महिदास ऐतरेय का आत्मचिंतन
परिचय :कौन थे महिदास ऐतरेय ?
महिदास ऐतरेय प्राचीन भारत के एक महान वैदिक ऋषि थे ,इन का नाम सुनते ही “ऐतरेय ब्राह्मण “और ऐतरेय उपनिषद याद आते है |परम्परा कहती है कि महिदास का जन्म एक दासी ‘इतरा’के गर्भ से हुआ था |इस कारण शुरू में इन्हें समाज और अपने पिता से भी उपेक्षा मिली ,पर अपनी बिद्या ,तप और आत्मचिंतन में महिदास ने ऐसा स्थान बनाया किआज भी वेदांत की चर्चा उन के बिना अधूरी है |उन का जीवन हमें बताता है कि जन्म नहीं ,कर्म और चिन्तन ही मनुष्य को बड़ा बनाते हैं
ऐतरेय नाम कैसे पड़ा ?
पौराणिक कथा के अनुसार महिदास के पिता की कई पत्नियाँ थीं इतरा दासी पुत्र होने के कारण महिदास को यज्ञ में बैठने तक नहीं दिया जाता था |एक बार जब पिता ने सभी पुत्रों को गोद में बैठाया पर महिदास को नहीं ,तो इतरा बहुत दुखी हुई |उस ने अपनी कुलदेवी पृथ्वी या सरस्वती का स्मरण किया | मान्यता है कि तब देवी ने प्रकट हो कर महिदास को एक दिव्य वरदान दिया | उसी दिन से उन में अद्भुत प्रज्ञा जागी और वे वेदों के गूढ़ रहस्यों की व्याख्या करने लगे | इतरा के पुत्र होने से ही उन का नाम ऐतरेय पड़ा और आगे चल कर महिदास ऐतरेय के नाम से प्रसिद्ध हुए |
आत्म चिन्तन का प्रारम्भ : अपमान से जागृति तक –
महिदास का आत्म चिन्तन अपमान की आग से शुरू होता है | जब समाज ने उन्हें तिस्कृत किया,तब उन के मन में पहला प्रश्न उठा’ मैं कौन हूँ ‘?क्या मेरा मूल्य सिर्फ जन्म से तय होगा ? यहीं से उन के भीतर का दार्शनिक जागा | उन्होंने बाहरी मान्यता को छोड़ कर भीतर झांकना शुरू किया | ऐतरेय उपनिषद का पहला ही मन्त्र इसी खोज का परिणाम है : ‘ आत्मा वा इदम एक एवाग्र आसीत् ” | अर्थात सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा ही थी दूसरा कुछ नहीं था |
महिदास के लिए आत्म चिन्तन का मतलब था हर घटना को अपने भीतर की कसौटी पर परखना |अपमान मिला तो उन्होंने सोचा कि अपमान शरीर का हुआ है ,’मेरा.’ नहीं’ | यह विवेक ही उन के चिन्तन की पहली सीधी बना | ऐतरेय उपनिषद में आत्म चिन्तन के मुख्य सूत्र -महिदास ऐतरेय का आत्म चिन्तन हमें तीन बड़े स्तरों पर दिखाई देता है:-
१.सृष्टि और आत्मा का सम्बन्ध-
महिदास पूछते हैं कि यह जगत बना कैसे ? और जबाब देते हैं किआत्मा ने ही अपने को अनेक रूपों में प्रकट किया |जैसे मकड़ी अपने अंदर से जाला निकालती है ,वैसे ही आत्मा से लोक ,देवता,अन्न और प्राण निकले | उन के चिन्तन का सार – जो बाहर दिख रहा है वह भीतर वाले का ही विस्तार है | इसलिए दुनिया से लड़ने की बजाए खुद को जानना जरूरी है |
2. कोSहम की खोज :मैं कौन हूँ ?
