कर्दम ऋषि और देवहूति का विवाह -कथा

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के बाइसवें अध्याय में मानव सृष्टि के विस्तार की एक अत्यंत पावन और प्रेरणादायक कथा का वर्णन है | यह कथा स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूति और प्रजापति कर्दम मुनि के विवाह की है | इसी विवाह से आगे चल कर स्वयं भगवान कपिल के रूप में अवतार लेते हैं और सांख्य शास्त्र का उपदेश देते हैं |

श्री मैत्रेय जी विदुर से कहते हैं -हे विदुर ,जब ब्रह्मा जी ने कर्दम प्रजापति को सृष्टि विस्तार की आज्ञा दी ,तो वे भगवान की तपस्या करने के लिए सरस्वती नदी के तट पर स्थित बिंदु सरोवर पर चले गए |

कर्दम मुनि की कठोर तपस्या |

बिंदु सरोवर अत्यंत पवित्र और रमणीय स्थान था |वही पर कर्दम मुनि ने दस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की | वे केवल जल पी कर ,मन को एकाग्र करके भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे | उन की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु गरुड पर सवार हो कर प्रकट हुए | भगवान का स्वरूप अत्यंत मनोहर था |नीलमणि के समान श्याम वर्ण,पीताम्बर धारण किये ,गले में वन माला ,चतुर्भुज रूप में शंख,चक्र,गदा ,पद्म धारण किये हुए |भगवान के दर्शन से मुनि का हृदय गदगद हो गया |उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और स्तुति करने लगे |

कर्दम जी कहा-हे प्रभु,आप भक्त वत्सल हैं ,आप ने मेरी तपस्या को सफल किया | ब्रह्मा जी ने मुझे सृष्टि बढ़ाने की आज्ञा दी है ,इसलिए मैं आप के विधान के अनुसार गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर एक योग्य कन्या से विवाह करना चाहता हूँ |

भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा – हे कर्दम,तुम्हारी इच्छा मुझे पहले से ही ज्ञात है | तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ,शीघ्र ही स्वायम्भुव मनु अपनी पत्नी शतरूपा और पुत्री देवहूति के साथ तुम्हारे पास आयेंगे | देवहूति अत्यंत गुणवती,सुशील और सुन्दरी है ,वह तुम्हारे योग्य ही है,तुम उस से विवाह कर लो |

भगवान ने आगे कहा -हे मुनि ,इस विवाह से नौ कन्याएं प्राप्त होंगी और उस के बाद मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतार ले कर तुम्हें और समस्त मानव जाति को ज्ञान का उपदेश दूंगा |मेरा नाम कपिल होगा |ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान होगे |

स्वायम्भुव मनु का आगमन –

उधर स्वायम्भुव मनु ,जो इस पृथ्वी के प्रथम सम्राट थे अपनी पुत्री देवहूति के विवाह को ले कर चिंतित थे| देवहूति विवाह के योग्य हो चुकी थी| एक दिन मह्रिषी नारद जी उन के दरबार में आये नारद जी ने मनु को बताया कि सरस्वती तट पर कर्दम नाम के एक महान ऋषि तपस्या कर रहे हैं ,जो देवहूति के लिए सर्वथा योग्य वर है |

नारद जी की बात सुन कर महाराज मनु अपनी पत्नी सतरूपा और पुत्री देवहूति को ले कर ,बहुत सा दान दहेज और उपहार सामग्री के साथ अपने स्वर्ण जडित रथ पर सवार हो कर बिंदु सरोवर की और चल पड़े |जब वे आश्रम पर पहुंचे तो देखा कि कर्दम मुनि अभी अभी तपस्या से उठे हैं |उन का तेज सूर्य के समान था,जटाएं बढ़ी हुई थीं,परन्तु मुख पर ब्रह्म तेज था |मनु ने विनम्रता से उन्हें प्रणाम किया और कहा -हे मुनि श्रेष्ठ ,आप साक्षात प्रजापति हैं | मैं अपनी पुत्री के योग्य वर की खोज में आप के पास आया हूँ |

महाज मनु ने अपनी पुत्री देवहूति का परिचय दिया |उन्होंने कहा -यह मेरी पुत्री देवहूति है | इस ने बचपन से ही आप की प्रसंशा सुनि है और मन ही मन आप को पति के रूप में बरण कर लिया है | यह अत्यंत सरल,सेवा भावी और धर्म परायण है |कृपया इसे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करें |

देवहूति का स्वरूप और भाव –

श्रीमद्भागवत में देवहूति के स्वरूप का बड़ा सुन्दर वर्णन है | देवहूति अत्यंत कोमल,कमल नयनी ,लज्जाशील और समस्त स्त्री सुलभ गुणों से समस्त सुखों को त्याग कर भी वह वन में रह कर ऋषि सेवा करने को तत्पर थी |उस के मन में कोई कामना नहीं थी ,केवल पति सेवा के द्वारा भगवान प्राप्ति ही उस का लक्ष्य था |

