श्रीमद्भागवत तृतीय स्कन्ध:चतुर्थोSध्याय:
उद्दव जी से विदा हो कर विदुर जी का मैत्रेय ऋषि के पास जाना –
तृतीय स्कन्ध के चतुर्थ अध्याय में विदुर जी और उद्दव का मिलन होता है ,पर अध्याय का मुख्य प्रसंग है – उद्दव जी के मुख से श्रीकृष्ण लीला और यदुवंश के संहार का वृतान्त सुन कर विदुर जी का व्याकुल होना,और फिर उद्दव जी के निर्देश पर तत्व ज्ञान की प्यास लेकर मह्रिषी मैत्रेय के पास प्रस्थान करना |
१. यमुना तट पर दो महाभक्तों का मिलन –
तीर्थ में भ्रमण करते हुए विदुर जी यमुना के पावन तट पर पहुंचे | वहां उन्होंने देखा – एक तेजस्वी पुरुष पीपल वृक्ष के नीचे बैठे हैं |नेत्र बंद हैं,पर कपोलों पर अश्रु धारा वह रही है |ये स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी के मंत्री,सखा और शिष्य उद्दव जी थे |विदुर जी ने दौड़ कर उन के चरण पकड़ लिए | उद्दव जी ने नेत्र खोले तो सामने धर्म के अवतार विदुर जी को देख कर गदगद हो गए | दोनों ने एक दुसरे को हृदय से लगाया ,बहुत देर तक दोनों मौन रहे | विरह की पीड़ा शब्दों में कहाँ समाती है ? कुछ देर बाद विदुर जी ने कांपते स्वर में पूछा ,”उद्दव जी द्वारका में सब कुशल तो हैं ?हमारे प्राण धन श्रीकृष्ण ,बलराम,अनिरूद्ध आदि सकुशल हैं न ? मैं तो हस्तिनापुर का त्याग कर चला आया |सुना है प्रभु ने यह लोक छोड़ दिया -मानता नहीं “|
2. उद्दव जी द्वारा द्वारका का लीला का मर्म वताना –
उद्दव जी का हृदय भर आया ,वे बोले ,”विदुर जी ,आप जिसे कुशल पूछ रहे हैं ,वह कुशल मंगल का स्त्रोत ही अब इस धरती पर नहीं रहा | यह सब भगवान की लीला थी “|
फिर उन्होंने विस्तार से बताया-” कैसे दुर्वासा ऋषि के शाप के बहाने यदुवंशियों में मदिरा का प्रचार हुआ | कैसे प्रयास क्षेत्र में सब यदुवंशी एकत्र हुए और नशे में मदमस्त हो कर एरक घास के तिनको से एकदूसरे को मारने लगे | साम्ब आदि ने ब्राह्मणों का उपहास किया था ,वही शाप निमित बना | बलराम जी ने समुद्र तट पर योगमाया से शरीर छोड़ दिया | मैंने देखा -वे शेष नाग के रूप में समुद्र में समा गए “|उद्दव जी रूक रूक कर बोले रहे थे ,” और हमारे स्वामी ,वे एक पीपल के नीचे वाए चरण पर दहिना चरण रखे लेटे थे | चरण कमल इतने सुकोमल थे कि जरा व्याध ने उन्हें हिरण का मुख समझ लिया | उस ने वाण चला दिया |प्रभु ने मुस्कुरा कर उसे दर्शन दिया ,अपने धाम का मार्ग दिखाया और फिर —–“उद्दव जी फूट पड़े |
” फिर वे सशरीर अपने धाम चले गए विदुर जी | उन के जाते ही द्वारका नगरी भी समुद्र में समा गई | अर्जुन आये थे यदुवंश की स्त्रियों को हस्तिनापुर ले गए ,पर रास्ते में आभीरों ने लूट लिया | काल के आगे किसी का बल नहीं चलता |”
3. विदुर जी की विरह और जिज्ञासा –
यह सुन कर विदुर जी मूर्छित हो कर गिर पड़े | उद्दव जी ने उन्हें जल छिडक कर चेतना में लाया | चेतना आते ही विदुर विलाप करने लगे ,” हाय ,मैं अभागा हूँ |प्रभु ने जाते समय दर्शन भी नहीं दिया | दुर्योधन के अन्न से पला यह शरीर उन के काम न आ सका |”
उद्दव जी ने उन्हें समझाया ,” विदुर जी आप शोक न करें | भगवान देह से गए हैं | वे कण कण में हैं | जाते समय प्रभू ने कृपा कर के मुझे अपना ज्ञान दिया था | उन्होंने कहा था ,”उद्दव तुम बद्रिकाश्रम जाओ |पर मेरे विरह से व्याकुल भक्तों को मेरा ज्ञान सुनाना |” यह सुनते ही विदुर जी के नेत्र चमक उठे | वे हाथ जोड़ कर बोले,” उद्दव जी ,आप पर तो प्रभु की विशेष कृपा है | आप ने उन के मुख से ज्ञान सुना है | मैं अभागा हूँ ,संसार से ऊब चूका हूँ | मुझे भी ज्ञान दीजिए जिस से मेरा मोह नष्ट हो जाए | मैं भगवान के तत्व को जानना चाहता हूँ -वे कैसे सृष्टि रचते हैं और संहार करते हैं ? जीव का उन से क्या सम्बन्ध है ?.
