आत्मानुभूति -आत्मसाक्षात्कार
महर्षि वामदेव जो गोतम ऋषि के पुत्र थे उन्हें गर्भ में ही आत्मानुभूति-आत्मसाक्षात्कार हुआ था | ब्रह्म -साक्षात्कार के लिए जीवन का कोई विशेष आश्रम तथा सन्यास लेने की कोई आवश्यकता नहीं है ,यह गर्भ में भी संभव है | इस के लिए केवल दृढ संकल्प और निश्चय की जरूरत होती है | हमारे अन्दर की चेतना ही आत्मा है | वामदेव के अनुसार आत्मा के पाँचों कोशों की रचना ,इन्द्रियों के विकास और उन क्षमताओं की उत्पति को वे देख सके जिन्हें प्राप्त करके मानवीय पूर्णता विकसित होती है |
जो ब्रह्म को जान लेता है वह ब्रह्म हो जाता है | ब्रह्म साक्षात्कार के लिए संकल्प महत्वपूर्ण है ,मानव जीवन के आश्रम विशेष और स्थान विशेष की आवश्यकता नहीं है | मानव जीवन में ही ब्रह्म ज्ञान और आत्मसाक्षात्कार संभव है | मानव जीवन प्राप्त करने से पहले उसे अनेक मानवेतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है | इस संसार में हम ही बार बार जन्म लेते हैं और अपने कर्मों के अनुसार फल भोगते रहते हैं | हमारा ही पुनर्जन्म होता है |
प्रथम जन्म -पुरुष में ही पहला गर्भ होता है ,क्यों की वीर्य ही भोजन सारतत्व से बनता है |वीर्य पुरुष के अंग अंग के तेज और पौरुष का ही सार है | जीवन तत्व वीर्य में ही रहता है | इसीलिए कहा जाता है कि हम अपने ही में अपने को धारण किये रहते हैं|पुरुष के अंगों के इस तेज से ही गर्भ होता है | पुरुष पहले वीर्य रक्षा द्वारा अपने में अपने को धारण करता है और जब उसे स्त्री में सिंचित करता है तब मानो वह स्वयं को हो सिंचित करता है -अपना आधान करता है ,मानो वह अपने को ही उत्पन्न करता है | इस प्रकार पुरुष अपने को ही उत्पन्न करता है ,यही उस का प्रथम जन्म है | अत: वीर्य रूप में पहले पुरुष ही गर्भ धारण करता है | वह इस वीर्य गर्भ को स्त्री में स्थापित करता है | अत: वीर्य गर्भ दान पुरुष का पहला जन्म है |
वह वीर्य स्त्री में जा कर उस का अपना ही रूप हो जाता है ,जैसे अपना ही अंग हो यह उस का | यह उसे पुरुष से प्राप्त होने के कारण विजातीय द्रव होता है परन्तु स्त्री का आत्मवत हो जाने पर उसे कष्ट नहीं देता |स्त्री,वीर्य रूप पुरुष की आत्मा को अपने भीतर सुरक्षित रख कर उस का पालन पोषण करती है |इसलिए गर्भ का पालन पोषण करने वाली स्त्री भी पालन पोषण करने योग्य होती है | स्त्री पुरुष को ही गर्भ में धारण करती है | इस प्रकार जब बालक का जन्म होता है तो वह पुरुष का अपना ही जन्म होता है | इसलिए कहा गया है कि”पिता एवं पुत्र्रूपेण जायते ” पिता ही पुत्र रूप में उत्पुन्न होता है | पिता तो स्वयं बीज रूप वीर्य है | पिता का यही तत्व वीर्य बन कर पहले गर्भ में जन्म लेता है फिर माता की कोख में विकसित हो कर शिशु रूप में जन्म लेता है | शिशु रूप में जन्म ही उस का दूसरा जन्म है |
पुत्र इस जीवन में पिता का प्रतिनिधि बन जाता है | इस जगत में अपने पुण्यापुन्य कर्मों को भोग कर ,आयु के क्षीण होने पर मृत्यु के बाद इस संसार को छोड़ देता है | इस लोक से जाते ही वह फिर उत्पन्न हो जाता है | यही पुनर्जन्म पुरुष का तृतीय जन्म है | लोगों में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि मृत्यु के बाद क्या होता है ,मृत्यु के बाद मनुष्य का इस लोक में पुनरागमन अवश्यम्भावी है | उस का इसी जगत में आना जाना लगा रहता है | लेकिन वह आत्म-साक्षात्कार करके इस आवागमन के चक्र से भी मुक्त हो सकता है |
सन्दर्भ -जन्मत्रयी मीमांसा
