श्रीमद्भागवत तृतीय:स्कन्ध: प्रथमोSध्याय
श्रीमद्भागवत का तृतीय स्कन्ध ‘सर्ग’ यानी सृष्टि प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन करता है | द्वितीय स्कन्ध में ब्रह्मा जी द्वारा नारद को चतुश्लोकी भागवत का उपदेश समाप्त हुआ था | अब तृतीय स्कन्ध का आरम्भ विदुर और उद्धव के ऐतिहासिक संवाद से होता है| यह अध्याय भागवत की कथा धारा को महाभारत के बाद के कालखंड से जोड़ता है |
जब भगवान श्रीकृष्ण अपने धाम पधार चुके थे और यदुवंश का संहार हो गया था ,तब महात्मा विदुर तीर्थ यात्रा करते हुए प्रयास क्षेत्र पहुंचे |वहीं उन की भेंट भगवान के परम भक्त उद्धव से हुई| यही मिलन तृतीय स्कन्ध के प्रथम अध्याय का मुख्य विषय है |
कथा का आरम्भ :परीक्षित के प्रश्न _ अध्याय की शुरुआत राजा परीक्षित के प्रश्न से होती है | वे शुकदेव जी से पूछते हैं-‘प्रभो’भगवान मैत्रेय के साथ विदुर जी का समागम कहाँ और किस समय हुआ था | पवित्रात्मा विदुर ने उन से कोई साधारण प्रश्न नहीं किया होगा |
शुकदेव जी प्रसन्न हो कर कथा सुनाते हैं कि विदुर जी अपने सुख समृद्धिसे भरे घर को छोड़ कर वन में चले गए थे |यह वही समय था जब श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बन कर हस्तिनापुर गए थे और दुर्योधन के महलों को छोड़ कर बिना बुलाये विदुर जी के घर पधारे थे |
विदुर जी का गृह त्याग और तीर्थ यात्रा –
महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठर के राज्यभिषेक होने पर भी विदुर का मन संसार से विरक्त हो गया | धृतराष्ट्र और गान्धारी के वन गमन के बाद विदुर जी ने भी सब कुछ त्याग दिया | वे तीर्थों का सेवन करते हुए प्रयास क्षेत्र पहुंचे | यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि विदुर जी धर्म के मूर्तिमान स्वरूप थे | यम राज के शाप से वे शूद्र योनी में उत्पन्न हुए थे ,किन्तु उन का ज्ञान ,वैराग्य और भक्ति अतुलनीय थी | भागवत के इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि भक्ति में जाति पाति का कोई भेद नहीं |
उद्दव -विदुर मिलन: भाबुक संवाद –
प्रयास क्षेत्र में विदुर जी ने उद्दव जी को देखा | उद्दव भगवान श्रीकृष्ण के मंत्री सखा और परम भक्त थे | श्रीकृष्ण ने स्वधाम जाने से पहले उद्दव को ही अपना ज्ञान सौंपा था | विदुर जी ने उद्दव को देखते ही प्रेम विहल हो कर आलिंगन किया | दोनों की आँखों में प्रेमाश्रु बहने लगे | विदुर जी ने उद्दव से कुशल क्षेम पूछा |किन्तु यह कुशल क्षेम लौकिक नहीं था | उन्होंने ने पूछा -‘जिन्होंने अजन्मा होकर भी अपनी शरण में आये हुए समस्त लोकपाल और भक्तों का प्रिय करने के लिए यदुकुल में जन्म लिया है ,उन पवित्र कीर्ति श्री हरि की बातें सुनाओ ‘| विदुर जी का यह प्रश्न सम्पूर्ण भागवत का सार है | वे श्रीकृष्ण की लीला ,उन के गुण ,उन के अवतार का रहस्य जानना चाहते थे |
उद्दव द्वारा श्रीकृष्ण महिमा का स्मरण –
भगवान के अवतार रहस्य को स्पष्ट करते हुए उद्दव जी कहते हैं कि भगवान का अवतार कर्म बंधन से नहीं ,अपितु अपनी अहैतुकी कृपा से होता है | गुणों से पार हो चुके ,मुक्त पुरुष भी देह बंधन नहीं चाहते ,फिर भगवान क्यों लेंगे ? केवल भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए |
पाण्डवों का स्मरण- विदुर जी को पाण्डवों की याद आई| उन्होंने कहा “बेचारी कुंती से महाराज पांडु के वियोग में मृतप्राय स्त्री हो कर भी इन बालकों के लिए ही प्राण धारण किये हुए है | महाराज पांडु ऐसे अनुपम वीर थे कि उन्होंने केवल एक धनुष ले कर ही अकेले चारों दिशाओं को जीत लिया था |”
इस प्रसंग से विदुर जी का वात्सल्य और पाण्डवों के प्रति प्रेम प्रकट होता है और साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि श्रीकृष्ण के बिना पाण्डवों का जीवन कैसा सूना हो गया होगा |
इस अध्याय का दार्शनिक संदेश –
१ भक्ति की महिमा-विदुर और उद्दव दोनों ही उच्च कोटि के भक्त हैं,उन का मिलन बताता है कि भक्तों का संग स्वयं भगवान का संग है |
2. वैराग्य का आदर्श- राज महलों का सुख छोड़ कर विदुर का वन गमन हमें सिखाता है कि परमार्थ के लिए लौकिक सुख त्यागे जा सकते हैं |
3. अवतार तत्व – भगवान अजन्मा हो कर भी भक्तों के लिए जन्म लेते हैं |उन का प्रत्येक कर्म लोक कल्याण के लिए होता है |
४. कथा की जिज्ञासा – परीक्षित का प्रश्न और विदुर जी की जिज्ञासा हमें सिखाती है कि भगवान कथा सुनने के लिए मन में तीव्र उत्कंठा होनी चाहिए |
उपसंहार – तृतीय स्कन्ध का प्रथम अध्याय समाप्त होता है ,विदुर जी उद्दव से प्रार्थना करते हैं कि वे भगवान क लीलाएं सुनाएँ ,यहीं से भागवत की मुख्य धारा बहने शुरू होती है | यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्ची जिज्ञासा हो तो भगवान् स्वयं किसी उद्दव को भेज कर अपना ज्ञान प्रदान करते हैं |
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम हंस्या संहितायां तृतीया स्कन्धे विदुरोद्दव संवारे प्रथमोSध्याय: ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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