आत्मबोध के मनीषी -सत्यकाम जाबाल

सत्यकाम का जीवन-वृत्त और तत्व ज्ञान

भारतीय ज्ञान परम्परा में उपनिषद केवल ग्रन्थ नहीं हैं ,वे सत्य की खोज की जीवंत प्रयोग शालाएं हैं |उन में प्रश्न पूछने वाले केवल ब्राह्मण या राजा ही नहीं ,अपितु सामान्य जन,स्त्रियाँ और यह तक कि समाज द्वारा उपेक्षित समझे जाने वाले व्यक्ति भी हैं | ऐसा ही एक तेजस्वी चरित्र सत्यकाम जाबाल |

छान्दोग्य उपनिषद के चतुर्थ अध्याय में सत्यकाम जाबाल की कथा विस्तार से आती है | यह कथा केवल एक बालक की शिक्षा यात्रा नहीं,अपितु भारतीय संस्कृति के मूल मन्त्र -सत्य ही सर्वोच्च है का साक्षात प्रमाण है |

जीवन वृत् – सत्यकाम की माता का नाम जाबाला था | वह एक परिचारिका थी,बालक सत्यकाम जब समझदार हुआ तो एक दिन उस ने अपनी माता से कहा,”माँ,मै बम्ह्चर्य का पालन कर गुरु के आश्रम में रह कर शिक्षा प्राप्त करना चाहता हूँ| मुझे बताओ,मेरा गोत्र क्या है ? गुरु पूछेंगे तो मै क्या बताऊं ?

यह प्रश्न किसी भी माता के लिए कठिन था |जाबाला ने कोई मिथ्या कथा नहीं गढ़ी | उस ने अत्यंत सरलता और निर्भयता से सत्य कहा ,”पुत्र,मैं नहीं जानती तुम्हारा गोत्र क्या है |योवन में मैं अनेक लोगों की सेवा में रही ,तुम्हें प्राप्त किया ,उस समय इतना ध्यान नहीं दिया | मेरा नाम जाबाला है ,तुम्हारा सत्यकाम है अत:तुम अपने को सत्यकाम जाबाला कह देना |”

अपनी माता से यह सत्य सुन कर बालक सत्यकाम विचलित नहीं हुआ|वह उसी सत्य को ले कर मह्रिषी गौतम के आश्रम में पहुंचा |गौतम ऋषि ने पूछा -“वत्स तुम्हारा गोत्र क्या है ? “

सत्यकाम ने ज्यों का त्यों वह वाक्य दोहरा दिया जो माता ने कहा था | उस ने कुछ छुपाया नहीं,कुछ जोड़ा नहीं | यह सुन कर सभा में वैठे अन्य शिष्य हंसे होंगे ,परन्तु आचार्य गौतम ने इस बालक की आँखों में सत्य का तेज देखा |उन्होंने कहा -” कोई अब्राह्मण इतना सत्य नहीं बोले सकता |तुम सत्य से विचलित नहीं हुए|जाओ समिधा ले आओ,मैं तुम्हारा उपनयन करूंगा | तुम ने सत्य को नहीं छोड़ा ,इसलिए सत्य ने तुम्हें नहीं छोड़ा |”

यही वह क्षण है जब भारतीय संस्कृति गोत्र से ऊपर उठ कर गुण को ,जन्म से ऊपर उठ कर कर्म और चरित्र को प्रतिष्ठा देती है |गौतम ऋषि ने कहा -“न सत्यात अगा ” तुम सत्य नहीं डिगे |

उपनयन के पश्चात गौतम ऋषि ने सत्यकाम को चार सौ दुर्बल गायें दे कर कहा ,” इन का पालन करो,जब ये सत्यकाम गायें एक हजार हो जाएँ तो लौट आना | सत्यकाम गायों को लेकर वन में चला गया |वहां एकांत में प्रकृति के सानिध्य में,सेवा और प्रतीक्षा में उस ने वर्षों बिताए |गायों की सेवा करते करते जब वे एक हजार हो गईं ,तब उस के जीवन में ब्रम्हज्ञान की पहले किरण प्रकट हुई | यह ज्ञान उसे मनुष्यों ने नहीं ,अपितु प्रकृति की शक्तियों से मिला |

2. प्रकृति का ब्रम्होपदेश-सत्यकाम की चार गुरुओं से शिक्षा- यह उपनिषद की अत्यंत काव्यमय और दार्शनिक विशेषता है |

पहला उपदेश – वृषभ द्वारा : मार्ग में वृषभ ने उसे कहा-“सत्यकाम ,हम एक हजार हो गये हैं |हमे गुरु के आश्रम ले चलो| मैं तुम्हे ब्रम्ह के एक पाद का उपदेश देता हूँ |पूर्व दिशा,पश्चिम दिशा ,उतर दिशा और दक्षिण दिशा – यह चारों दिशाएँ ब्रम्ह का पहला पाद है,जिसे “प्रकाशवान”कहते हैं जो इस प्रकार जानता है वह इस लोक में प्रकाशवान होता है |”

दूसरा उपदेश-अग्नि द्वारा “:-रात्रि में जब उस ने अग्नि जलाई तो अग्नि ने कहा -मैं तुम्हे ब्रम्ह के दूसरे पाद का उपदेश देती हूँ | पृथ्वी,अन्तरिक्ष ,द्युलोक और समुद्र- ये चार पाद ब्रम्ह का दूसरा पाद है ,इसे अनन्तवान ” कहते हैं|”

