अष्टावक्र -7
पहले छ: प्रकरणों में अष्टावक्र जी ने उपदेश दिया उस प्रकरण में से राजा जनक की अनुभूति बोल रही है |जनक कहते हैं -अब मैंने जान लिया |यह पाच श्लोक आत्म साक्षातकार के बाद की स्थिति का वर्णन है |
श्लोक-मय्यंतममहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्तत: |भ्रमति स्वांतवातेन न ममस्त्यसहिष्णुता ||१||
जनक कहते हैं -मुझ अनन्त महासागर में विश्व रुपी जहाज अपने ही अंदर की वायु से इधर उधर घूमता है ,पर इस से मुझ में कोई विक्षोभ ,कोई सहिष्णुता नहीं होती |
विवेचना-
इस श्लोक में जनक ने अपने आप को अनन्त सागर कहा है और संसार को उस पर तैरता हुआ एक छोटा जहाज |यह बहुत गहरी उपमा है | सागर विशाल है,शांत है ,गहरा है जहाज चाहे कितना भी डोले,तूफ़ान आये ,सागर को कोई फर्क नहीं पड़ता ,वैसे ही ज्ञानी पुरुष जान लेता है कि मैं यह शरीर,मन,बुद्धि नहीं,मैं तो एक विशाल चेतना हूँ ,जिस में यह सारा संसार चल रहा है |
हमारे जीवन में विचार आते हैं सुख दुःख आते हैं लोग आते जाते रहते हैं | अज्ञानी व्यक्ति हर लहर के साथ हिलता है कभी ख़ुशी में उछलता है ,कभी दुःख में रोता है , पर ज्ञानी देखता है कि ये सब मेरे अंदर की वायु -स्वांतवात यानी मन की कल्पनाओं से हो रहा है |संसार बाहर नहीं मेरे मन के अन्दर घूम रहा है |
जब यह ज्ञान होता है तो सहिष्णुता अपने आप आ जाती है | फिर कोई गाली दे तो भी ,प्रशंसा करे तो भी ज्ञानी विचलित नहीं होता |जैसे सागर जहाज से नहीं कहता कि तुम डोलो,वह जहाज को डोलने देता है |यही जीवन मुक्ति है | आप को कुछ करना नहीं ,बस जानना है कि आप सागर हैं ,जहाज नहीं,जहाज को संभालने की चिंता को छोड़ते ही शान्ति मिलती है |यह श्लोक हमें सिखाता है -साक्षी बनो,कर्ता नहीं |
श्लोक- मय्यनंतयमहाम्भोधौ जगद्विची : स्वभावत: |उदेतु वास्तमायातु न में वृद्धिर्न च क्षति: || 2||
अर्थ – मुझ अनन्त सागर मे जगत रुपी लहरें स्वभाव से ही उठती हैं और विलीन हो जाती हैं | इस से न मेरी कोई बृद्धि होती है न कोई हानी |
विवेचना –
पहले श्लोक में जहाज था ,अब लहरें हैं | अष्टावक्र उदाहरण बदल कर और सूक्ष्म बात कह रहे हैं | जहाज मुझ से अलग लगता है ,पर लहरें तो सागर से अलग हैं ही नहीं | लहर उठती है ,सागर से ही उठती है ,सागर में ही लीन हो जाती है | जनक कहते हैं -यह सारा जगत ,ये सारे लोग,ये सारे सम्बन्ध ,ये सारी घटनाएँ मेरी ही लहरें हैं ,इन का उठना गिरना स्वाभाविक है ,इस में माया का कोई चमत्कार नहीं | बचपन आया ,जवानी आई ,बुढापा आयेगा -ये लहरें हैं |धन आया ,चला गया -लहर है | हम क्यों दुखी होते हैं ? क्यों कि लहर को पकड़ना चाहते हैं ,हम चाहते हैं कि सुख की लहर हमेशा रहे ,दुःख की लहर कभी न आये | पर सागर लहर को नहीं पकड़ता | ज्ञानी समझता है कि मेरे आत्म स्वरूप में न कुछ जुड़ता है ,न कुछ घटता है जैसे सोने से कितने भी गहनें बने,सोना न बढ़ता है न घटता है ,वैसे ही आत्मा में जगत के बनते बिगड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता |
यह ज्ञान अभय देता है | जब तक हम अपने को लहर समझते हैं तब तक टूटने का डर है |जिस दिन जान लिया मैं सागर हूँ ,उस दिन मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है |लहरें मरेंगी,सागर नहीं |
श्लोक- मय्यनतमहामयोधौ विश्वं नाम विकल्पना | अतिशांतो निराकार एतदेवाह्मास्थित: || 3||
अर्थ- मुझ अनन्त महासागर में यह विश्व केवल एक कल्पना,एक विकल्पना है |मैं अत्यंत शांत और निराकार रूप में स्थित हूँ |
विवेचना –
यह श्लोक अद्वैत का शिखर है | जनक कहते हैं -जो संसार इतना ठोस ,इतना सच्चा दिखता था ,वह अब मुझे केवल कल्पना लग रहा है | जैसे रेगिस्तान में पानी का भ्रम या सपने में देखा हुआ महल | विकल्पना शब्द बहुत सुन्दर है | इस का अर्थ -मन द्वारा गढ़ी हुई कहानी | हमारा मन कहानी घडता है -यह मेरा है यह पराया है ,यह अच्छा है यह बुरा है |आत्मज्ञान होने पर पता चलता है कि ये सब मन के खेल थे ,सत्य नहीं |
