श्रीमद्भागवत द्वतीय:स्कन्ध: सप्तमोSध्याय:
भगवान के लीला अवतारों की कथा-
अध्याय का सन्दर्भ -द्वितीय स्कन्ध के सप्त अध्याय में ब्रह्मा जी अपने मानस पुत्र देव्ऋषि नारद को भगवान के विभिन्न लीलावतारों का रहस्य बताते हैं |यह अध्याय लीला अवतार कथा के नाम से प्रसिद्ध है |यहाँ अवतारों का क्रमबद्ध वर्णन है कि किस रूप में कब कब प्रकट हुए और क्या लीला की |
लीलावतारों की विस्तृत कथा –
१. पुरुष अवतार – सृष्टि के आरम्भ में भगवान कृपानिधान शयन करते हैं ,उन्हीं की नाभि से कमल प्रकट हुआ जिस में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए ,यह भगवान का पहला अवतार है ||2..वराह अवतार – अनन्त भगवान ने जल में डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार करने के लिए वराह शरीर धारण किया | आदि दैत्य हिरण्याक्ष जल के अंदर ही उन से लड़ने के लिए आया | उसे वराह भगवान ने अपनी दाढ़ों से मार दिया और दाढ़ों” पर पृथ्वी को रख कर उपर लाये | दैत्य को मार कर पृथ्वी का उद्धार किया |
3. सुयज्ञ अवतार – भगवान ने रुचि नामक प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से सुयज्ञ के रूप में अवतार लिया ,उस अवतार में देवताओं को दक्षिणा नामक पत्नी से उत्पन्न किया | इसी से स्वायम्भुव मनु ने उन्हें “हरि “नाम से पुकारा |
४. कपिल अवतार – देवहूति के गर्भ से उत्पन्न हो कर ,माता को सांख्य योग का उपदेश दिया | आसुरी नामक ब्राह्मण को तत्व ज्ञान दिया |
५.. दतात्रेय अवतार – महऋषि अत्री भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करना चाहते थे ,उन पर प्रसन्न हो कर भगवान् ने उन से कहा कि” मैंने अपने आप को तुम्हें दे दिया |” इसी से उन का नाम”दत”( दतात्रेय )’पड़ा | उन के चरणकमलों के पराग से राजा यदु और सहस्त्रार्जुन आदि ने योग की भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धियाँ प्राप्त की |
६. सनक ,सनन्दन ,सनातन और सनत्कुमार के रूप में अवतार -सृष्टि रचने से पहले ब्रह्मा जी ने तप किया उस से प्रसन्न हो कर भगवान ने सन नाम से सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार के रूप में अवतार लिया | इस अवतार में उन्होंने प्रलय के पहले कल्प के भूले हुए आत्मज्ञान का ऋषियों के प्रति यथावत उपदेश दिया ,जिस से उन लोगों ने तत्काल परम तत्व का हृदय में साक्षात्कार कर लिया |
7. हयग्रीव अवतार – इस अवतार में भगवान ने अपनी नासिका से श्वास के रूप में वेद्बाणी प्रकट की | |
८.. नृसिंह अवतार – देवताओं का भय मिटाने के लिए भगवान ने नृसिंह का रूप धारण किया हिरण्यकशिपू को ब्रह्मा जी का वरदान था कि न दिन में,न रात में ,,न मनुष्य से,न पशु से ,न अस्त्र से, न शस्त्र से ,न अंदर न बाहर ,न जमीन में मार सकेगा | भगत प्रहलाद की रक्षा हेतु भगवान सभा के खम्भे से नृसिंह रूप में प्रकट हुए |संध्या के समय देहली पर अपनी जाँघों पर लिटा कर अपने नखों से उस का वध किया |
धर्म संस्थापक अवतार –
9.. वामन अवतार – अदिति कश्यप के यहाँ वामन रूप में जन्म लिया ,बलि के यज्ञ में जा कर तीन पग भूमि मांगी| दो पग में पृथ्वी आकाश नाप कर तीसरा पग बलि के मस्तक पर रख कर उसे सुतल लोक का राजा बना दिया |
10.. परशुराम अवतार – जब संसार में ब्राह्मण द्रोही आर्य मर्यादा का उल्लंघन करने वाले क्षत्रिय अपने नाश के लिए ही देव वश बढ़ जाते हैं और पृथ्वी के कांटे बन जाते हैं ,तब भगवान परशुराम रूप में अवतीर्ण हो कर अपने फरसे से उन का इक्कीस बार संहार करते हैं |
११. राम अवतार – दसरथ कौशल्या के यहाँ अवतरित हुए,रावण,कुम्भकर्ण आदि राक्षसों का वध करके धर्म की मर्यादा स्थापित की |
12.. युग विशेष के अवतार –
कृष्ण बलराम अवतार- द्वापर के अंत में पृथ्वी का भार हरण करने हेतु देवकी,वसुदेव के यहाँ प्रकट हुए |प्रलम्ब ,धेनुक,वीके,केशी,अरिष्टा सुर आदि दैत्यों का वध किया | कालयवन,भौमाँ सुर,पौन्द्र्क,मिथ्या,वासुदेव,शल्य,द्विविद वानर,बलबल ,द्न्तबक्त्र का वध किया | कम्बोज,मत्स्य,कुरु,कैकय,सृज्य आदि देशों के दुष्ट राजाओं का भीम,अर्जुन के माध्यम से संहार कराया ,ये सभी मारे जा कर भगवान के धाम को प्राप्त हुए |
ज्ञान और धर्मरक्षा अवतार