ऐतरेय उपनिषद का सब से प्रसिद्ध भाग है जहाँ ऋषि शरीर के अंगों में “मैं” को खोजते हैं | क्या मैं बाणी हूँ ? नहीं ,गूंगे में भी ‘ मैं’ है | क्या मैं प्राण हूँ ?नहीं, मुर्दे में प्राण नहीं पर शरीर तो है | क्या मैं मन हूँ ? मन तो सोते समय लुप्त हो जाता है ,अंत में वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं “प्रज्ञा न ब्रम्ह”| यानी जो चेतना सब को जानती है ,वही ब्रम्ह है,वही मैं हूँ | महिदास का यह आत्म चिन्तन हमें सिखाता है कि हम शरीर,पद,नाम नहीं हैं | ह्म वह जागरूकता हैं जिस के कारण सब का अनुभव होता है |
3. तीन अवस्थाओं से पार जाना –
महिदास बताते हैं कि मनुष्य तीन जन्म लेता है | पहला माता पिता के वीर्य रूप में | दूसरा ,माँ का गर्भ से जन्म ,तीसरा मृत्यु के बाद फिर जन्म | पर ज्ञानी का असली जन्म तब होता है जब वह अपने को आत्मा रूप में जान ले | वह आत्म चिन्तन मृत्यु के भय को काट देता है ,क्यों कि जो जन्मा ही नहीं ,वह मरेगा कैसे ?
महिदास का चिन्तन आज के परिपेक्ष में – १२०० साल पहले की बात आज भी उतनी ही ताजा है देखें कैसे :-
आज की समस्या – महिदास का समाधान
पहचान का संकट – जन्म,जाति,नौकरी से उपर उठ कर ‘प्रज्ञान’ को पहचानों | तुम चेतना हो |
हीन भावना – इतरा पुत्र से ब्रम्हऋषि बनने की कहानी बताती है कि बाहरी टैग स्थायी नहीं है |
तनाव और डर – जब जान लिया कि दुनिया मेरी ही अभिव्यक्ति है,तो किस से डरना ?
रिश्तों में खिंचाव – सब में वही एक आत्मा है,यह भाव आते ही नफरत कम हो जाती है |
ऐतरेय ब्राह्मण -कर्म से चिन्तन तक की यात्रा –
महिदास केवल उपनिषद के ऋषि नहीं थे |ऐतरेय ब्राह्मण में उन्होंने यज्ञ के कर्म काण्ड को भी बहुत गहराई से समझाया , पर उन की खासियत यह थी कि वे हर कर्म के पीछे का’ भाव ‘खोजते थे |उदाहरण के लिए ,यज्ञ में ‘आज्य’ यानी घी डालते हैं |महिदास कहते हैं कि घी स्निग्धता का प्रतीक है ,जैसे घी आग को भटकाता है ,वैसे ही मन में प्रेम और कोमलता हो तो ज्ञान की अग्नि तेज जलती है |
महिदास से सीखने की पांच बातें –
१. अपमान को इंधन बनाओ | दुनिया ने ठुकराया तो महिदास ने खुद को तराशा | मुश्किल समय आत्म चिन्तन का सब से अच्छा मौका है |
2. सवाल पूछते रहो – मैं कौन हूँ ,यह सवाल एक दिन में हल नहीं होता | रोज थोडा समय अपने से बात करो |
3. शास्त्र और अनुभव साथ चले -महिदास ने वेद पढ़े भी और खुद जाना भी|| केवल किताबी ज्ञान अधूरा है |
४. सरलता रखो – इतरा पुत्र होने पर भी उन में अहंकार नहीं आया,ज्ञान का पहला लक्षण नम्रता है |
५. एकत्व देखो – सब के भीतर वही प्रज्ञान है |यह दीखते की तुलना ,जलन डर अपने आप गिर जाते हैं |
उपसंहार – महिदास की विरासत –
महिदास ऐतरेय का जीवन बताता है कि आत्म चिन्तन कोई हिमालय पर बैठ कर करने की चीज नहीं है | यह हर अपमान ,हर सुख दुःख ,हर रिश्ते में किया जा सकता है | उन्होंने ‘ऐतरेय ‘ नाम को कलंक से गौरव में बदल दिया | आज जब हम सोशल मिडिया पर लाइक्स से अपना मूल्य तय करते हैं तब महिदास याद आते हैं रूकिये ,भीतर देखिये | वहां प्रज्ञान ब्रम्ह बैठा है ,वही आप हैं ,वही सब कुछ है |
उनका आत्म चिन्तन हमें निमन्त्रण देता है कि हम भी अपनी इतरा यानी अपनी कमजोरी समझी जाने वाली बात को अपनी ताकत बना लें | क्यों कि आखिर में न जन्म् बड़ा है न परिस्थिति बड़ी है वो केवल अपना आप जान लेना | यही महिदास ऐतरेय का संदेश है यही उन का आत्म चिन्तन है |
लेखक-मदन लाल शर्मा
वेबसाइट-thegodweknow.com
