वैकुण्ठ धाम-जय-विजय को सनकादि का शाप

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के पंचदश अध्याय में वैकुण्ठ लोक के अलौकिक स्वरूप का अत्यंत मनोहर वर्णन और भगवान के द्वारपाल जय विजय के अहंकार एवं सनकादि ऋषियों द्वारा उन्हें दिए गए शाप की कथा का वर्णन है | यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान् के धाम में अहंकार और भेदभाव का कोई स्थान नहीं है |

विदुर जी की जिज्ञासा और मैत्रेय ऋषि का उतर-

पिछले अध्याय में दिति के गर्भ में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में प्रवेश करने वाले उन दो तेजस्वी जीवों की चर्चा हुई थी |विदुर जी ने मैत्रेय मुनि से प्रश्न किया-हे ब्रह्मन ,वे दोनों कौन थे,जिन्होंने दिति के गर्भ में प्रवेश किया और जिन के कारण सम्पूर्ण लोकों में इतने उत्पात हुए ?वे किस के अंश थे |

मैत्रेय ने कहा -हे विदुर,यह प्रसंग अत्यंत पवित्र है | एक बार सृष्टि के आदि में सनक,सनन्दन ,सनातन और सनत्कुमार नाम के चार सिद्ध ऋषि जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैंऔर सदैव पांच वर्ष के बालक के रूप में रहते हैं, ,समस्त लोकों में भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु के दर्शन की इच्छा से वैकुण्ठ लोक में गए |

वैकुण्ठ लोक का दिव्य दर्शन – मैत्रेय मुनि वैकुण्ठ का वर्णन करते हैं-वह वैकुण्ठ धाम इस भौतिक जगत से परे है | वहां सत्व,रज,तम -इन तीनों गुणों का कोई प्रभाव नहीं है |वहां काल की गति नहीं है | माया का भी वहां प्रवेश नहीं है | वहां के सभी निवासी भगवान के ही समान श्याम वर्ण,चार भुजाओं वाले ,पीताम्बर धारी और अत्यंत तेजस्वी हैं |

वहां परिजात आदि कल्पवृक्षों के वन हैं,जहाँ सदैव वसंत ऋतू रहती है |वहां विमान मणियों से जड़े हुए हैं | वहां की अप्सराएं नहीं,बल्कि लक्ष्मी के अंश रूपा भगवद ,भक्तायें निवास करती हैं | वहां के सरोवरों में सुगन्धित कमल खिले हैं जिन पर भौरें भगवान के गुणों का गान करते हुए गुंजार करते हैं | वहां क्रोध,लोभ,ईर्ष्या मोह का लेशमात्र भी नहीं है | केवल प्रेम और भक्ति का साम्राज्य है ऐसे दिव्य धाम में सनकादि ऋषि पहुंचे |वे चारों नग्न अवस्था में नि:संकोच विचरण कर रहे थे ,यद्यपि वे वृद्ध हैं,परन्तु दिखने में पांच वर्ष के बालक जैसे लगते हैं | वे वैकुण्ठ के छ:द्वारों को पार कर के सातवे द्वार पर पहुंचे |

जय-विजय द्वारा ऋषियों का अपमान –

उस सातवें द्वार पर भगवान के दो प्रमुख पार्षद -जय विजय द्वारपाल के रूप में पहरा दे रहे थे | वे गदा धारण किये हुए ,अत्यंत वलिष्ठ और ऐश्वर्यशाली थे |उन्होंने उन चार बालक ऋषियों को द्वार पर रोक लिया | जब विजय ने सोचा कि वे नग्न बालक हैं ,इन्हें भीतर जाने का अधिकार नहीं है |उन्होंने हाथ में गदा लेकर उन का मार्ग रोक दिया और कठोर वाणी में कहा -अरे बालको ,तुम कहाँ जा रहे हो ?भगवान इस समय एकांत में लक्ष्मी जी के साथ विश्राम कर रहे हैं | अभी भीतर जाना उचित नहीं है | लौट जाओ |

सनकादि ऋषि जो समदर्शी ,काम,क्रोध से रहित और परम ज्ञानी थे ,इस अपमान से क्रोधित हो गए | उन्होंने कहा -अरे द्वारपालों ,यह वैकुण्ठ लोक है ,यहाँ तो सभी समान हैं | यहाँ स्वामी,सेवक,बाहर भीतर ,अपना पराया का भेद नहीं है | भगवान तो सर्वत्र है सब के हृदय में है | फिर यहाँ द्वारपाल और रोकटोक कैसी? तुम्हारे मन में यह भेद बुद्धि आई ही कैसे ? यह तो वैकुण्ठ के स्वभाव के विरूद्ध है | इस से सिद्ध होता है कि तुम अभी भी भेदभाव और अहंकार से ग्रस्त हो |अत: तुम वैकुण्ठ में रहने योग्य नहीं हो | तुम शीघ्र ही इस पुन्य लोक से गिर कर उस पापमय लोक में जाओ जहाँ काम ,क्रोध और लोभ का निवास है | यह सुन कर जय और विजय अत्यंत भयभीत हो गए और ऋषियों के चरणों में गिर पड़े |