४. उद्दव जी का विनम्रता से विदुर जी को मैत्रेय जी के पास भेजना –
विदुर जी की तीव्र जिज्ञासा देख कर उद्दव जी बहुत प्रसन्न हुए ,पर उन्होंने हाथ जोड़ कर् कहा ,” विदुर जी , मैं इस ज्ञान का अधिकारी नहीं ,मैं तो उन का सेवक हूँ ,भगवान ने स्वयं जाते समय मुझे आज्ञा दी थी कि,” उद्दव तुम महामुनि मैत्रेय के पास जाओ |मैंने उन्हें सांख्य और भक्तियोग का पूरा रहस्य बताया है | वे तुम्हें भी उपदेश देंगे |” मैं तो मैत्रेय से ज्ञान लेकर बद्रिकाश्रम जा रहा हूँ |आप भी वहां जाइये | मैत्रेय मुनि इस समय हरिद्वार के पास गंगा जी के तट पर तप कर रहे है | वे पराशर ऋषि के पुत्र हैं और भगवान के परम ज्ञानी भक्त हैं | उन से बढ़ कर इस तत्व का ज्ञाता कोई नहीं है | आप उन से प्रश्न कीजिये ,वे आप के सारे संदेह दूर कर देंगे | ” उद्दव जी ने कहा ” भगवान ने यह भी कहा था कि सत्पुरुषों का संग ही संसार -सागर से तरने का जहाज है | आप मैत्रेय जी का संग कीजिये ,वही आप को भवसागर से पार लगायेंगे |”
५. विदा और विदुर जी की यात्रा –
उद्दव की बात सुन कर विदुर जी को बड़ा संतोष हुआ | उन का शोक कुछ हल्का हुआ | ज्ञान कि प्यास में अब एक दिशा मिल गई थी | उन्होंने उद्दव जी की परिक्रमा की और साष्टांग प्रणाम किया |” उद्दव जी ,आप ने मुझे डूबते को किनारा दिखा दिया | अब मैं मैत्रेय के चरणों में ही जाऊँगा |आप भी अपने मार्ग पर सुखपूर्वक जाइये |”
दोनों भक्तों के नेत्र फिर भर आये | उद्दव जी ने विदुर को हृदय से लगाया और आशीर्वाद दिया ,”विदुर जी ,भगवान आप की जिज्ञासा अवश्य पूर्ण करेंगे | आप धन्य हैं ,जो भगवान की कथा के प्यासे हैं |” इस के बाद उद्दव जी ने बद्रिकाश्रम का मार्ग लिया | उन के जाते ही विदुर जी ने भी हरिद्वार की और प्रस्थान किया | रास्ते भर उन के मन में एक ही लगन थी -कब मैत्रेय मुनि के दर्शन होंगे ?कब मैं भगवान की लीला का रहस्य सुनूगा ?
गंगा संगम होते हुए ,अनेक तीर्थों को प्रणाम करते हुए ,विदुर जी कई दिनों की यात्रा के बाद हरिद्वार के पास गंगा तट पर पहुंचे |वहां उन्होंने देखा -एक वृक्ष के नीचे तेजस्वी मह्रिषी समाधि में बैठे हैं ,जटाएं हैं ,शरीर पर वत्क्ल वस्त्र हैं ,मुख पर ब्रह्मतेज है | विदुर जी ने पहचान लिया-यही महा मुनि मैत्रेय हैं |उन्होंने दूर से ही साष्टांग दंडवत किया | मुनि के समाधि से उठने की प्रतीक्षा करने लगे |
सार और शिक्षा –
तृतीय स्कन्ध् का चतुर्थ अध्याय हमें तीन बड़ी बातें सिखाता है –
१. भगवद -विरह ही भक्ति की कसौटी है -उद्दव और विदुर दोनोंके आंसू बताते हैं कि भगवान से सच्चा प्रेम कैसा होता है |
2. गुरु की महिमा – स्वयं उद्दव जैसे ज्ञानी भी कहते हैं कि तत्व ज्ञान के लिए गुरु -मैत्रेय के पास जाना चाहिए ,ज्ञान अहंकार से नहीं,विनम्रता से मिलता है|
3. जिज्ञासा ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है – विदुर जी राजपाट ,परिवार सब छोड़ कर “भगवान कौन है “? यह जानने के लिए निकल पड़े | जब तक प्रश्न नहीं जगेगा ,तब तक जीवन का रहस्य नहीं खुलेगा |
इसी के साथ कथा अगले अध्याय में प्रवेश करती है | जहां विदुर जी मैत्रेय मुनि से ६ प्रश्न पूछेंगे और यहीं से भागवत का ब्रह्मांड -विज्ञान ,सृष्टि रचना और सांख्य योग का विस्तृत वर्णन शुरू होता है |
लेखक- ममदन लाल शर्मा
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