | जब वही जीव इस कथा को सुन कर भगवान की शरण में जाता है तो उस का बंधन कट जाता है | जो पुरुष प्रतिदिन इस सृष्टि क्रम का श्रद्धा से पाठ या श्रवण करता है ,उस की बुद्धि शुद्ध होती है और उसे भगवान के चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त होता है |
||इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे दशमोSध्याय: ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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