भगवान विष्णु का प्राकट्य और न्याय –

ऋषियों के शाप की बात सुनते ही और अपने भक्तों पर आये संकट को जान कर भक्त वत्सल भगवान विष्णु ,लक्ष्मी जी के साथ स्वयं वहां पधारे | भगवान के चरणों में नूपुरों की ध्वनी सुनाई दी | उन का वर्ण मेघ के समान श्याम था ,पीताम्बर धारण किये हुए थे ,वक्ष पर श्री वत्स का चिन्ह था | उन्हें देख कर सनकादि ऋषिओं की तपस्या धन्य हो गई |

ऋषियों ने भगवान की स्तुति की और कहा- प्रभु ,आप के द्वारपालों ने हमारा अपमान नहीं किया,बल्कि हमें आप के दर्शन का परम लाभ दिया | परन्तु हम ने क्रोध के वश में आकर आप के सेवकों को शाप दे दिया ,इस के लिए हमे क्षमा करें |

तब भगवान ने अत्यंत मधुर वाणी में कहा -हे मुनिगण ,ये जय-विजय मेरे ही पार्षद हैं,उन्होंने आप का अपराध किया है,अत: आप ने जो दंड दिया है,वह मुझे स्वीकार है | मेरे सेवक द्वारा किया गया अपराध वस्तुत:मेरा ही अपराध है,जैसे रोग होने पर सिर का उपचार किया जाता है ,वैसे ही सेवक के अपराध पर स्वामी को दंड भोगना चाहिए | ब्राह्मण मेरे आराध्य हैं| ब्राह्मणों के शाप को भी नहीं टाल सकता |

फिर भगवन ने अपने पार्षदों की और देख कर कहा-हे जय -विजय यद्यपि मैं सर्व समर्थ हूँ और शाप को टाल सकता हूँ परन्तु मैं ब्राह्मणों के शाप को मिथ्या नहीं करना चाहता | इस से ब्राह्मणों का अपमान होगा अत: तुम्हें इस शाप को भोगना ही पड़ेगा परन्तु तुम ने मेरी भक्ति की है ,इस लिए तुम्हारा कल्याण ही होगा |

तुम्हारे सामने दो विकल्प हैं-यदि तुम मेरे भक्त के रूप में सात जन्म तक मृत्यु लोक में रह कर फिर मेरे पास आना चाहते हो तो वैसा कर सकते हो | और यदि मेरे शत्रु कें रूप में तीन जन्म लेकर शीघ्र मेरे पास आना चाहते हो,तो वैसा कर सकते हो |परन्तु दोनों ही स्तिथियों में तुम मेरे ही चिन्तन में रहोगे और अंत में मुझ को ही प्राप्त होंगे |

जय-विजय ने विचार किया कि भगवान से सात जन्मों तक दूर रहना अत्यंत कष्टदायी होगा | अत:उन्होंने तीन जन्म तक भगवान का शत्रु बन कर शीघ्र भगवान के पास लौटने का विकल्प चुना ,भगवान ने तथास्तु कहा |

मैत्रेय जी कहते हैं -हे विदुर ,वही जय- विजय पहले जन्म में दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में उत्पन्न हुए | दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण बने और तीसरे जन्म में शिशुपाल और द्न्तबक्र के रूप में जन्म लेकर भगवान के हाथों वध को प्राप्त हो कर पुन:वैकुण्ठ को प्राप्त हुए |

इस कथा का संदेश –

इस अध्याय से हमें तीन प्रमुख शिक्षाएं मिलती हैं |प्रथम भगवान अपने भक्त और ब्राह्मण के सम्मान के लिए अपने निजी सेवकों को भी दंड देने में संकोच नहीं करते |दूसरा -वैकुण्ठ में भी अहंकार आ जाए तो पतन निश्चित है,इसलिए भक्त को सदैव दिन हीन बने रहना चाहिए |तृतीय भगवान के शत्रु बन कर भी यदि कोई निरन्तर भगवान का चिन्तन करे तो उसे भी मुक्ति मिल जाती है ;फिर भक्ति करने वाले की तो बात ही क्या है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण तृतीय स्कन्धे पंचदशोSध्याय: || १५ ||

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com श्रीमद्भागवत की कथाएं पढ़ने के लिए मेरे वेबसाइट को follow करते रहें |

Leave a Reply