हिरण्याक्ष की विजय यात्रा

हिरण्याक्ष की विजय यात्रा और वराह भगवान के साथ युद्ध का आरम्भ –

पूर्व पीठिका –

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में सृष्टि के विस्तार और विष्णु के अवतारों की कथा है |पिछले अध्यायों में आप ने पढ़ा कि सनकादि ऋषियों के श्राप से वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लेते हैं |

हिरण्याक्ष बड़ा पराक्रमी ,महाकाय और सोने के समान चमकते वाले नेत्रों वाला था | वह अपने छोटे भाई से भी अधिक बलवान था | दिग्विजय की इच्छा से वह गदा ले कर त्रिलोकी को जीतने निकल पड़ा | उस के भय से देवता छिप गए | इसी बीच उस ने देखा कि पृथ्वी रसातल में डूबी हुई है | वास्तव में सृष्टि के आरम्भ में वराह भगवान पृथ्वी को हिरण्याक्ष से बचाने के लिए ही उसे रसातल से निकालने वाले थे |यही इस अध्याय की मुख्य कथा है |

अध्याय १८ की विस्तृत कथा –

मैत्रेय मुनि विदुर जी को कथा सुना रहे हैं |

हिरण्याक्ष अपने बल से चूर ,सोने के बाजूबंद पहने,हाथ में विशाल गदा लिए स्वर्गलोक पर चढ़ गया |उस का वेग इतना प्रचंड था कि उस के पैरों की धमक से पृथ्वी डगमगाने लगी | वह देवराज इंद्र को युद्ध के लिए ललकारने लगा ,” अरे इंद्र,कहाँ छिप गया है ? आज तेरा वध करके मैं इन्द्रासन पर बैठूंगा | परन्तु इन्द्रादि देवता उस के सामने आने का साहस न कर सके |वे सब छिप कर भगवान विष्णु की शरण में चले गए |

जब स्वर्ग में उसे कोई भी योद्धा नहीं मिला ,तब वह गर्जना करता हुआ समुद्र में घुस गया |वहां उस ने बड़े बड़े मगरमच्छों और वरुण के सैनिकों को भयभीत कर दिया | वर्षों तक वह समुद्र में घूमता रहा ,पर उसे अपने योग्य कोई प्रतिद्वन्धी नहीं मिला तब वह जल के अधिपति वरुण देव के पास गया और व्यंग से बोला,” हे वरुण ,तुम संसार के राजा कहलाते हो ,बड़े ज्ञानी हो |मेरे साथ युद्ध करो |तुम ने बहुत से दैत्यों को हराया है|आज मुझ से भी लड़ो |

हिरण्याक्ष के इस घमंड भरे वचन को सुन कर वरूण देव को क्रोध आ गया ,पर वे बड़े बुद्धिमान और शांत स्वभाव के थे |उन्होंने अपने क्रोध को पी कर कहा ,” हे दैत्य राज ,तुम सचमुच युद्ध के योग्य हो ,पर इस समय मैं युद्ध की इच्छा नहीं रखता | मुझे युद्ध से वैराग्य हो गया है | इस त्रिलोकी में एक ही पुरुष है जो तुम्हारे जैसे वीरों को संतुष्ट कर सकता है -वे हैं भगवान विष्णु ,वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा को शांत करेंगे |तू उन्हीं के पास जाओ “|

वरूण ने कहा ,” तुम्हारी मृत्यु उन्हीं के हाथों लिखी है | वे ही इस समय वराह का रूप धारण कर रसातल में पृथ्वी का उद्धार कर रहे हैं | वहीं जा कर तुम अपना मनोरथ पूरा करो”|

वरुण के वचन सुन कर हिरण्याक्ष प्रसन्न हो गया | उसे लगा कि अब उसे सच्चा योद्धा मिल गया | वह तुरन्त रसातल की और चल पड़ा |

