जय-विजय का वैकुण्ठ से पतन
पिछले अध्याय में आप ने सुना कि किस प्रकार ब्रह्मा जी के चार मानसपुत्र सनक,सनन्दन ,सनातन और सनत्कुमार ,जो सदा पांच वर्ष के बालक के रूप में रहते हैं,दिगम्बर वेश में वैकुण्ठ लोक पहुंचे |वहां वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें बालक समझ कर द्वार पर रोक दिया और अपमानित किया |इसी अपराध पर क्रोधित हो कर सनकादि ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया ,”तुम इस वैकुण्ठ धाम के योग्य नहीं हो ,इसलिए तुम मृत्यु लोक में जाकर असुर योनी को प्राप्त हो ओ “|
उसी क्षण सम्पूर्ण वैकुण्ठ में हाहाकार मच गया | तभी भगवान हरि अपने शयन से उठ कर अपने भक्तों के रूंदन को सुन कर वहां पधारे |
श्री ब्रह्मा जी विदुर से कहते हैं ,”हे देवगणों ,जब सनकादि मुनियों ने इस प्रकार जय-विजय को श्राप दिया ,तुम वैकुण्ठ पति लक्ष्मी नारायण वहां साक्षात प्रकट हुए | उन का रूप करोड़ों सूर्यों के समान तेजोमय था |नीलमेघ के समान श्याम वर्ण ,पीताम्बर ,गले में कौस्तुभ मणि और वनमाला ,चार भुजाओं में शंख,चक्र,गदा ,पद्म | उन के पीछे स्वयं लक्ष्मी जी चंवर झुला रही थी |
भगवान को देखते ही सनकादि मुनि उन की रूप माधुरी में मोहित हो गये | परन्तु भगवान ने तुरन्त उन ब्रम्ह ऋषियों को प्रणाम किया और बड़ी विनम्रता से कहा ” हे मुनिगण ,ये दोनों जय और विजय मेरे निजी पार्षद और सेवक हैं | उन्होंने आप की आज्ञा का उल्लंघन करके मेरी इच्छा के विरुद्ध जाकर आप का महान अपराध किया है | अत: आप ने इन्हें जो दंड दिया है ,वह मुझे भी अत्यंत प्रिय है”|
ब्राह्मण मेरे आराध्य हैं | मेरे सेवकों ने आप का तिरस्कार किया ,तो मानों वह तिरस्कार मैंने ही किया | इसलिए मै आप से क्षमा की भिक्षा मांगता हूँ |सेवक के अपराध पर संसार के स्वामी ही बदनाम होता है ,जैसे शरीर पर कुश्ट रोग लगने से सम्पूर्ण शरीर कुरूप हो जाता है ,वैसे ही सेवक का अपराध स्वामी की कीर्ति को मलिन कर देता है | भगवान आगे बोले ,”मेरी निर्मल कीर्ति में स्नान करके तो चांडाल तक पवित्र हो जाता है,इसलिए मेरा नाम वैकुण्ठ है ,पर यह कीर्ति भी मुझे आप जैसे ब्राह्मणों की कृपा से ही मिली है | जो ब्राह्मणों के विरुद्ध आचरण करेगा ,वह चाहे मेरी भुजा ही क्यों न हो ,मैं उसे तुरन्त काट डालूँगा |”
” ब्राह्मण गौ और अनाथ प्राणी -ये मेरे ही शरीर हैं ,जो इन में भेद बुद्धि रखता है ,उसे मेरे यमदूत दंड देते हैं | जो व्यक्ति ब्राह्मण के कठोर वचन को भी मेरे भाव से प्रसन्न मन से सह लेता है ,वह मुझे वश में कर लेता है,जैसे पुत्र रूठे हुए पिता को मना लेता है |”
“अत: हे मुनियों ,इन दोनों ने मेरा अभिप्राय न समझ कर अज्ञान वश आप का अपमान किया है | मै आप से प्रार्थना करता हूँ कि इन के निर्वासन का काल शीघ्र ही समाप्त हो ,जिस से ये अपने अपराध का फल भोग कर शीघ्र ही मेरे धाम में वापिस लौट आयें |”
भगवान की यह अद्भुत उदारता और ब्राह्मण -भक्ति देख कर सनकादि मुनियों का क्रोध शांत हो गया |उन का अंग अंग पुलकित हो उठा |योगमाया के स्वामी की माया से मोहित हो कर वे ज्ञान नेत्रों से सत्य को पहचान गए |
सब सनकादि मुनियों ने हाथ जोड़ कर कहा -“हे प्रभो,आप तो सर्वेश्वर हैं| आप स्वयं परब्रम्ह हो कर भी हम से कह रहे हैं कि आप ने मुझ पर अनुग्रह किया ,इस का गूढ़ रहस्य हम नहीं समझ पा रहे| हे नाथ आप ब्राह्मणों के परम हितैषी हैं,यह तो केवल लोक शिक्षा के लिए आप ऐसा कह रहे हैं |वास्तव में तो ब्राह्मणों और ब्रह्मा जी के भी आराध्य देव आप ही हैं |सनातन धर्म आप से ही उत्पन्न हुआ है |”
