हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म तथा हिरण्याक्ष का दिग्विजय

दिति के गर्भ की कथा –

तृतीय स्कन्ध के सौलह्वें अध्याय में कथा आती है कि जय-विजय को सनकादि के श्राप से वैकुण्ठ से गिरना पड़ा और असुर योनी प्राप्त हुई |अब सत्रहवें अध्याय में श्री मैत्रेय मुनि विदुर जी को बताते हैं कि उसी श्राप के फलस्वरूप दिति के गर्भ से उन दोनों का जन्म कैसे हुआ |

कश्यप ऋषि के द्वारा वर प्राप्त करने के पश्चात दिति ने अपने पति की आज्ञा का पालन किया | कश्यप जी ने कहा था कि तुम्हें सौ वर्ष संयम ,शौच,व्रत और पवित्रता का पालन करना होगा ,तभी तुम्हारे गर्भ से ऐसे पुत्र जन्म लेंगे जो भगवद भक्त तो नहीं ,परन्तु महाबली होंगे और अंत में भगवान के हाथों ही उन का उद्धार होगा .दिति ने इसे स्वीकार किया और पवित्रता पूर्वक गर्भ धारण किया |

सौ वर्ष बीत जाने पर जब प्रसव नहीं हुआ तो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अनेक प्रकार के उत्पात होने लगे | मैत्रेय जी कहते हैं -हे विदुर उस समय सूर्य और चन्द्रमा के बिना ही ग्रहण लगने लगे ,आकाश में उल्कापात होने लगा ,पृथ्वी कांपने लगी ,समुद्र में ज्वार के साथ भयानक गर्जना होने लगी ,पर्वतों से अग्नि निकलने लगी और सियारों तथा उल्लुओं की अमंगल ध्वनी चारों और गूंजने लगी |

देवता इन उत्पातों को देख कर भयभीत हो गए और ब्रह्मा जी की शरण में गए | ब्रह्मा जी ने ध्यान लगा कर देखा और कहा- हे देवताओं,डरो मत | यह सब दिति के गर्भ में स्थित कश्यप के उन दो पुत्रो के प्रभाव से हो रहा है ,जो पूर्व जन्म में वैकुण्ठ के द्वारपाल जय-विजय थे | सनकादि के श्राप से वे ही असुर रूप में जन्म ले रहे हैं | वे शीघ्र ही अपने बल से तुम्हें सतायेंगे ,परन्तु स्वयं भगवान विष्णु उन का वध करने के लिए अवतार लेंगे | ब्रह्मा जी की बात सुन कर देवता निश्चिंत हो कर अपने अपने लोकों को लौट गए |

इधर दिति के गर्भ से दो जुड़वां बालकों का जन्म हुआ |जन्म के समय ही उन के कारण और भी भयंकर उत्पात हुए |जन्म लेते ही वे इतने विशाल और कठोर शरीर वाले थे कि उन के जन्म से पर्वत हिलने लगे ,उन का शरीर वज्र के समान कठोर ,पर्वत का समान विशाल और स्वर्ण के समान कान्तिमान था |बड़े का नाम हिरण्यकशिपु और छोटे का नाम हिरण्याक्ष रखा गया |

हिरण्य का अर्थ है स्वर्ण और यक्ष का अर्थ है आँख | जिस की द्दृष्टि सदा सोने और भोग पर रहे वह हिरण्याक्ष और जिस के वस्त्र सोने के समान चमकते हों,जो सोने के महलों में निवास करे ,वह हिरण्यकशिपु कहलाया |

जन्म के साथ ही दोनों में अपार बल था | वे इतने बलवान थे कि उन्होंने अपने बल से ही सभी दिशाओं को जीत लिया |हिरण्याक्ष तो इतना अहंकारी था कि वह गदा ले कर युद्ध के लिए घूमने लगा और कहने लगा कि मेरे समान बलवान कोई है तो सामने आये | उस ने सोचा कि मृत्यु को जीतने के लिए ब्रह्मा जी को तपस्या से प्रसन्न करना चाहिए |

दूसरी और हिरण्यकशिपु ने भी कठोर तपस्या की,दोनों भाइयों की तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें वर दिया कि देवता ,मनुष्य,गन्धर्व ,पशु पक्षी किसी से भी तुम्हारी मृत्यु न हो ,तुम अजेय रहोगे | वर प्राप्त करते ही दोनों और भी उन्मत हो गए |

हिरण्याक्ष वर पा कर अत्यंत उद्दण्ड हो गया |वह पृथ्वी को ही अपने कंधे पर रख कर समुद्र में घुस गया और पृथ्वी को रसातल में ले जा कर छिपा दिया | तब सम्पूर्ण लोकों में हाहाकार मच गया | सभी जीव और ऋषि मुनि त्राहि त्राहि करने लगे | तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया |

इस अध्याय का मुख्य संदेश यहीं है कि भगवान के पार्षदों से भी यदि अपराध हो जाए तो उन्हें भी नीचे गिरना पड़ता है | परन्तु भगवान अपने भक्तों का उद्धार अवश्य करते हैं ,चाहे वे शत्रु भाव से ही क्यों न भजें | हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जय-विजय ने शत्रु भाव से ही दिन रात भगवान का स्मरण किया और अंत में भगवान के हाथों मुक्ति प्राप्त की |

इस प्रकार तृतीय स्कन्ध के सत्रहवें अध्याय में हमे यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार , स्वर्ण के प्रति लोभ और सता का मद मनुष्य को राक्षस बना देता है | परन्तु भगवान की दृष्टि सब पर समान है |वह दुष्टों का संहार और सज्जनों की रक्षा के लिए सदा अवतार लेते है |

बोध-जहाँ धर्म है ,वहां जय है और जहाँ अहंकार है,वहां विनाश निश्चित है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हिरण्याक्ष -दिग्विजय सप्तदशोSध्याय: || १७ ||

लेखक- मदन लाल शर्मा

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