तब मैं क्या करूं ?जनक कहते हैं अतिशान्तो निराकार | मैं वह शान्ति हूँ जो कभी भंग नहीं होती ,मैं निराकार हूँ |आकार तो सब मिटने वाले हैं |शरीर का आकार है,मकान का आकार है ,विचार का आकार है पर मैं वह आकाश हूँ जिस में सब आकार आ जाते हैं|
इस श्लोक का अभ्यास यही है-दिन में कई बार याद करो -यह जो मैं देख रहा हूँ वह मेरी कल्पना मात्र है ,मैं तो शांत निराकार चेतना हूँ,ऐसा स्मरण करते करते मन की पकड़ ढीली होने लगती है | राग द्वेष कम होते हैं | एक अकारण शान्ति भीतर ठहरने लगती है | यही ध्यान है ,यही अमाधि है |
श्लोक- यस्तु भोगेषु भुक्तेशु न भगवत्यधिवासिता | अभुक्तेषु निराकांक्षी तादृशो भवदुर्लभ: || ४||
अर्थ- उस अनन्त निरंजन अवस्था में न आत्मा का भाव है न अनात्मा का |ऐसा जान कर मैं आसक्ति रहित,इच्छा रहित और शांत रूप में स्थित हूँ |
विवेचना-
यह सब से सूक्ष्म श्लोक है | जनक कहते हैं -उस परम अवस्था में ” मैं आत्मा हूँ ” यह भाव भी नहीं रहता |क्यों कि तक मैं आत्मा हूँ कह रहे हैं तब तक भी द्वैत है |कहने वाला अलग ,आत्मा अलग | अनन्त और निरंजन -निरंजन का अर्थ है जिस में कोई अंजन ,कोई दाग,कोई कालिख न लगी हो | हमारा मन दागों से भरा है ,वासनाओं,मान्यताओं ,अहंकार से आत्मा सदा वेदाग है |
जब इस अवस्था का ज्ञान होता है तो क्या होता है ? तीन चीजें अपने आप गिर जाती हैं | पहला -आसक्त,आसक्ति,अब किसी व्यक्ति,वस्तु,पद से चिपकाव नहीं रहता |दूसरा- इच्छा और अनिच्छा चली जाती है अब और चाहिए ,यह दौड़ खत्म | तीसरा-शांत,एक गहरी शान्ति जो किसी कारण पर निर्भर नहीं | हम संसार में आसक्ति और इच्छासे बंधे हैं | आसक्ति भूतकाल से बांधती है ,इच्छा भविष्य में खींचती है |ज्ञानी दोनों से मुक्त हो कर वर्तमान में ,शांत चित हो जाता है |इस का अर्थ यह नहीं कि वह काम नहीं करता | जनक राजा थे ,राजकाज करते थे ,पर भीतर से लिप्त नहीं थे | कमल की तरह -पानी में हैं ,पर पानी से उपर |यही जीवन जीने की कला है |
श्लोक -अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्र्जालोपमं जगत | अतो मम कथं हेयोपादेयकल्पना ||५||
अर्थ-आश्चर्य में तो केवल शुद्ध चेतना मात्र हूँ और यह जगत जादू के खेल जैसा है फिर् मुझ और क्या ग्रहण करने योग्य है ऐसी कल्पना कैसे हो सकती है | में क्या त्यागने योग्य है
विवेचना-
अंतिम श्लोक आश्चर्य से शुरू होता है | अहो जैसे कोई अचानक जाग जाए और कहे -अरे,मैं तो सपना देख रहा था जनक को भी आश्चर्य हो रहा है -इतना सरल सत्य और मैं इतने जन्मों से भटक रहा था | मैं चिन्मात्र हूँ -केवल चेतना |न हिन्दू न मुसलमान ,न ब्राह्मण,न शुद्र,न जवान ,न बूढा ,न पानी न पुण्यात्मा | ये सब इंद्रजाल है -जादूगर के खेल जैसे ,जादूगर सिक्का हवा से लाता है दिखता है ,पर होता नहीं ,वैसे ही यह जगत दिखता है ,पर है नहीं |दिखने और होने में फर्क है |जब यह दिख गया कि सब जादू है ,तो फिर चुनाव कैसा ?हम सारा दिन इसी में लगे हैं -यह लूं,यह छोड़ दूँ ,यह सामान खरीदूं |हेय उपादान -छोड़ने और पकड़ने की कल्पना |ज्ञानी हंसता है -जब सब जादू ही है,तो क्या पकड़ना,क्या छोड़ना ?
इस का अर्थ अकर्मण्यता नहीं,बल्कि मुक्ति है | अब कर्म में तनाव नहीं| जो सामने आये ,उसे खेल की तरह कर लो ,पकड़ो मत ,जैसे जादू का खेल देख कर आनंद लेता है पर उसे घर ले जाने की कोशिश नहीं करता ,जीवन को भी ऐसे ही देखो-एक सुन्दर इंद्रजाल,एक लीला| देखने वाला तुम शुद्ध चेतना ,सदा मुक्त |
इति अष्टावक्र गीता सप्तम प्रकरण
मदन लाल शर्मा
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