कडोह और राजा जनक का आत्मचिंतन

भारतीय दर्शन परम्परा में ज्ञान की दो धाराएं समानंतर चलती हैं-एक शास्त्रार्थ की दूसरी चिन्तन की |शास्त्रार्थ बाहर होता है और आत्मचिंतन भीतर | मिथिला के राजा जनक इसी आत्मचिंतन के प्रतीक हैं | वे राजा होते हुए भी ऋषि कहलाये |उन के जीवन से जुडी हुई एक कथा ऋषि कडोह से जुडती है,जिसे कई ग्रंथों में कडोह या कहोड़ ऋषि कहा जाता है |

यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं है ,बल्कि मनुष्य के अहंकार ,धैर्य और आत्मज्ञान के बीच संघर्ष की कथा है |इस का पुन:स्मरण प्रासंगिक है क्यों कि आज का मनुष्य भी उसी उहापोह से गुजर रहा है जिस से कभी राजा जनक गुजरे थे |

कडोह ऋषि -विनम्रता का पहला पाठ-

कडोह ऋषि वेदज्ञ और तपस्वी थे |वे ऋषि उद्दालक के शिष्य थे | कहा जाता है एक बार वे अपने शिष्यों को वेदपाठ करा रहे थे ,गर्भवती पत्नी सुजाता भी वहीं थी ,उन के गर्भ में पल रहा बालक ,जो आगे चल कर अष्टावक्र नाम से प्रसिद्ध हुआ ,पिता के उच्चारण में अशुद्धि को देख कर गर्भ से ही टोक देता है |

कडोह को यह अपमान लगा ,क्रोध में आ कर उन्होंने अपने ही अजन्में पुत्र को शाप दे दिया कि तू आठ स्थानों से टेढ़ा मेढा होगा | वही बालक अष्टावक्र हुआ | समय बीता ,कडोह एक बार राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ के लिए गए | वहां बंदी नामक विद्वान था जो शास्त्रार्थ में हारने वाले ब्राह्मणों को जल में डुबो देता था |कडोह भी पराजित हुए और जल में डुबो दिए गए |

यह घटना दो बातें सिखाती है -बिद्या के साथ विनम्रता न हो तो वही बिद्या बंधन बन जाती है ,और अहंकार चाहे ऋषि का हो या राजा का उस का परिणाम दुःख ही होता है |

राजा जनक का आत्मचिंतन –

राजा जनक चक्रवर्ती सम्राट थे | धन वैभव,सेना ,बिद्वानों से भरा दरबार सब कुछ था |फिर भी मन शून्यता थी | वे सोचते थे मैं राजा हूँ,मैं ज्ञानी हूँ ,मैं धर्मात्मा हूँ ,पर क्या मैं यही हूँ?

एक रात्री की घटना ने उन के जीवन को बदल दिया |कहते हैं कि जनक स्वप्न में देखते हैं कि उन का राज्य लुट गया है ,वे भिक्षुक बन कर द्वार द्वार भटक रहे हैं | भूख से व्याकुल हो कर जब उन्हें थोडा सा खिचडा मिलता है ,तभी दो बैल आकर बिखेर देते हैं | वे हाहाकार कर उठते हैं और उन की नींद टूट जाती है | आँख खुलती है तो वे राजमहल में हैं |सोने के पात्र ,रेशमी शय्या ,सेवक खड़े हैं | तब जनक के मन में प्रश्न उठता है -कौन सा सत्य है ?जो अभी देखा वह सत्य है या जो अब देख रहा हूँ ,वह सत्य है ?

यहीं से उन का आत्मचिंतन प्रारम्भ होता है | वे विद्वानों को बुलाते हैं ,कोई कहता है स्वप्न असत्य है ,जाग्रत सत्य है ,कोई कहता है दोनों ही माया है | जनक को संतोष नहीं होता | उसी समय बारह वर्षीय बालक अष्टावक्र जो अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध और पिता को मुक्त कराने आया था ,मिथिला के दरबार में प्रवेश करता है |वह टेढ़े मेढे शरीर वाला बालक जब चलता है तो दरबारी हंस पड़ते हैं |अष्टावक्र भी हंस पड़ता है |जनक पूछते हैं ,तुम क्यों हंसे ?

अष्टावक्र कहता है -ये चमड़े के पारखी हैं आत्मा के नहीं ,ये मेरे टेढ़े शरीर को देख कर हंसे,मैं उन की टेढ़ी बुद्धि पर हंसा | यह उतर जनक के हृदय में तीर की तरह लगता है | वे समझ जाते हैं कि सत्य शरीर में नहीं,दृष्टि में है |

अष्टावक्र और जनक संवाद -आत्म चिन्तन का शिखर-

राजा जनक अष्टावक्र को अपना गुरु बनाते हैं | यही पर प्रसिद्ध अष्टावक्र गीता का जन्म होता है |जनक पूछते हैं -मुक्ति कैसे मिलेगी ?अष्टावक्र कहते हैं -मुक्ति कर्म से नहीं,बोध से मिलती है |तुम अपने को मुक्त मानो तो मुक्त,बद्ध मानो तो बद्ध हो | जनक का आत्मचिंतन यही परिपक्क होता है |वे जान जाते हैं कि कडोह ऋषि का पतन बिद्या के अहंकार से हुआ,और उन का अपना बंधन राजसता के अहंकार से है ,जब तक ” मैं कडोह हूँ,मैं जनक हूँ ” का भाव है,तब तक ज्ञान नहीं |

अष्टावक्र की कृपा से बंदी पराजित होता है और जल में दुबे हुए सभी ब्राह्मण ,जिन में कडोह भी थे ,मुक्त होते हैं | कडोह अपने पुत्र अष्टावक्र को देख कर पश्चाताप करते हैं और संगमा नदी में स्नान करने से अष्टावक्र का शरीर सीधा हो जाता है |

यह कथा इस बात का प्रतीक है कि पिता का शाप भी पुत्र के ज्ञान से कट सकता है और शिष्य का आत्म चिन्तन गुरु के उद्धार का कारण बन सकता है |

आज के सन्दर्भ में प्रासंगिकता –

कडोह और जनक की यह कथा आज के समाज के लिए दर्शन है |आज हर व्यक्ति कहीं न कहीं जनक है -बाहर से सुखी भीतर से अशांत |हमारे पास सूचनाएं हैं ,डिग्रियां हैं,पद है पर आत्म चिन्तन का अवकाश नहीं है | हम दूसरों की टेढ़ को देखते हैं ,अपनी दृष्टि की टेढ़ को नहीं |

कडोह हमें सिखाते हैं कि ज्ञान कठिन तपस्या है |यदि ज्ञान विनम्र नहीं बनाता तो अज्ञान से भी अधिक खतरनाक है | जनक सिखाते हैं कि आत्मज्ञान के लिए हिमालय जाने की आवश्यकता नहीं |महल में रह कर भी वैराग्य संभव है | जनक का वैराग्य् पलायन नहीं,बोध था ,वे कहते हैं -मैं कर्ता नहीं,द्रष्टा हूँ |

इसलिए सच्चा प्रकाशन वही है जो मन को प्रकाशित करे |कडोह और जनक का यह प्रसंग हमे याद दिलाता है कि जीवन का अंतिम प्रश्न शास्त्रों में नहीं ,अपने भीतर ही हल होता है |मनुष्य बाहर की जय पराजय से थक कर भीतर पूछता है-मैं कौन हूँ ?-तभी उस का सच्चा आत्मचिंतन प्रारम्भ होता है और वहीं से मुक्ति का द्वार खुलता है |

इति –

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-thegodweknow.com

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