श्रीमद्भागवत द्वितीय स्कन्ध:षष्ठोSध्याय

विराट स्वरूप की विभूतियों का वर्णन –

भूमिका -प्रश्न और प्रसंग -श्री शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं ,राजन -जब नारद जी ने ब्रह्मा जी पूछा कि”सब से बड़े आप ही हैं या आप से बड़ा भी कोई है? तब सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी ने जो उतर दिया .वही इस अध्याय का विषय है |

ब्रह्मा जी बोले ,हे नारद मैं स्वतंत्र कर्ता नहीं हूँ ,जैसे वायु के बिना पता नहीं हिलता ,वैसे ही भगवान की प्रेरणा बिना मैं सृष्टि नहीं रच सकता ,सुनो मैं तुम्हें उस विराट पुरुष का वर्णन करता हूँ |

१. विराट परुष के दिव्य दर्शन –

ब्रह्मा जी कहते हैं”एक बार जब मैं कमल पर बैठा था तब मैंने चारों और जल ही जल देखा | मैं कौन हूँ कहाँ से आया हूँ यह सोचते हुए मैंने तप किया | तब भगवान ने कृपा करके अपना विराट रूप दिखाया |

विराट रूप कैसा था ? – वह पुरुष हजार सिर ,हजार आँखें,हजार पैर बाला था सम्पूर्ण ब्रह्मांड को घेर कर भी दस अंगुल शेष रह गया अर्थात भगवान सृष्टि से भी बड़े हैं | उस के शरीर के १४ लोक :-

अंग लोक अंग लोक

तलवे पाताल नाभि भू लोक

एडी रसातल हृदय भुवलोक

गुल्फ महातल वक्ष स्वर्ग लोक

घुटने तलातल ग्रीवा महर्लोक

जंघा सुतल मुख जनलोक

कटि वितल ,अतल ललाट तपोलोक

सिर सत्य लोक

2. अंगों के देवता और जगत की उत्पति –

ब्रह्मा जी ने बताया -नारद विराट पुरुष के अंग प्रत्यंग से यह सारा जगत बना है |

मुख से -सब से पहले बाणी निकली ,बाणी के साथ अग्नि देवता प्रकट हुए |मुख से ही ऋग्वेद और ब्राह्मण वर्ण प्रकट हुआ | इसलिए ब्राह्मण का कर्म पढना,पढाना,यज्ञ करना, है |

भुजाओं से -इंद्र और उपेन्द्र अर्थात विष्णु प्रकट हुए भुजाओं से यजुर्वेद और क्षत्रिय वर्ण निकला ,इसलिए क्षत्रिय का धर्म है रक्षा करना और दान करना |

जंघा से – सामवेद और वैश्य वर्ण प्रकट हुआ वैश्य का काम है खेती करना ,गोपालन,व्यापार से सब का भरण पोषण करना |

चरणों से – अथर्ववेद और शूद्र वर्ण प्रकट हुए,शूद्र का धर्म है सेवा | बिना पैर के शरीर चल नहीं सकता ,वैसे ही सेवा के बिना समाज चल नहीं सकता |

मन से – चंद्रमा देवता बने ,इसलिए चन्द्रमा मन का स्वामी है |

नेत्रों से – सूर्य प्रकट हुए | कानों से – दिशाएँ और श्रोत्र ,इन्द्रियां बनी | प्राण से – वायु देवता प्रकट हुए | नाभि से – आकाश बना |

सिर से -स्वर्ग लोक बना | रोम से – औषधि और वनस्पति हुई |

3. यज्ञ और धर्म की उत्पति –

विराट पुरुष के अंगों से केवल वर्ण ही नहीं निकले | उसी से हवन के लिए घी,यज्ञ के लिए पशु ,सोमलता,कुश, सब सामग्री प्रकट हुई | सात प्रकार के छंद ,चार प्रकार के होता ,यज्ञ के सब अंग उसी से बने | इसलिए वेद कहते हैं ” पुरुष एवेदं सर्वम ‘- यह सब पुरुष ही है |

४. ब्रह्मा जी का विनम्र निवेदन -अंत में ब्रह्मा जी नारद से बोले -बेटा मैं यह सृष्टि रचता हूँ तो वह अपनी बुद्धि से नहीं ,जैसे लोहार धौकनी चलाता है पर आग भगवान की दी हुई है ,वैसे ही मैं निमित मात्र हूँ | कर्ता तो वे नारायण ही हैं ,जो व्यक्ति इस विराट रूप को जान लेता है वह कभी वर्ण आश्रम के अभिमान में नहीं पड़ता | वह जानता है कि ब्राह्मण सिर है तो शूद्र पैर हैं | दोनों अपने अपने स्थान पर जरूरी हैं | पैर में कांटा चुभे तो आँख से आंसू आते हैं ऐसा है भगवान का परिवार |

कथा का मर्म -आज के लिए संदेश –

१. समता का भाव – कोई ऊँचा नीचा नहीं | मुख और पैर लड़ें तो शरीर नष्ट हो जाएगा |सब अपने धर्म पर रह कर एक दुसरे के पूरक बनें |

2. भगवान सर्वत्र हैं – परमात्मा का पहला अवतार विराट पुरुष है ,उस के सिवा काल,स्वभाव,कार्य,कारण,मन,पंच भूत,अहंकार,तीनों गुण,इन्द्रियां ,ब्रह्मांड,-शरीर, उस का अभिमानी,स्थावर और जंगम जीव-सब के सब उन अनन्त भगवान के रूप हैं |

3. अहंकार का त्याग – ब्रह्मा जी सृष्टि कर्ता भी हैं उन का कहना है ” मैं नहीं करता ,भगवान कराते हैं ” तो हम आप किस बात का घमंड करें | हमें भी घमंड अर्थात अहंकार नहीं करना चाहिए | जो कुछ भी हो रहा है भगवान की इच्छा से ही हो रहा है |

४. भक्ति का मार्ग – वर्ण धर्म का पालन करते हुए भगवान् का नाम लो ,यही सब से बड़ा यज्ञ है | हम लोग केवल अवतार की लीलाओं का ही गान करते रहते हैं ,उन के तत्व को नहीं जानते ,वे अजन्मा एवं पुरुषोतम हैं |प्रत्येक कल्प में वे स्वयं अपने आप में अपने आप ही सृष्टि करते हैं ,रक्षा करते हैं संहार करते हैं |वे माया के लेश से रहित ,केवल ज्ञान स्वरूप हैं और अंतरात्मा के रूप में एकरस स्थित हैं | वे तीनों काल में सत्य एवं परिपूर्ण है ,न उन का आदि है न अंत | वे तीनों गुणों से रहित ,सनातन हैं |

जो पुरुष के इस विराट रूप को सुनता है ,पढ़ता है ,वह सब पापों से मुक्त हो जाता है | उसे भगवान की भक्ति मिलती है और अंत में बैकुंठ धाम प्राप्त होता है

साभार- हरिवंश पुराण और पुरुष सूक्त पर आधरित

लेखक- मदन लाल शर्मा की और से -” वायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा वुद्धयात्मना वा प्रकृते स्वभावत |करोमि यद्यत सकल परस्मै नारायणायेती समर्पयामि || अर्थ- शरीर मन बाणी इन्द्रियों से ,बुद्धि से,आत्मा से, या प्रकृति के स्वभाव से जो कुछ भी मैं करता हूँ ,वह सब परम पुरुष नारायण को समर्पित करता हूँ |

वेबसाइट-thegodweknow.com

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