उधर रसातल में भगवान विष्णु ने यज्ञ -वराह का अद्भुत रूप धारण किया था |उन का शरीर पर्वत के समान विशाल,कठोर और काला था |उन की आँखें लाल लाल थीं ,दाढें सफेद और भयंकर थीं| वे अपनी थूथनी पर पृथ्वी को धारण कर के जल से ऊपर आ रहे थे |पृथ्वी उस समय ऐसी लग रही थी जैसे वराह के दांतों पर कमल का पता रखा हो | देवता फूल बरसा रहे थे और वेदमंत्रों से उन की स्तुति कर रहे थे |

तभी हिरण्याक्ष ने वहां पहुंच कर देखा कि एक विचित्र पशु पृथ्वी को ले कर जा रहा है | वह जोर से हंसा और बोला – ” अरे वनचर ,तू कौन है ? यह पृथ्वी तो रसातल वासियों की है ,देवताओं की नहीं | तू इसे कहाँ लिए जा रहा है ? अरे मूर्ख ,तू जानता नहीं कि मैं हिरण्याक्ष हूँ,तेरे सामने खड़ा हूँ| इस पृथ्वी को छोड़ दे ,नहीं तो अभी अपनी गदा से तेरा वध कर दूंगा |”

परन्तु वराह भगवान ने उस के कडवे वचनों पर कोई ध्यान नहीं दिया |वे पृथ्वी को जल से बाहर निकालने में लगे रहे ,उन्होंने पहले पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित किया ,अपने योगबल से उसे स्थिर किया | पृथ्वी को सुरक्षित देख कर देवताओं ने राहत की सांस ली | अब भगवान ने हिरण्याक्ष की और देखा | हिरण्याक्ष फिर बोला,” तू बड़ा मायावी है ,ब्राह्मणों का पक्ष लेता है | तूने माया से ही सूकर का रूप बनाया है |आज मैं तुझे मार कर अपने बन्धु बांधवों का बदला लूँगा |”

यह सुन कर भगवान वराह को हंसी आ गई ,पर वह हंसी बड़ी भयानक थी | उन की दहाड़ से चारों दिशाए काँप उठी | भगवान ने कहा ,” अरे दुष्ट ,तू सच कहता है ,हम तो जंगली पशु ही हैं ,ग्राम्य पशुओं से तो हमें सदा डर लगता है | पर तू बड़ा वीर है ,तेरे जैसे वीरों से हमें बहुत भय लगता है | पर तू चिता मत कर ,तुझे मार कर मैं तेरा भय दूर कर दूंगा ,ताकि तू सदा के लिए खो जाये और फिर किसी को भय न हो |”

भगवान के इस व्यंग से हिरण्याक्ष तिलमिला उठा | उस की आँखें क्रोध से लाल हो गईं | उस ने अपनी विशाल गदा उठा कर भगवान वराह पर प्रहार किया |

मैत्रेय जी कहते हैं ,हे विदुर ,उस समय वराह भगवान और हिरण्याक्ष का वह युद्ध बड़ा ही अद्भत और रोमांचकारी था |दोनों ही अतुलनीय बलशाली थे |एक धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहा था ,दूसरा अधर्म के मद में |

यहाँ पर अठारहवें अध्याय की कथा विश्राम लेती है | अगले अध्याय में इस महायुद्ध का विस्तृत वर्णन है ,जहाँ ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर भगवान हिरण्याक्ष का वध करते हैं |

इस अध्याय की शिक्षा –

१. अहंकार का पतन निश्चित है ,हिरण्याक्ष जैसा त्रिलोकी का विजेता भी अहंकार के कारण विनाश को प्राप्त हुआ |

2. भगवान भक्तों की रक्षा करते हैं ,जब देवता डर गए तो स्वयं भगवान को वराह बन कर आना पड़ा |

3. पृथ्वी माता है : इस कथा में पृथ्वी को माता के रूप में दिखाया गया है ,जिस का उद्धार स्वयं भगवान करते हैं,इसलिए हमें भी पृथ्वी की रक्षा करनी चाहिए |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां सहितायां तृतीयस्कन्धे हिरण्याक्षवधे अथाष्टादशोSध्याय: ||१८||

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com

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