षोडशोSध्याय -प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत)
परीक्षित की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वी का संबाद -पांडवों के महाप्रयाण के बाद भगवान के परम भक्त राजा परीक्षित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे | उन के जन्म के समय ज्योतिषियों ने उन के सम्बन्ध में जो कुछ कहा था ,वास्तव में वे सभी गुण उन में थे| उन्होंने उतर की पुत्री इरावती से बिबाह किया उन के चार पुत्र उत्पन्न हुए | कृपाचार्य को आचार्य बना कर गंगा तट पर तीन अश्वमेघ यज्ञ किये,उन यज्ञों में देवताओं ने प्रत्यक्ष हो कर अपना भाग ग्रहण किया | एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा कि एक शूद्र के रूप में कलियुग गाय और बैल के जोड़े को ठोकरों से मार रहा है ,तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़ कर दंड दिया |
जो लोग चाहते तो हैं मोक्ष परन्तु अल्पायु होने के कारण मृत्यु से ग्रस्त हो रहे हैं ,उन के कल्याण के लिए भगवान यम का आवाहन कर के उन्हें यहाँ शांति कर्म में नियुक्त कर दिया गया हैं ,तब तक किसी की मृत्यु नहीं होगी | मृत्यु से ग्रस्त मनुष्य लोक के जीव भी भगवान की सुधातुलय लीला कथा का पान कर सकें ,इएलिए महाऋषियों ने भगवान यम को यहाँ बुलाया है | एक तो थोडी आयु और दूसरा कम समझ |ऐसी अवस्था में संसार के मंदभाग्य विषयी पुरुषों की आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है -रात में नींद और व्यर्थ के कामों में दिन |
जिस समय राजा परीक्षत कुरु जंगल में निवास कर रहे थे ,उस समय उन्होंने सुना कि उन के द्वारा सुरक्षित साम्राज्य में कलियुग प्रवेश कर चूका है इस समाचार से उन्हें दुःख तो हुआ ,परन्तु यह सोच कर कि युद्ध करने का अवसर है वह अपनी सेना ले कर चल पड़े |उन्होंने भद्राश्व,केतुमाल ,भारत,उतरकुरु ,और किम्पुरुष आदि सभी राज्यों को जीत कर वहां के राजाओं से भेंट की |
उन्हें उन देशों में सब जगह अपने पूर्वजों महात्माओं का सुयश सुनने को मिला | उन के यशोगान से जगह जगह भगवान श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती थी |साथ ही उन्हें यह भी सुनने को मिला कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र की ज्वाला से कैसे उन की रक्षा की थी ,यदुवंशी और पांडवों में परस्पर कितना प्रेम था तथा पांडवों की भगवान श्रीकृष्ण में कितनी भक्ति थी |उन्होंने अर्जुन के सारथि का काम किया था ,वे उन के सखा तो थे ही उन के दूत भी बने ,अपने प्रेमी पांडवों के चरणों में उन्होंने सारे जगत को झुका दिया था | तब परीक्षत की भक्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों की और भी बढ़ गयी | इस प्रकार वे दिनों दिन पांडवों के आचरण का अनुसरण करते हुए दिग्विजय कर रहे थे |
उसी समय की घटना है ,धर्म बैल का रूप धारण कर एक पैर से घूम रहा था |एक स्थान पर उसे गाय के रूप में पृथ्वी मिली |पुत्र की मृत्यु से दुखी माता के समान उस के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग रही थी ,उस का शरीर श्री हीन हो गया था | धर्म पृथ्वी से पूछने लगा | कहीं तुम्हें यह दुःख तो नहीं कि मेरे तीन पैर टूट चुके हैं या मैं दूर चला गया हूँ ,या तुम अपने लिए रो रही हो कि अब तुम पर शूद्र वर्ण के लोग शासन करेंगे शायद आज के राजा तो सोलह आने कलियुगी हो गये हैं उन्होंने तो बड़े बड़े देशों को भी