श्रीमद्भागवत-द्वितीय:स्कन्ध:दशमोSध्याय

शीर्षक-भागवत के दस लक्षण -जीवन को समझने की दस चाबियां |

गंगा तट पर बैठे राजा परीक्षित के मन में प्रश्न उठा ,वे शुकदेव जी से कहते हैं -हे गुरुदेव ,आप ने मुझे भगवान के विराट स्वरूप का दर्शन कराया | अब यह कृपा कीजिये कि मुझे बताइए – जिस भागवत को आप सुनाने वाले हैं ,उस में विषय क्या है ? मैं किस क्रम से उसे समझूं |

परीक्षित का यह प्रश्न हम सब का प्रश्न है | जब हम कोई ग्रन्थ उठाते हैं तो पहले उस की विषय सूची देखते हैं | शुकदेव जी ने उतर में दस वाली बात कही ,वे ही द्वितीय स्कन्ध के दशम अध्याय है ,इसे कहते हैं -भागवत के दस लक्षण | आज के प्रवचन में हम इन्हीं दस लक्षणों को कथा,दृष्टान्त और जीवन के सन्दर्भ में समझेगे |

१..सर्ग -पहली सृष्टि,पहला स्पंदन –

सुनो राजन ,सब से पहले भगवान ने जब अपनी दृष्टि डाली ,तो सोई हुई प्रकृति जाग उठी जैसे बीज में वृक्ष छिपा होता है वैसे ही भगवान के संकल्प से महतत्व ,अहंकार,शब्द स्पर्श, रूप ,रस,गंध फिर आकाश,वायु, अग्नि ,पृथ्वी प्रकट हुए | यह सर्ग है | आप के जीवन में भी सर्ग रोज होता है | सुबह आँख खुली -यह नई सृष्टि है ,एक नया विचार आया -सर्ग है | पर याद रखना ,इस का मूल भगवान का संकल्प है | अहंकार न करना कि मैंने किया |

विसर्ग – ब्रह्मा जी की कार्यशाला –

भगवान ने ब्रह्मा जी को शक्ति दी | ब्रह्मा जी ने उसी पंचभूत से ८४ लाख योनियाँ,देवता,ऋषि,मनुष्य,पशु,पक्षी बनाये |इसे विसर्ग कहते हैं | विशेष सर्ग -हमारे घर में भी विसर्ग चलता है|माता-पिता बच्चों को जन्म देते हैं| गुरु शिष्य की ज्ञान देता है ,कुम्हार मिट्टी का घड़ा बनाता है ,कुम्हार भी तभी बना सकता है जब भगवान उसे बुद्धि और हाथ दिए हों |

3. स्थान – पालन कर्ता की चौकीदारी –

सृष्टि बना कर छोड़ नहीं दी ,भगवान विष्णु रूप से स्थान ,अर्थात पालन करते हैं | सूरज समय पर उगता है ,ऋतू समय पर आती है,माँ का दूध बच्चे के जन्मते ही उतर आता है -यह सब स्थान है | परिवार में जो कमाता है ,जो रक्षा करता है ,वह विष्णु का प्रतिनिधि है ,इसलिए उसे सम्मान दो,समाज में जो नियम क़ानून बनाते हैं | वे भी स्थान धर्म निभा रहे हैं |

४..पोषण-कृपा का प्रसाद –

भगवान केवल रोटी नहीं देते ,भक्ति भी देते हैं | गजेन्द्र ने जब ग्राह से बचने के लिए पुकारा ,तो भगवान दौड़े आये |प्रहलाद को आग से बचाया | यह पोषण है -अनुग्रह कृपा है |

आज भी जब आप थक कर कहते हैं ,हे भगवान और अचानक हिम्मत आ जाती है ,तो समझो -पोषण हुआ | किसी भूखे को रोटी देना ,किसी रोते को हंसाना -यह सब भगवान का पोषण कार्य आप से करवा रहे हैं |

५..ऊति-वासनाओं की गठरी –

उती माने कर्म की वासना- जैसे नदी में कंकड़ गोल हो जाता है वैसे ही जन्म जन्म, के कर्म हमें बांधते हैं,लोभ,मोह,अहंकार ये उती हैं | एक सेठ का दृष्टांत सुनो ,वह मरते समय भी तिजोरी की चाबी मुट्ठी में दवाए था |वही चाबी उसे अगले जन्म में सांप बना गई | इसलिए संत कहते हैं कि गठरी हल्की रखो ,नहीं तो डूबोगे |

