श्रीमद्भागवत तृतीय स्कन्ध:द्वितीयोSध्याय:

पृष्ठभूमि -दो भक्त,एक विरह

हस्तिनापुर की गद्दी पर युधिष्ठर के बैठने के बाद विदुर जी तीर्थयात्रा पर निकल पड़े | ३६ साल घुमते घुमते प्रयास क्षेत्र पहुंचे |वहीं उन की भेंट हुई श्रीकृष्ण के परम सखा ,मंत्री और शिष्य उद्दव जी से |

विदुर जी ने देखते ही पहचान लिया ये वही उद्दव हैं जो बचपन से ही श्रीकृष्ण की छाया बन कर रहे | पांच साल की उम्र में जब बच्चे मिट्टी से घरोंदे बनाते हैं ,उद्दव जी मिट्टी की कृष्ण मूर्ती बना कर उसे भोग लगाते थे | माँ बुलाती रह जाती ,पर ये अपनी बाल लीला में ऐसे खोते कि उठते ही नहीं थे |

अब वही उद्दव बूढ़े हो चले थे ,पर चेहरे पर एक अजीब सा सूनापन था | विदुर जी ने पूछा ,’भैया द्वारका में सब कुशल हैं ? हमारे प्यारे श्यामसुन्दर,बलराम भैया ,सब यदुवंशी कैसे हैं ?’

बस इतना सुनना था कि उद्दव जी का गला रूंध गया ,आँखें भर आई|श्रीकृष्ण का नाम सुनते ही हृदय में ऐसी हूक उठी कि दो घड़ी तक वे कुछ बोल ही न सके | रोम रोम पुलकित हो गया, आंसुओं की धारा वह चली ,विदुर जी समझ गए -ये प्रेम की पराकाष्ठा है |

2.उद्दव का हृदय पटल फट पड़ा –

कुछ देर बाद जब उद्दव जी संभले ,तो आँखें पौछ कर बोले,”विदुर जी अब मैं क्या कुशल बताऊं ? श्रीकृष्ण रुपी सूर्य अस्त हो गया है | हमारे घरों को कालरूपी अजगर निगल गया है |द्वारका अब श्री हीन हो गई है “| उद्दव जी का दर्द छलक पड़ा ,यह संसार बड़ा अभागा है” विदुर जी |पर सब से अभागे तो हम यादव हैं ,सोचो ,जिस तरह मछलियाँ समुद्र में रह कर भी चाँद की अमृत-किरणों को नहीं पहचान पातीं ,वैसे ही हम श्रीकृष्ण के साथ् दिन रात रहे,खेले,खाया पीया,पर उन्हें पहचान न सके कि साक्षात परमेश्वर हमारे बीच है | ” हम तो उन्हें बस अपना सखा ,अपना यदुवंशी भाई ही मानते रहे जब कि वे तो पूरे ब्रह्मांड के आश्रय थे “|

3. वो रूप जो तीनों लोकों को मोह ले –

फिर उद्दव जी श्रीकृष्ण के रूप सौदर्य का वर्णन करने लगे | बोले ” विदुर जी ,भगवान ने जो मनुष्य रूप धारण किया था ,वो ऐसा था कि उसे देख कर तीनो लोक मोहित हो जाते थे | अरे,वो स्वयं भी अपना रूप देख कर् चकित हो जाते थे | उन के अंग इतने सुन्दर थे कि गहने भी उन्हें पहन कर खुद को धन्य मानते थे | गहने भगवान को नहीं सजाते थे ,भगवान के अंगों से गहने सज जाते थे “|

“याद है धर्मराज युधिष्ठर का राजसूय यज्ञ ? जब तीनों लोकों ने श्रीकृष्ण को देखा ,तो सब ने मान लिया कि ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की कला की पराकाष्टा यही है | इस से सुन्दर कुछ हो ही नहीं सकता “|