” हे भगवान ,आप की कृपा से ही योगीजन इस मृत्यु रुपी संसार सागर को सहज पार कर जाते हैं,फिर भला आप पर कोई क्या कृपा कर सकता है ?लक्ष्मी जी जिन का चरण रज को सदा मस्तक पर धारण करती है ,वे भी आप की भक्ति के आगे तुच्छ है | आप तो केवल भक्त वत्सल हैं”| ” हे सर्वेश्वर ,इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझें वैसा दंड दें या पुरस्कार दें,हम दोनों बातों में सहमत हैं | हम ने आप के निरपराध सेवकों को श्राप दिया ,इसलिए हमे ही दंड देना उचित हो तो वह भी हमें सहर्ष स्वीकार है |”
भगवान ने मुस्कुराते हुए गम्भीर वाणी में कहा -” हे मुनियों आप ने इन्हें जो श्राप दिया है ,वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है|यह मेरी ही इच्छा थी | मेरी लीला के लिए यह आवश्यक था ,अब ये दैत्य योनी को प्राप्त होंगे | वहां शत्रु भाव से निरन्तर मेरा चिन्तन करने से इन की बुद्धि मुझ में एकाग्र हो जायेगी | क्रोध से उपजी यह एकाग्रता भी योग के समान ही इन्हें पवित्र कर देगी और ये शीघ्र ही मेरे पास लौट आयेंगे |”
इस के पश्चात सनकादि मुनियों ने भगवान विष्णु और उन के स्वयं-प्रकाश वैकुण्ठ धाम की परिक्रमा की,प्रणाम किया और भगवान का गुणगान करते हुए प्रसन्नता पूर्वक वहां से विदा हो गए |
मुनियों के जाने के बाद भगवान ने अपने भयभीत पार्षदों जय-विजय से कहा -“जाओ निर्भय हो कर जाओ |तुम्हारा कल्याण होगा | मैं सब कुछ करने में समर्थ होने पर भी ब्राह्मणों के तेज को मिटाना नहीं चाहता |पूर्व काल में एक बार जब मैं योग् निंद्रा में था ,तब तुम ने द्वार पर लक्ष्मी जी को भी रोक दिया था ,तब उन्होंने क्रोधित हो कर तुम्हें श्राप दिया था | अब यह दूसरा श्राप उसी का ही परिणाम है|”
” दैत्य योनी में मेरे प्रति तुम्हारी शत्रु बुद्धि ही तुम्हें मेरे निकट लाएगी | तुम इस ब्रम्ह तिरस्कार के पाप से मुक्त हो कर शीघ्र मेरे पास आ जाओगे |”
ऐसा कह कर भगवान अपने वैकुण्ठ धाम में प्रवेश कर गए,जो विमानों की पंक्तियों से सुशोभित था | इधर जय-विजय ब्रम्ह श्राप के कारण उसी क्षण श्री हीन हो गए,उन का सारा तेज ,गर्व और वैकुण्ठ का एश्वर्य जाता रहा | जब वे वैकुण्ठ से नीचे गिरने लगे ,तब वैकुण्ठ वासी देवताओं में हाहाकार मच गया |
ब्रह्मा जी कहते हैं ,” हे देवगणों ,इस समय कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ में जो अत्यंत उग्र तेज स्थित है ,वह और कोई नहीं ,भगवान के ही दो पार्षद हैं ,जिन्होंने दैत्य योनी में प्रवेश किया है ,इन्हीं दोनों के तेज से तुम सब का तेज फीका पड़ गया है |यह सब भगवान की ही लीला है || जो आदि पुरुष सृष्टि की उत्पति ,स्थिति और संहार के कारण हैं,वे श्री हरि ही हमारा कल्याण करेंगे
इस प्रकार इस अध्याय में भगवान की ब्राह्मण भक्ति ,भक्त वत्सलता और जय-विजय के तीन जन्मों की यात्रा की भूमिका का दिव्य वर्णन होता है ,जो आगे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में प्रकट होती है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे षोडशोSध्याय: || १६ ||
लेखक – मदन लाल शर्मा
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