६.. मन्वन्तर -समय का कैलेंडर –

भगवान ने काल की भी व्यवस्था की है | एक कल्प में १४ मनु होते हैं | अभी वैवस्वत मनु का काल चल रहा है | हर मन्वन्तर में इंद्र,सप्तऋषि ,देवता बदल जाते हैं | हमें इस से शिक्षा मिलती है -कुर्सी किसी की सदा नहीं रहती ,आज जो मैनेजर है कल ररिटायर होगा | अहंकार किस बात का? मनु भी बदल जाते हैं ,हम क्या चीज हैं |

7.. ईशानुकथा -भगवान की प्रेम लीलाएं –

यह भागवत का प्राण हैं |मत्स्य बन कर वेद बचाए,कूर्म बन कर मन्दराचल उठाया ,वाराह बन कर पृथ्वी को निकाला ,नृसिंह बन कर भक्त की लाज रखी ,वामन बन कर बलि से तीन पग मांगे ,राम बन कर मर्यादा सिखाई ,कृष्ण बन कर प्रेम सिखाया | यह कथाएं सुनने से पत्थर दिल भी पिघल जाता है |इसलिए घर में बच्चों को टीबी , नहीं ठाकुर जी की कथा सुनाओ|” यही ईशानुकथा है |

८.. निरोध -लय,विश्राम ,प्रलय –

दिन भर काम कर के रात को सोते हैं -वह नित्य निरोध है | ब्रह्मा जी जब सोते हैं तो नैमितिक प्रलय होता है और जब महाप्रलय होता है तो सब भगवान में लीन हो जाता है | जीवन में भी निरोध जरूरी है | मोबाइल,लैपटाप को भी शटडाउन करना पड़ता है | हम मशीन नहीं इंसान हैं ,सप्ताह में एक दिन मौन ,एकांत,भगवान के साथ यह निरोध है | इस से उर्जा वापिस आती है |

9.. मुक्ति -छुटकारा नहीं ,स्वरूप की पहचान –

लोग समझते हैं ,मरने के बाद मुक्ति मिलेगी ,भागवत कहती है -जीते जी मुक्त हो सकते हो| जब समझ में आ जाए कि मैं शरीर नहीं ,आत्मा हूँ ,भगवान का अंश हूँ तभी मुक्ति है | जैसे जेब में हीरा रखा है और भिखारी की तरह मांग रहे हो | संत जेब दिखा देते हैं बस वही मुक्ति है | भक्ति करते करते अहंकार गल जाय ,तो मुक्ति यही | है |

10..आश्रय -सब का ठिकाना –

अब सब से गहरी बात ,यह नौ लक्षण -सर्ग से लेकर मुक्ति तक , किस के आधार पर टिके हैं ? शुकदेव जी कहते हैं -आश्रय |

माला के मोती धागे के बिना विखर जायेंगे ,वैसे ही सृष्टि पालन ,लीला,प्रलय मुक्ति -सब श्री कृष्ण रुपी धागे में पीरोये हैं | वे ही आश्रय हैं |

एक माँसे बच्चा पूछे -माँआकाश किस पर टिका है ? माँ कहे -भगवान पर , बेटा -भगवान किस पर टिके हैं ? माँ हंस कर कहे -बेटा भगवान किसी पर नहीं टिकते ,सब उन पर टिके हैं | वे ही आश्रय हैं |

समापन – हमारे लिए संदेश- प्यारे भक्तो भागवत के ये 10 लक्षण कोई फिलोसोफी नहीं जीने की कला है |

१ सुबह उठो तो सर्ग याद करो -आज नया दिन भगवान ने दिया |

2. काम करो तो विसर्ग -निमित बनो,कर्ता मत बनो |

3.परिवार चलाओ तो स्थान – मिम्मेदारी निभाओ |

४. किसी की मदद करो तो पोषण -भगवान का हाथ बनो |

५.वासना से उती याद करो -बन्ध जाओगे |

६. पद मिले तो मन्वन्तर – कल चला जाएगा |

7. खाली समय में ईशानुकथा -कथा सुनो और सुनाओ |

८. थक जाओ तो निरोध – शांत बैठो ,शरण में जाओ |

9. मुक्ति – माँगा नहीं ,मैं कौन हूँ ,यह जानो |

10. और अंत में सब” आश्रय ” श्रीकृष्ण को सौंप दो |

जिस ने १० लक्षणों को समझ लिया ,उस ने पूरी भागवत समझ ली |,और जिस ने भागवत समझ ली उस ने जीवन समझ लिया |

लेखक- मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow.com

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