४. न पहचान पाने का पश्चाताप –

उद्दव जी बोले”हम यादव बड़े चतुर थे ,सब के मन की बात ताड़ लेते थे | भगवान के साथ एक थाली में खाते ,एक शय्या पर सोते ,फिर भी माया ने ऐसी पट्टी बाँधी कि हम ने उन्हें सिर्फ ‘यदुओं में श्रेष्ठ माना ‘|

शिशुपाल जैसे लोग उन्हें गालियें देते थे ,निंदा करते थे ,पर जिन का मन श्रीकृष्ण में रमा था ,उन की बुद्धि कभी भ्रमित नहीं हुई “| पर हाय, जिन लोगों ने कभी तप नहीं किया ,उन्हें भी भगवान ने इतने सालों तक दर्शन दिए और अब बिना उन के दर्शन प्यास बुझाई ही,अपना वो त्रिभुवन -मोहन रूप छिपा कर चले गए ,मानों ह्मारी आँखें ही छीन ली हों “|

५. श्रीकृष्ण क्यों आए थे ?

उद्दव जी ने आगे कहा “भगवान ने यह मनुष्य लीला अपनी योग माया से रची थी | उन का वह रूप भूषणों का भी भूषण था -परम पद था “| वो रूप दिखाने के पीछे लीला थी |उन्होंने धर्म की स्थापना की ,अधर्म का नाश किया ,भक्तों को सुख दिया और अब काम पूरा हो गया ,तो जैसे नाटक का पात्र मंच से चला जाता है ,वैसे ही वे अन्तर्धान हो गए |

६. विदुर की दशा –

उद्दव जी की बातें सुन कर विदुर जी की भी | आँखें भर आई,दोनों भक्त श्रीकृष्ण विरह में डूव गए |यही इस अध्याय का मर्म है -भगवान के धाम जाने के बाद उन के प्रेमियों की दशा |

उद्दव जी आगे पूरी भागवत में विदुर जी को -सृष्टि क्रम,कपिल-उपदेश ,भक्त चरित्र सुनाते हैं ,पर इस दुसरे अध्याय की नीव विरह-ये बताता है कि भगवान से सच्चा प्रेम हो जाए तो उन के बिना एक पल भी युग जैसा लगता है |

7.इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है ?

!, भगवान को पहचानो -हमारे सब से पास जो है,कई बार हम उसे ही नहीं पहचान पाते \यादव श्रीकृष्ण के साथ रह कर भी चूक गये ,कहीं हम भी अपनी जिन्दगी के श्रीकृष्ण को न पहचान ने की भूल तो नहीं कर रहे ?

2. विरह भी भक्ति है:उद्दव जी का रोना,बोल न पाना -यह कमजोरी नहीं,प्रेम की चरम अवस्था है |

3. रूप का ध्यान : भगवान का जैसा सुन्दर रूप उद्दव जी ने बताया,वैसा ध्यान करने से मन तुरंत शांत होता है | “भूषणों का भूषण ” वाला रूप |

४. सत्संग का महत्व – विदुर जैसे संत और उद्दव जी जैसे भक्त का मिलन ही भागवत की कथा शुरू कराता है | दुःख में सत्संग ही औषधि है |

कुल मिला कर स्कन्ध तृतीय अध्याय द्वितीय कोई घटना की लिस्ट नहीं है | यह दोनों आँखों से बहती प्रेम अश्रु की नदी है | उद्दव जी ने एक एक शब्द में श्रीकृष्ण बसते हैं | ये अध्याय हमें सिखाता है कि भगवान चले भी जाएँ तो उन की याद ,उन का नाम,उन की लीला -कथा ही भक्त का जीवन बन जाती है |जैसे उद्दव जी बोले -“अब उन की लीला कथा ही हमारे लिए कुशल-मंगल है | यही भागवत का सार है ,श्रवण ही भक्ति का पहला कदम है “|

तो बोलो जय श्रीकृष्ण , राधे -राधे

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow.com देखते रहें |

Leave a Reply