ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार ईश्वर का स्वरूप
बहुत से लोग पूछते हैं ईश्वर कैसा है ? कोई कहता निराकार ,कोई साकार |पुराण, ब्राह्मण ग्रंथ क्या कहते हैं ? ऐतरेय ब्राह्मण के आधार पर समझते हैं |
मूल मन्त्र -ऐतरेय ब्राह्मण 2.१.१. में कहा गया है |
प्रजापतिर्वा इदमग्र एक एवास | ऐक्षत कथं नु प्रजायेयेति | अर्थ- सब से पहले प्रजापति ही थे ,उन्होंने इच्छा की कि मैं कैसे बहुत हो जाऊं |
देखिये यहाँ प्रजापति का अर्थ है ,सब का पालन करने वाला ईश्वर |सृष्टि से पहले न धरती थी, न आकाश ,बस एक ईश्वर था | उस ईश्वर के मन में विचार आया कि मैं एक से अनेक हो जाऊं | बस इसी विचार से सारी सृष्टि बन गई |
इस में तीन बात स्पष्ट हैं –
१. ईश्वर एक है -३३ करोड़ के भ्रम में न पड़ें |मूल में शक्ति एक ही है |
2. ईश्वर की इच्छा से सृष्टि बनी-किसी ने उसे बनाया नहीं ,उस ने खुद चाहा तो सब बन गया |
3. वो हम सब से अलग नहीं ,जैसे समुद्र की लहरें निकलती हैं वैसे ही हम सब उसी ईश्वर के अंश हैं |
आज के जीवन में इस का महत्व -ऐतरेय ब्राह्मण हमें बताता है कि ईश्वर एक है ,इच्छा मात्र से सृष्टि रचता है |मन्दिर की बजाए अपने अन्दर झाँक कर देखो |
लेखक -मदन लाल शर्मा
वेबसाइट -thegodweknow.com
