श्रीमद्भागवत द्वितीय :स्कन्ध:नवमोSध्याय

चतु:श्लोकी भागवत का उपदेश –

श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध: ,नवम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रम्हा जी को सृष्टि रचना से पहले केवल ४ श्लोकों में सम्पूर्ण भागवत का सार बताया था | इन्हें ही चतुश्लोकी भागवत कहा जाता है ,यह श्लोक 2-9-३3 से 2-9-३६ हैं यही चार श्लोक पूरे १८००० श्लोक वाले भागवत का बीज माने जाते हैं :-

अह्मेवासमेवाग्रे नान्यद यत सदसत परम | पश्चादहं यदेतच्च योSवशिश्येत सोSम्यहम ||१||

ऋतेSर्थ यत प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि |तदवीदयादात्मनो मायां यथाSSभासो यथा तम: ||2||

यथा महान्ति भूतानि भृतेषुच्चावचेश्वनु | प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम |3||

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाSSत्मन: | अन्वयव्यतिरेकाभया यत स्यात सर्वत्र सर्वदा ||४||

सृष्टि से पूर्व मैं ही मैं था | मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण ,अज्ञान | जहाँ यह सृष्टि नहीं है ,वहां मैं ही मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है ,वह भी मैं हूँ ,और जो कुछ बच रहेगा ,वह भी मैं ही हूँ ||१|| वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है ,अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश मण्डल के नक्षत्रों में राहु की भान्ति जो मेरी प्रतीति नहीं होती ,इसे मेरी माया समझना चाहये ||2|| जैसे प्राणियों के पंचभूत रचित छोटे बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्य रूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारण रूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते ,वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उन में आत्मा के रूप से प्रवेश किये हुए हूँ और आत्म दृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उन में प्रविष्ट नहीं भी हूँ ||3||यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं – इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है , यह ब्रह्म है -इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं ,वे ही वास्तविक तत्व हैं | जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है ||४||

श्री शुकदेव जी ने कहा -परीक्षित ,जैसे स्वप्न देखे जाने वाले पदार्थों के साथ उसे देखने वाले का कोई सम्बन्ध नहीं होता ,वैसे ही देहादि से अतीत अनुभव स्वरूप आत्मा का माया के बिना दृश्य पदार्थों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता |विविध रूप वाली माया के कारण वह विविध रूप वाला प्रतीत होता है ,और जब उन के गुणों में रम जाता है तब “यह मैं हूँ ,यह मेरा है” इस प्रकार मानने लगता है | किन्तु जब यह गुणों को क्षुब्ध करने वाले काल और मोह उत्पन्न करने वाली माया -इन दोनों से परे अपने अनन्त स्वरूप में मोह रहित होकर रमन करने लगता है – आत्माराम हो जाता है ,तब यह “मैं,मेरा ” का भाव छोड़ कर उदासीन -गुणातीत हो जाता है |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow.com| मेरी पहली ही पोस्ट है “मैं कौन हूँ”

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