विवाह प्रस्ताव और शर्त –

मर्दम मुनि ने मनु की बात सुन कर कहा- हे,राजन,आप ने ठीक सोचा है |भगवान विष्णु ने भी मुझे यही आदेश दिया था|मैं आप की पुत्री से विवाह करने के लिए तैयार हूँ |परन्तु मेरी एक शर्त है |मैं गृहस्थ में तब तक रहूँगा जब तक हमें सन्तान प्राप्ति नहीं हो जाती ,सन्तान प्राप्ति के बाद मैं सन्यास लेकर परमात्मा की खोज के लिए निकल जाऊँगा |

महाराज मनु ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली ,उन्होंने सोचा कि ऐसे महान ऋषि का सान्निध्य पाकर उन की पुत्री धन्य हो जायेगी | इस के बाद बड़े उत्सव के साथ कर्दम और देवहूति का विवाह सम्पन्न हुआ |ब्रह्मा जी ,सप्त् ऋषि और देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की |मनु ने अपनी पुत्री को बहुत सा दहेज,वस्त्र,आभूषण,दास दासियाँ दीं,परन्तु कर्दम मुनि ने केवल देवहूति को ही स्वीकार किया और बाकी सब वापिस कर दिया | बोले -हम वनवासी हैं ,हमें इन भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं |

मनु अपनी पुत्री को आश्रम में छोड़ कर अपनी राजधानी लौट गए ,परन्तु उन का मन बहुत दुखी था कि उन की कोमल पुत्री कठोर आश्रम जीवन कैसे बिताएगी |

देवहूति की पति सेवा –

विवाह के बाद देवहूति ने अपने राजसी वस्त्र त्याग दिए और वत्क्ल वस्त्र धारण कर लिए | वह दिन रात अपने पति की सेवा में लगी रहती | वह स्वयं भोजन बनाती ,आश्रम की सफाई करती ,कंद मूल लाती और कर्दम मुनि की हर आज्ञा का पालन करती |धीरे धीरे कठिन परिश्रम और ब्रह्मचर्य के पालन से उस का शरीर दुर्बल हो गया ,परन्तु उस के चेहरे पर सेवा का तेज और भी बढ़ गया |

कर्दम मुनि ने कई वर्षों तक अपनी योग शक्ति से अपनी काम वासना को रोक कर रखा | वे देवहूति की निष्काम सेवा से अत्यंत प्रसन्न हुए |एक दिन उन्होंने अपनी योग दृष्टि से देखा कि उन की पत्नी की सेवा पूर्ण हो चुकी है |तब कर्दम जी ने अपनी योग माया से एक दिव्य विमान का निर्माण किया |वह विमान इच्छानुसार चलने वाला था ,उस में सभी प्रकार की सुख सुविधायें ,सुन्दर महल,बगीचे ,सरोवर,मणियों से जड़े हुए भवन थे |वह विमान आकाश में भी उड सकता था और जल पर भी चल सकता था |

कर्दम मुनि ने देवहूति से कहा -हे देवी,तुम सरस्वती नदी में स्नान कर के आओ | देवहूति जब स्नान कर के निकली तो उस का रूप एक दिव्य अप्सरा के समान हो गया |उस के शरीर पर दिव्य वस्त्र और आभूषण थे | इस के बाद कर्दम और देवहूति ने उस विमान में बैठ कर सौ वर्षों तक पृथ्वी और स्वर्गलोक के अनेक स्थानों पर भ्रमण किया और गृहस्थ धर्म का पालन किया |

शिक्षा और उपसंहार –

इस अध्याय से हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं मिलती हैं |

१. योग्य वर का चुनाव -महाराज मनु ने धन ,पद या राज्य न देख कर अपनी पुत्री के लिए एक तेजस्वी ,ज्ञानी और चरित्रवान वर चुना ,यही सच्चे माता पिता का कर्तव्य है |

2. पतिव्रत्य धर्म -देवहूति ने राजमहल के सुख को छोड़ कर पति के आश्रम में ही अपना स्वर्ग बना लिया |उस की निष्काम सेवा ही उसे भगवान की माता बनने का सौभाग्य दिलाती है |

3. गृहस्थ आश्रम की मर्यादा – कर्दम मुनि ने गृहस्थ में रह कर भी योग ,संयम और धर्म का पालन किया |उन्होंने दिखाया कि गृहस्थ आश्रम योग के लिए नहीं,बल्कि सृष्टि के कल्याण और भगवत प्राप्ति का साधन है |

इस प्रकार तृतीय स्कन्ध का बाइसवें अध्याय में पवित्र दाम्पत्य जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया गया है ,जो आगे चल कर भगवान कपिल के अवतार की भूमिका बनता है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे द्वाविशोSध्याय: ||२२||

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट – thegodweknow.com

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