अथैकोनविंशोSध्याय:प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत)

परीक्षित का अनशन व्रत और शुकदेव जी का आगमन – राजधानी में पहुंचने पर राजा परीक्षित को अपने उस निन्दनीय कर्म के लिए बड़ा पश्चाताप हुआ |वे अत्यंत उदास हो गये और सोचने लगे मैंने निरपराध और अपना तेज छिपाए हुए ब्राह्मण के साथ बड़ा ही नीच व्यबहार किया है | यह बड़े खेद की बात है ,अवश्य ही उस ब्राह्मण के अपमान के फलस्वरूप शीघ्र ही मुझ पर कोई घोर विपति आने वाली है और मैं भी यही चाहता हूँ क्यों कि उस से इस घोर पाप का प्रायश्चित हो जायेगा |और भविष्य में कभी ऐसा अपराध कभी नहीं करूंगा |मैं चाहता हूँ कि ब्राह्मणों की क्रोधाग्नि मेरे राज्य,सेना और खजाने को जला कर राख कर दे | आज अगर तक्षक मुझे डस ले तो अच्छा है उन्हें आग के समान तक्षक का डसना बहुत भला मालूम हो रहा था | उन्होंने सोचा कि बहुत दिनों से मैं संसार में आसक्त हो रहा था ,अब मुझे जल्दी ही वैराग्य ले लेना चाहिए | वे इस लोक और पर लोक के भोगों को तुच्छ समझते थे | अब उन का त्याग कर के भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा को ही सर्वोपरि मान कर आमरण अनशन व्रत ले कर गंगातट पर बैठ जाना चाहिए | इस प्रकार उन्होंने समस्त आसक्तियों का त्याग कर के श्रीकृष्ण के चरण कमलों का ध्यान करने लगे |

उस समय वहां पर अत्री,वशिष्ठ आदि समस्त कई श्रेष्ठ देवर्षि ,ब्रह्म ऋषि एवं राज ऋषियों का आगमन हुआ ,राजा ने उन सब का यथायोग्य आदर सत्कार किया |जब सब लोग आराम से अपने अपने आसनों पर बैठ गये तब महाराज परीक्षित ने उन्हें फिर से प्रणाम किया और उन के सामने जो कुछ वह करना चाहते थे ,उसे सुनाने लगे-समस्त राजाओं में हम धन्य हैं ,क्यों किअपने शील स्वभाव के कारण हम महापुरुषों के कृपापात्र बन गए हैं | हमारे निन्दित कार्य भी ब्राह्मणों के चरण धोवन मात्र से ही दूर हो जाते हैं | कितने खेद की बात है मैं भी राजा ही हूँ निरन्तर देह में आसक्त रहने के कारण मैं भी पाप रूप हो गया हूँ |

इस से स्वयं भगवान ही ब्राह्मण के शाप के रूप में मुझ पर कृपा करने के लिए पधारे हैं | यह शाप वैराग्य उत्पन्न करने वाला है |,क्यों कि इस प्रकार के शाप से संसार सक्त पुरुष भयभीत हो कर विरक्त हो जाते हैं| अब मैंने अपने चित को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है | अब आ कर अगर तक्षक भी मुझे डस ले तो मुझे भय नहीं है |आप लोग कृपा कर के भगवान की रसमयी लीलाओं का गान करें | मैं आप ब्राह्मणोंके चरणों में प्रणाम कर के विनती करता हूँ कि मुझे कर्म वश जो भी योनी मिले मेरी श्रीकृष्ण के चरणों में अनुराग बना रहे | ऐसा मुझे आप का आशीर्वाद दीजिए |

राजा परीक्षित बड़े ही धीर थे ,उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया था |पृथ्वीके एकछत्र राजा परीक्षित जब इस प्रकार आमरण अनशन पर बैठ गए |सभी ऋषि मुनिओं ने उन की प्रशंसा की कि उन्होंने अपना राज सिहासन का एक ही क्षण में त्याग कर दिया ,जिस के लिए बड़े बड़े राजा आपस में लड़ पड़ते हैं |

उसी समय पृथ्वी पर विचरण करते हुए शुकदेव जी बच्चों और स्त्रिओं से घिरे हुए वहां पहुँचते हैं |उन की सोलह साल अवस्था थी |उन्होंने अपना तेज छुपा रखा था ,फिर भी उन के लक्षण जानने वाले मुनियों ने उन्हें पहचान लिया और वे सब के सब अपने अपने आसन छोड़ कर उन के सम्मान के लिए उठ खड़े हुए | राजा परीक्षित ने अतिथिरूप से पधारे श्रीशुकदेव जी को सिर झुका कर प्रणाम किया और उन की पूजा की | जब शुकदेव जी शांत भाव से बैठ गए,तब परीक्षित जी ने उन के समीप जा कर | उन के चरणों में सिर रख कर प्रणाम किया |

परीक्षित ने कहा हम बडभागी हैं ,क्यों कि अपराधी क्षत्रिय होने पर भी हमें संत समागम का अधिकारी समझा | आप योगियों के परम गुरु हैं ,इसलिए मैं आप से परमसिद्धिके स्वरूप और साधन के सम्बन्ध में प्रश्न कर रहा हूँ | जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है,उस को क्या करना चाहिए ?भगवन,साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्य मात्र को क्या करना चाहिए? वे किस का श्रवण ,किस का जप,किस का स्मरण और किस का भजन करे तथा किस का त्याग करे ?

राजन, जो अभय पद को प्राप्त करना चाहते हैं ,उसे तो सर्वात्मा सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण कीर्तन और स्मरण करना चाहिए |मनुष्य जन्म का यही इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो-ज्ञान से भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठां से जीवन को ऐसा बना लिया जाए कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति अवश्य बनी रहे | परीक्षित अभी तो तुम्हारे जीवन की अवधि सात दिन की है | इस बीच में ही तुम अपने कल्याण के लिए जो कुछ करना चाहिए ,सब कर लो |मृत्यु के समय मनुष्य घवराये नहीं | उसे चाहिए कि वह वैराग्य के शस्त्र से शरीर और उस से सम्बन्ध रखने वालों के प्रति ममता को काट डाले | भागवत सुनते सुनते राजा परीक्षित निर्भय हो गए| तक्षक आया,पर राजा हंसते हुए चले गए |

मदन लाल शर्मा

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