उजाड़ डाला है क्या तुम उन राजाओं या देशों के लिए शोक कर रही हो || तुम्हें देवताओं की भी चिंता हो सकती है कि अब उन्हें यज्ञों मे आहुति नहीं दी जाती या प्रजा के लिए जो समय पर बर्षा न् होने के कारण अकाल से पीड़ित हो रही है | शायद तुम इसलिए रो रही हो की अब अधर्मी लोग धर्म के नाम स्वार्थी लोग तुम पर शासन करेंगे जहाँ योगियों सरीखे कपड़े पहने भेडियों द्वारा महिलाओं ,बच्चों और धर्म पर चलने वाले लोगों को सताया जायेगा | सम्भव है शिक्षा अब कुकर्मी ब्राह्मणों के चंगुल में पड़ गयी है |,और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओं की सेवा करने लगे हैं ,और इसी का तुम्हें दुःख है | क्या तुम राक्षस सरीखे मनुष्यों द्वारा सताई हुई आरक्षित स्त्रियों एवं आर्त बालकों के लिए शोक कर रही हो ? सम्भव है शिक्षा अब कुकर्मी लोगों के चंगुल में पड़ गई है | आजकल की जनता खान पान ,वस्त्र,स्नान और स्त्री-सहवास आदि में शास्त्रीय नियमों का पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है ,क्या इस के लिए तुम दुखी हो ? ,माँपृथ्वी,अब समझ में आया तुम्हें भगवान श्रीकृष्ण की याद आ रही होगीं ,क्यों की तुम्हारा भार उतारने के लिए ही अवतार लिया था | अब उन की लीला संवरण कर लेने पर उन के परित्याग से तुम दुखी हो रही हो |
पृथ्वी ने कहा -धर्म,जो कुछ जो तुम मुझ से पूछ रहे हो ,वह सब स्वयं जानते हो |जिन भगवान के सहारे तुम सारे संसार को सुख पहुचाने वाले अपने चारों चरणों से युक्त थे ,जिन में सत्य ,पवित्रता ,दया क्षमा ,त्याग ,संतोष,सरलता शम,दम,तप,समता,तितिक्षा ,उपरति,शास्त्र विचार , ,वैराग्य,,एश्वर्य,बीरता,तेज,बल,स्मृति,स्वतन्त्रता,कौशल,कान्ति,धैर्य,कोमलता,निर्भीकता,विनय,शील,साहस,उत्साह,बल,सौभाग्य,गम्भीरता,स्थिरता,आस्तिकता,कीर्ति,गौरव,और निरहंकार,ज्ञान -ये उन्तालीस अप्राकृत गुण तथा महत्वकांक्षी पुरुषों के द्वारा वांछनीय और भी बहुत से महान गुण उन की सेवा करने के लिए नित्य निरन्तर निवास करते हैं ,एक क्षण के लिए भी उन से अलग नहीं होते ,उन्हीं समस्त गुणों के आश्रय सौन्दर्य धाम भगवान श्रीकृष्ण ने इस समय इस लोक से अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुग की कुदृष्टि का शिकार हो गया है |भगवान ने मुझ अभागिन को छोड़ दिया ,मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्य पर गर्व था इसलिए मुझे यह दंड मिला है |
तुम अपने तीन चरणों के कम हो जाने से मन ही मन कुढ़ रहे थे ,अत: अपने पुरुषार्थ से तुम्हें अपने ही अंदर पुन: सब अंगों से पूर्ण एवं स्वस्थ कर देने के लिए वे अत्यंत रमणीय श्याम सुन्दर विग्रह से यदुवंश में प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भार को ,जो असुर् वंशी राजाओं की सैकड़ों अक्षौहिणी के रूप में था ,नष्ट कर डाला | क्यों कि वे परम स्वतंत्र थे | उन पुरुषोतम भगवान का विरह भला कौन सह सकता है |
इति –
नोट-यह उपरोक्त उन्तालीस गुण सनातन हैं , ऋषि मुनियों का यही सनातन धर्म है |सभी धर्मों का मूल यही सनातन है |संसार के जितने भी धर्म हैं उन का आधार यही सनातन गुण है | इन के विपरित जो गुण किसी धर्म में है वह सनातन नहीं हो सकता |,वह किसी धार्मिक समुदाय के अपने गुण हो सकते हैं |,उन्हें सनातन कहना गलत है |,सनातन का शब्दिक अर्थ जो शास्वत नियम जिस का न आदि है न अंत वही सनातन है | सनातन का संस्थापक स्वयं भगवान हैं |