१३. व्यास अवतार – द्वापर के अंत में जब लोगों की बुद्धि औरे आयु कम होने लगी ,तब भगवान ने सत्यवती के गर्भ से व्यास रूप में जन्म लिया | एक वेद के चार भाग ऋग्वेद,यजुर्वेद ,सामवेद,अथर्वेद किये | पुराण ,महाभारत की रचना कर वेद के अर्थ को सरल किया |
बुद्ध अवतार -देवताओं के शत्रु दैत्य जब वेद मार्ग का सहारा ले कर मयदानव के बनाये अदृश्य नगरों में रह कर उपद्रव करने लगे तब भगवान ने बुद्ध रूप धारण किया | लोगों की बुद्धि में मोह उत्पन्न करके उप धर्मों का उपदेश दिया| जिस से दैत्य वेद मार्ग से भटक जाएँ |
१४ . कल्कि अवतार -कलियुग के अंत में जब सत्पुरूषों के घर पर भी भगवान की कथा होने में बाधा पड़ने लगेगी ,ब्राह्मण,क्षत्रिय तथा वैश्य पाखंडी और शूद्र राजा हो जायेंगे ,यहाँ तक कि कहीं भी “स्वाहा”,”स्वधा” और “वषट्कारं” की ध्वनी -देवता-पितरों के यज्ञ -श्राद्ध की बात तक नहीं सुनाई पड़ेगी ,तब कलियुग का शासन करने के लिए भगवान कल्कि अवतार ग्रहण करेंगे |
अध्याय का महत्व –
ब्रह्मा जी कहते हैं : भगवान के यह अवतार समुद्र की लहरों के समान अनन्त हैं | इन में से कुछ मुख्य लीलाएं मैंने कहीं ,जो मनुष्य श्रद्धा से इन अवतार कथाओं का नित्य श्रवण कीर्तन करता है ,वह समस्त पापों से मुक्त हो कर भगवान के परम पद को प्राप्त होता है |
परमात्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है मदन लाल शर्मा की कलम से –
मैं मदन लाल शर्मा ,उम्र ८२ वर्ष का हो चूका हूँ | जोगिन्दर नगर की धरती पर जन्म ले कर ,हिमाचल की वादियों में रहते हुए जीवन के आठ दशक देख लिए ,इतनी उम्र में अब यही लगता है कि परमात्मा को शब्दों में बांधना तो असम्भव है,पर हाँ जो अनुभव किया ,जो समझा ,उसे सांझा कर सकता हूँ |
मेरे लिए परमात्मा कोई मूर्ती नहीं ,कोई आकृति नहीं | गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है “न तभ्दासयते सूर्यो न शशांको न पावक” उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है ,न चाँद ,न अग्नि वह तो स्वयं प्रकाश है |बचपन में पिता जी से सुना था कि परमात्मा नेति-नेति – न यह ,न वह |जितना कहो ,उतना कम | १. परमात्मा का पहला स्वरूप मेरे लिए सत्य है | जो था ,जो है,जो रहेगा -वही सत्य है | हमारा शरीर बदलेगा,रिश्ते बदलेंगे ,यह पहाड़ भी कभी न कभी बदल जायेंगे ,पर वह सत्य अटल है | उसी सत्य की एक झलक जब सुबह धौलाधार पर सूरज की पहली किरण पडती है ,तब दिखती है |
2. दूसरा स्वरूप प्रेम है |८२ वर्ष में यही सीखा कि नफरत से कुछ नहीं मिलता | परमात्मा हर जीव में बैठा है | गुरु ग्रन्थ साहिब में लिखा है ” एक नूर ते सब जग उपज्या “-एक ही नूर से सारा संसार बना है अर्थात पैदा हुआ है | जब मैं किसी दुखी को देख कर दुखी होता हूँ ,किसी भूखे को रोटी देता हूँ ,तो लगता है उसी परमात्मा की सेवा कर रहा हूँ | मन्दिर मस्जिद में नहीं मनुष्य की आँखों में वह ज्यादा दिखता है |
3. तीसरा स्वरूप शांति है -जवानी में बहुत भाग दौड़ की ,पाने की इच्छा रही ,अब समझ आया कि परमात्मा कोलाहल में नहीं, मौन में मिलता है | जब रात को सब सो जाते हैं और मैं अकेला बैठ कर अपने भीतर झांकता हूँ ,तो एक गहरी शान्ति उतरती है -वही उस का आभास है | उपनिषद कहते हैं “शांत शिवं अन्दैतं” वह शांत है ,कल्याणकारी है,एक है |
४. वेद उसे सच्चिदानन्द कहते हैं -सद+चित + आनन्द | यानी वह सदा रहने वाला है ,चेतन है और आनन्द स्वरूप है |हम दिख इसलिए पाते हैं क्यों कि हम उस से अलग हो कर जीते हैं |जैसे लहर समुन्द्र से अलग नहीं ,वैसे ही हम उस से अलग नहीं ,बस भूल गए हैं |
५. तो परमात्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है ? वह एक रस,शांत,अभय एवं केवल ज्ञान स्वरूप है | न उस में माया का मल है और न तो उस के द्वारा रची हुई बिषमतायें ही |वह सत और असत दोनों से परे है | किसी भी वैदिक या लौकिक शब्द की वहां तक पहुंच नहीं है | मेरे अनुभव में -वह न दूर है ,न पास ,न मन्दिर में कैद है न शास्त्रों में |वह साँसों की डोर है ,माँ की ममता है ,धर्म की राह है और अंत समय का सहारा है | उसे पाना नहीं है ,बस पहचानना है |
कबीर ने ठीक कहा था -“ज्यों तिल मांही तेल है ,ज्यों चकमक में आग ,तेरा साईं तुझ में है ,जाग सके तो जाग ” बस मैं इतना ही कह सकता हूँ |बाकि अनुभव की बात है |
लेखक-मदन लाल शर्मा
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