तीसरा उपदेश-हंस द्वारा -अगले दिन एक हंस ने आ कर कहा -“अग्नि,सूर्य,चन्द्रमा और विद्युत् -यह ब्रम्ह का तीसरा पाद है ,जिसे “ज्योतिष्मान कहते हैं|

चौथा उपदेश-भद्रू पक्षी (जल मुर्गा ) द्वारा – अंत में एक भद्रू ने उपदेश दिया -प्राण,चक्षु,गोत्र और मन-ये ब्रम्ह के चौथे पाद हैं,जिसे “आयतनवांन “कहते हैं|”

इस प्रकार सत्यकाम के अप्रत्यक्ष रूप से ब्रम्ह के सोलह कलाओं का ज्ञान प्राप्त हुआ | वह एक हजार गायों के साथ गुरु आश्रम लौटा |उसे देखते ही गौतम ने कहा -“वत्स तुम्हारा मुख ब्रम्हज्ञानी के समान दीप्त हो रहा है ,किस ने तुम्हें उपदेश दिया ?”सत्यकाम ने विनम्रता से कहा-मनुष्यों से भिन्न देवताओं ने |परन्तु मेरी इच्छा है कि मुझे आप ही उपदेश दें,क्यों कि मैने सुना है कि आचार्य से प्राप्त बिद्या ही सर्वोतम होती है “|

तब गौत्म ने उसे शेष बिद्या का उपदेश देकर कृत कृत किया ,आगे चल कर सत्यकाम स्वयं एक महान आचार्य बना |उस का शिष्य उपकोसल ,कामलायन भी ब्रम्ह निष्ठ हुआ |

3. तत्व चिन्तन –

सत्यकाम जाबाल का चरित्र केवल कथा नहीं ,गहन दर्शन है |

क- सत्य ही ब्राह्मणत्व है : उपनिषद ने यहाँ जन्मना जाति व्यवस्था पर सब से बड़ी चोट की है | ब्राह्मण वह नहीं जो ब्राह्मण कुल में जन्मा ,ब्राह्मण वह है जो सत्य पर अडिग है,जो निर्मल है,जो जानने का साहस रखता है | गौतम ऋषि का यह निर्णय वैदिक समाज की उदारता और सत्यनिष्ठ का सर्वोच्च उदाहरण है | आधुनिक युग में जहाँ हम डिग्री और प्रमाण पत्र से मनुष्य को मापते हैं वहां सत्यकाम हमें बताता है कि चरित्र ही सब से बड़ा प्रमाण पत्र है |

ख- ज्ञान की लोकतांत्रिकता – ब्रम्ह बिद्या केवल आश्रम की चार दीवारों में कैद नहीं है |वृषभ ,अग्नि,हंस और भद्रू -ये प्रतीक हैं कि ज्ञान का स्त्रोत समस्त चराचर जगत है |जो विनम्र है ,सेवा में रत है ,एकांत में प्रतीक्षा करना जानता है ,प्रकृति स्वयं उसे गुरु बन कर सिखाती है | इसे ही आधुनिक भाषा में अनुभवजन्य ज्ञान या Experiential learning कहेंगे |

ग . सोलह कला ब्रम्ह का सिद्धान्त- सत्यकाम को वताया गया ब्रम्ह चार पाद वाला है |प्रत्येक पाद चार कलाओं वाला है |कुल सोलह कलाएं ,इस का अर्थ है -ब्रम्ह कहीं दूर आकाश में नहीं,वह चतुर्दिक व्याप्त है |दिशाओं में,पचमहाभूतों में,ज्योतियों में , हमारी इन्द्रियों में और मन में | यह जड चेतन की एकता का अद्वैत दर्शन है |ब्रम्ह को पाने के लिए संसार छोड़ना नहीं,अपितु संसार को ब्रम्हमय देखना है |

घ. गुरु और शिष्य का सम्बन्ध :सत्यकाम को देवताओं ने ज्ञान दिया ,फिर भी उस ने गुरु के मुख से सुनने का आग्रह किया |यह भारतीय परम्परा में गुरु-मुख की महता को दर्शाता है | ज्ञान सूचना नहीं है वह चेतना का ह्स्तातरण है,जो गुरु की उपस्थिति में ही फलित होता है |

ड. प्रतीक्षा और सेवा का व्रत : सत्यकाम को एक हजार गायें होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी |यह गो सेवा केवल पशुपालन नहीं,इन्द्रिय -निग्रह ,धैर्य और एकाग्रता का तप था ,बिना तप के कोई भी विद्या स्थिर नहीं होती |

आज के समय में सत्यकाम जाबाल का जीवन अत्यंत प्रासंगिक है | जब समाज में पहचान के संकट हैं ,जब लोग अपनी कमियों को छुपाते हैं,तब जाबाला और सत्यकाम का निश्छल सत्य हमें साहस देता है | एक माता ने अपने पुत्र को झूठी शान के बजाए सत्य की पूँजी दी और वह पूँजी उसे ब्रम्हज्ञानी बना गई |

इसलिए छान्दोग्य उपनिषद का यह आख्यान आज भी प्रकाश स्तम्भ की तरह है,जो कहता है -सत्य को धारण करो,वही तुम्हें धारण करेगा |

सन्दर्भ ग्रन्थ -छान्दोग्य उपनिषद -अध्याय ४,खंड ४से 9 तक .|

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com

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